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    सरहद की हिफाजत में जिंदगी बनी व्हीलचेयर – प्रभुनाथ शुक्ल
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    सरहद की हिफाजत में जिंदगी बनी व्हीलचेयर —– प्रभुनाथ शुक्ल —— शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का बाकि यह निशां होगा। यह पंक्तियां सिर्फ दिखावे की हैं। जांबाज जवानों के सम्मान में लिखे गए इस शेर के मायने वक्त के साथ बदल गए हैं। 15 अगस्त यानी स्वाधीनता […]

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    प्रबंधन के वैष्विक गुरू बनते श्रीकृष्ण – प्रमोद भार्गव
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    प्रबंधन के वैष्विक गुरू बनते श्रीकृष्ण —- प्रमोद भार्गव —– भारतीय धर्मग्रंथों के युग परिवर्तन और बदले संदर्भों में जितनी व्याख्याएं हुई हैं, उतनी शायद दुनिया के अन्य धर्मग्रंथों की नहीं हुई हैं। इन ग्रंथों में श्रीमद् भगवद गीता सबसे अग्राणी ग्रंथ है। इसका महत्व धर्मग्रंथ के रूप में तो है ही प्रशासकीय प्रबंधन के […]

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    भिलारे गुरूजी के लिए दो मिनट का मौन – सुभाष गाताडे
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    भिलारे गुरूजी के लिए दो मिनट का मौन —– सुभाष गाताडे —– आज़ादी के लिए लड़े स्वतंत्रता सेनानी की मौत की ख़बर अक्सर संमिश्र भावनाओं को जन्म देती है। लोगों के एक हिस्से के लिए – जिनकी तादाद तेजी से घट रही है – यह अतीत को याद करने का ऐसा अवसर होता है जब […]

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    रक्षा बन्धन आस्था, विश्वास और नारी-मुक्ति का सूत्र बने ! – डाॅ0 गीता गुप्त
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    रक्षा बन्धन आस्था, विश्वास और नारी-मुक्ति का सूत्र बने ! —– डाॅ0 गीता गुप्त —– भारतीय संस्कृति की प्राचीन परम्पराओं का स्वरूप धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। किन्तु परम्पराएँ जीवित हैं, यह महत्त्वपूर्ण बात है। चिन्ताजनक यह है कि परम्पराओं पर बाज़ारवाद हावी होता जा रहा है और भावनाओं की अहमियत ख़त्म होती जा रही […]

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    कर्मयोेगी डाॅ0 अब्दुल कलाम – डाॅ0 गीता गुप्त
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    कर्मयोेगी डाॅ0 अब्दुल कलाम —– डाॅ0 गीता गुप्त —– पूर्व राष्ट्रपति डाॅ0 अब्दुल पाकिर जैनुल आवेदीन अब्दुल कलाम की समूची जीवन-यात्रा भारतवासियों के लिए प्रेरणास्पद् है। भारत के चार धामों में एक रामेश्वरम् के गाँव में एक निर्धन मछुआरा परिवार में 15 अक्तूबर 1931 को जन्मे कलाम अपने ज्ञान, प्रतिभा व कड़ी मेहनत के बल […]

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    निजता-हनन के कानून – प्रमोद भार्गव
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    निजता-हनन के कानून —– प्रमोद भार्गव —– व्हाट्सप की नई गोपनीय नीति से निजता के हनन के मामले में सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार ने कहा कि निजी जानकारियों की सुरक्षा जीवन के अधिकार के दायरे में आता है। लिहाजा निजी डाटा को व्यावसायिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना गलत है। निजी जानकारी जीवन के […]

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    ‘जुनैद मेरा बेटा था’ – हर्षमंदर
    Posted in: असहिष्णुता, विशेष, समाज, सांप्रदायिकता

    ‘जुनैद मेरा बेटा था’  —– हर्षमंदर —– ‘जुनैद मेरा बेटा था’ इस शीर्षक से मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध पूर्व आईएएस अधिकारी हर्षमंदर ने एक अत्यधिक मार्मिक लेख लिखा है, जो ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के एक जुलाई के संस्करण में प्रकाशित हुआ है। इसका हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत है – एल.एस. हरदेनिया जुनैद खान मेरा बेटा है। मैं […]

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    बसन्त राव और रजब अली को याद करना क्यों जरूरी है ? – सुभाष गाताडे
    Posted in: विशेष

    जब मुल्क को ही लिंचमाॅब /हत्यारी भीड़/ में तब्दील किया जा रहा हो बसन्त राव और रजब अली को याद करना क्यों जरूरी है ? – सुभाष गाताडे यह एक नयी राजनीतिक शैली है कि हत्या की नहीं जाती वह माहौल बनाया जाता है जिसमंे हत्या एक ‘स्वाभाविक कर्म’ हो जो इस माहौल के जनक […]

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    आपातकाल का दूसरा पक्ष – एल.एस. हरदेनिया
    Posted in: विशेष

    आपातकाल का दूसरा पक्ष  —— एल.एस. हरदेनिया —— प्रतिवर्ष के अनुसार भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 25 जून को देशभर में आपातकाल को लेकर शोर मचाएंगे और आपातकाल को भारतीय इतिहास का काला पृष्ठ बताएंगे। परंतु भाजपा आपातकाल से जुड़े ऐसे तथ्यों को उजागर नहीं करती है जिनके कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी […]

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    ताकत भी है बढ़ती आबादी – प्रमोद भार्गव
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    संदर्भः संयुक्त राष्ट्र की ‘संभावित वैष्विक आबादीः पुनरावलोकन-2017 रिपोर्ट‘ ताकत भी है बढ़ती आबादी —– प्रमोद भार्गव —– भारत की बढ़ती आबादी के परिप्रेक्ष्य में संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘संभावित वैष्विक आबादीः पुनरावलोकन-2017‘ रिपोर्ट में कहा है कि आने वाले सात सालों में भारत की आबादी 1.44 अरब हो जाएगी। अर्थात चीन को पीछे छोड़ते […]

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    गांधी की जाति और कांग्रेस की विचारधारा – राम पुनियानी
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    गांधी की जाति और कांग्रेस की विचारधारा —– राम पुनियानी —— गांधीजी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर सैंकड़ों ग्रंथ लिखे जा चुके हैं और दोनों के बारे में विभिन्न व्यक्तियों की अलग-अलग राय हैं। गांधीजी और कांग्रेस को कोई व्यक्ति किस रूप में देखता है, यह अक्सर उसकी विचारधारा पर निर्भर करता है। हाल (जून 2017) […]

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    नक्सलवारी के 50 वर्ष – एल.एस. हरदेनिया
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    नक्सलवारी के 50 वर्ष —– एल.एस. हरदेनिया —– वर्ष 1967 में बंगाल के नक्सलवारी स्थान में नक्सलवाद का जन्म हुआ था। नक्सलवादी आंदोलन के उदय के कुछ समय बाद मुझे कलकत्ता जाने का मौका मिला था। कलकत्ता प्रवास के दौरान कलकत्ता से प्रकाशित अंग्रेज़ी समाचारपत्र ‘स्टेट्समेन’ के कार्यालय में कुछ पत्रकार मित्रों से मिलने गया […]

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