फिल्म समीक्षा

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    “न्यूटन” भारतीय सिनेमा का काला हास्य – जावेद अनीस
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    “न्यूटन” भारतीय सिनेमा का काला हास्य — जावेद अनीस — भारतीय सिनेमा के लिये “न्यूटन” एक नये मिजाज की फ़िल्म है बिलकुल ताजी, साबूत और एक ही साथ गंभीर और मजेदार. इसमें सादगी और भव्यता का विलक्ष्ण संयोग है. न्यूटन का विषयवस्तु भारी-भरकम है लेकिन इसका ट्रीटमेंट बहुत ही सीधा और सरल है बिलकुल मक्खन […]

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    “रागदेश” जिसे अनसुना कर दिया गया – जावेद अनीस
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    “रागदेश” जिसे अनसुना कर दिया गया —- जावेद अनीस —- उग्र राष्ट्रवाद के इस कानफाडू दौर में राज्यसभा टेलीविजन ने “राग देश” फिल्म बनायी है जो पिछले 28 जुलाई को रिलीज हुई और जल्दी ही परदे से उतर भी गयी. वैसे तो यह एक इतिहास की फिल्म है लेकिन अपने विषयवस्तु और ट्रीटमेंट की वजह से […]

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    फिल्म समीक्षा – न्यूटन “वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले समाज की स्थापना में चुनौतियां”- वीरेन्द्र जैन
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    फिल्म समीक्षा ; न्यूटन वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले समाज की स्थापना में चुनौतियां —- वीरेन्द्र जैन —– फिल्म मीडिया ऐसा बहु आयामी कला माध्यम है जो कथा/ घटना, दृश्य, अभिनय, गीत, संगीत, तकनीक आदि के माध्यम से जो प्रभाव पैदा करती है वह जरूरी नहीं कि किसी सम्वाद के शब्दों में सुनायी देता हो। न्यूटन भी ऐसी […]

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    फिल्म समीक्षा – लिपिस्टिक अन्डर माई बुरका – वीरेन्द्र जैन
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    स्त्री यौनिकता के वर्जित प्रश्न को उठाने की कोशिश —– वीरेन्द्र जैन —— प्रकाश झा इस बात के लिए जाने जाते हैं कि वे सतही सम्वेदनाओं वाले किशोर मानस के किस्सों वाले आम व्यावसायिक सिनेमा से अलग सामाजिक विषय उठाते हैं और उन पर बाक्स आफिस हिट फिल्में बनाते हैं। लिपिस्टिक अन्डर माई बुरका भी […]

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    हदों को तोड़ती “लिपस्टिक अंडर माई बुर्का” – जावेद अनीस
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    हदों को तोड़ती “लिपस्टिक अंडर माई बुर्का” —– जावेद अनीस —— बॉलीवुड की ज्यादातर फिल्में दर्शकों से अपना दिमाग सिनेमा हाल से बाहर छोड़ देने की मांग करती हैं लेकिन “लिपस्टिक अंडर माई बुर्का” साल भर में रिलीज हुई उन चुनिन्दा फिल्मों में से हैं जो आपसे मनोरंजन के साथ–साथ सोचने की भी मांग करती है. […]

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    “मैम से माम बनने की यात्रा” – वीरेन्द्र जैन
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    मैम से माम बनने की यात्रा —– वीरेन्द्र जैन —– फिल्मों के प्रचार के लिए हिन्दी अखबारों और पत्रिकाओं का बहुत सा हिस्सा फिल्मी दुनिया की गपशप से भरा हुआ होता है जिसमें तन मन से युवा पाठकों को सतही सम्वेदनाओं में लपेट कर तरह तरह की झूठी सच्ची सूचनाओं के सहारे जोड़ा जाता है। […]

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    वर्ग भेद की पहचान कराती फिल्म ‘हिन्दी मीडियम’ – वीरेन्द्र जैन
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    वर्ग भेद की पहचान कराती फिल्म ‘हिन्दी मीडियम’ —– वीरेन्द्र जैन —— जो लोग फिल्मों की कथा वस्तु और कथा कथन में ताज़गी को पसन्द करते हैं, उनके लिए हिन्दी मीडियम एक बेहतरीन फिल्म है। हमारे जैसे अर्ध-सामंतवादी, अर्ध-पूंजीवादी समाज में अंतर्विरोधों के स्वरूप भी भिन्न भिन्न प्रकार के हैं, जिसमें से एक की कथा […]

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    बेगमजान “यह बेगम जान बेजान है”
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    फिल्म समीक्षा- बेगमजान यह बेगम जान बेजान है —— वीरेन्द्र जैन —— यह वह कहानी है, जो कही नहीं जा सकी। यह वह फिल्म है जो बनायी नहीं जा सकी। एक बुन्देली कहावत को संशोधित कर फिल्म ‘वो सात दिन’ में एक गीत था- अनाड़ी का खेलना, खेल का सत्यानाश। लगता है इस फिल्म के […]

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    डिकोडिंग “रईस”
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    डिकोडिंग “रईस”  —— जावेद अनीस ——- हिंदी सिनेमा देश के मुस्लिम समाज को परदे पर पेश करने के मामले में कंजूस रहा है और ऐसे मौके बहुत दुर्लभ ही रहे हैं जब किसी मुसलमान को मुख्य किरदार या हीरो के तौर पर प्रस्तुत किया गया हो. “गर्म हवा”,“पाकीज़ा”,“चौदहवीं का चांद”,“मेरे हुज़ूर”,“निकाह”,“शमा”, “नसीम”, “चक दे इंडिया”, “इक़बाल”, “माय […]

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    दंगल – लैंगिक भेदभाव पर एक और बेहतरीन फिल्म
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    दंगल – लैंगिक भेदभाव पर एक और बेहतरीन फिल्म —— वीरेन्द्र जैन ——- पिछले दो दशकों से साहित्य में महिला विमर्श को केन्द्र में लाया गया था जिसके प्रभाव में पिछले दिनों लैंगिक भेदभाव को चुनौती देने वाली कई फिल्में बनी हैं जिनमें से कुछ बैंडिट क्वीन, गुलाबी गैंग, नो वन किल्लिड जेसिका, क्वीन, पिंक, […]

  • 'निल बट्टे सन्नाटा’ और घरेलू कामगार महिलायें
    ‘निल बट्टे सन्नाटा’ और घरेलू कामगार महिलायें – जावेद अनीस
    Posted in: फिल्म समीक्षा, मजदूर, महिला

    विदेशों में सभी परिवार “घरेलू सहायक” अफोर्ड नहीं कर पाते हैं क्योंकि उनकी पगार बहुत ज्यादा होती है, लेकिन भारत में “काम वाली बाई” रखना बहुत सस्ता है. शायद इसी वजह से यहाँ घरेलू कामगार महिलायें अदृष्य सी हैं. उनके काम को आर्थिक और सामाजिक रूप से महत्त्व नहीं दिया जाता है, हालाँकि इन दोनों […]

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    हिंसा के परतों के बीच “तितली”
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    ———जावेद अनीस———– जौहर,चोपड़ा और बड़जात्या की फिल्मों में अमूमन सुखी और संपन्न परिवारों के बारे में बताया जाता है,जहाँ नैतिकता व संस्कारों का ध्यान हद दर्जे तक रखा जाता है.वहां कोई टकराहट नहीं होती है और ये हर तरह से एक आदर्श परिवार होते हैं जहाँ सभी लोग खुश रहते हैं. यह सब दर्शकों को […]

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