न्यायपालिका

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    समान नागरिक संहिता या लैंगिक न्याय
    Posted in: न्यायपालिका

    – राम पुनियानी वर्तमान में पूरे देश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर ज़ोरदार बहस चल रही है। कुछ मुस्लिम महिलाओं और उनके संगठनों ने उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर मुंहज़बानी तलाक की प्रथा को गैरकानूनी घोषित करने की मांग की है। न्यायालय में प्रस्तुत अपने शपथपत्र में भारत सरकार ने कहा है कि […]

  • उत्तराखण्ड में बहाल हुआ लोकतंत्र
    उत्तराखण्ड में बहाल हुआ लोकतंत्र – प्रमोद भार्गव
    Posted in: न्यायपालिका, राजनीति, लोकतंत्र

    प्रमोद भार्गव देवभूमि उत्तराखंड में निर्णय प्रक्रिया के च्रकव्यूह में उलझा राजनीति संकट शक्ति परीक्षण के बाद समाप्त हो गया है। उच्चतम न्यायालय के आदेश पर उत्तराखंड विधानसभा में हरीश रावत ने अपना बहुमत सिद्ध कर दिया। रावत को 28 कांग्रेस, 6 प्रगतिशील लोग तांत्रिक मोर्चा और 1 नामित विधायक का वोट मिलाकर कुल 33 […]

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    सामाजिक न्याय और न्यायपालिका की भूमिका
    Posted in: न्यायपालिका

    ——–शैलेन्द्र चौहान——— इतिहास गवाह है कि शताब्दियों से मानव, सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए निरंतर भटकता रहा है और इसी कारण दुनिया में कई युद्ध, क्रांति, बगावत, विद्रोह, हुये हैं जिसके कारण अनेक बार सत्ता परिवर्तन हुए हैं। अगर भारत की बात की जाये तो हमारा भारतीय समाज पहले वर्ण व्यवस्था आधारित था जो धीरे […]

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    न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ पारदर्शिता भी जरूरी
    Posted in: न्यायपालिका

    ——जाहिद खान——- देश की ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण में पारदर्शिता की खातिर लाए गए संविधान संशोधन विधेयक, एनजेएसी कानून 2014 और इससे जुड़े 99वें संविधान संशोधन कानून, 2014 दोंनो को हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है। इस कानून के रद्द होने के बाद सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के […]

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    व्यापम और आसाराम प्रकरणों में मौतों के अंतर्सम्बन्ध
    Posted in: कानून, घोटाला, न्यायपालिका

    ——वीरेन्द्र जैन—— किसी राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दायित्व होता है कि वह प्रत्येक राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय घटना पर अपने दल की नीतियों के अनुसार अपना रुख स्पष्ट करे। उसके ऐसा न करने के पीछे यह समझना कठिन नहीं होता कि वह दल उस विषय पर अपनी राय को साफ साफ नहीं बतलाना चाहता और इस […]

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    एकल महिलाओ को लेकर अदालत का प्रगतिशील फैसला
    Posted in: न्यायपालिका, महिला

    ——उपासना बेहार—— 6 जुलाई 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया जिसमें कहा गया कि अविवाहित मां अपने बच्चे की अकेली अभिभावक बन सकती है। इसमें उसके पिता की रजामंदी लेने की आवश्यकता नहीं है। जिस केस को लेकर यह फैसला सुनाया गया है वो कुछ इस तरह है कि एक अविवाहित महिला […]

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    गल्तियों की बारम्बारिता आखिर कब तक
    Posted in: कानून, न्यायपालिका

    —–आकाश भारद्वाज—– पिछले दिनों न्याय की सर्वोच्च संस्था के द्वार से एक निर्णय आया, जिसने यथास्थितिवाद में बने रहने की निचली अदालतों की ख्वाहिशों पर विराम लगाते हुए उन्हें नैतिकता की वास्तविकताओं से एक परिचय करने का आदेश दिया गया है. दरअसल परिचय करने के इस आदेश की आवश्यकता उस घटना से पड़ी जिसमें मध्यप्रदेश […]

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    अरुणा ! हम पर लानत है……
    Posted in: न्यायपालिका, महिला

    —-डाॅ. गीता गुप्त—- 18 मई 2015 को अरुणा शानबाग का देहान्त हो गया। मुम्बई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में  नर्स के रूप में  कार्यरत् अरुणा की मौत वैसे तो 42 वर्ष पूर्व तभी हो गई थी, जब वार्ड बाॅय ने 27 नवम्बर 1973 की रात उनके साथ जघन्य दुराचार किया। अस्पताल में  ड्यूटी पूरी […]

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    न्याय की अधूरी आस
    Posted in: न्यायपालिका

    —अरविंद जयतिलक— स्मझना कठिन है कि जब न्याय मिलने में हो रही देरी से जनमानस क्षुब्ध है, अदालतों की साख पर सवाल उठ रहे हैं, अपराधियों और भ्रश्टाचारियों का हौसला बुलंद है, अदालतों में मुकदमों का बोझ बढ़ता जा रहा है, ऐसे समय में न्यायपालिका मुख्य न्यायधीषों और मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में ट्रायल कोर्ट में […]

  • Court Decision
    हाशिमपुरा: न्याय के अन्तहीन इन्तज़ार के 27 साल
    Posted in: न्यायपालिका, समाज

    — सुभाष गाताडे— एक चर्चित बाॅलीवुड फिल्म का डायलाॅग है कि अदालतें न्याय नहीं करती बस अपना निर्णय सुनाती हैं और बीच के अन्तराल में तारीख पर तारीख देती हैं। दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट ने 27 साल पुराने एक कतलेआम को लेकर जो अपना फैसला सुनाया, उसके बारे में कमसे कम यही बात लागू […]

  • Hashimpura Massacre
    इस अन्याय के खिलाफ चुप्पी क्यों छायी है?
    Posted in: न्यायपालिका, समाज

    —कृष्ण प्रताप सिंह— लगता है, यह नरसंहारों के अभियुक्तों के बरी होने का ‘मौसम’ है। देश अभी बिहार के बथानीटोला और शंकरबिगहा नरसंहारों के अभियुक्तों का बरी होना भूल नहीं पाया था कि उत्तर प्रदेश में मेरठ के हाशिमपुरा मुहल्ले में 28 साल पहले 22 मई, 1987 को हुए और प्रदेश की सशस्त्र पुलिस यानी […]

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    21 मार्च- किसकी हार हुई ?
    Posted in: न्यायपालिका, विशेष

    —शैलेन्द्र चौहान— आखिर दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 21 मार्च 2015 को मेरठ के हाशिमपुरा में 1987 में हुए नरसंहार के 16 अभियुक्त पुलिसकर्मियों को बरी कर दिया. इस नरसंहार में एक ही संप्रदाय के 40 से अधिक लोग मारे गए थे. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की रिज़र्व पुलिस पीएसी के जवानों को बरी […]

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