हमें अच्छे दिनों का इंतजार है

4:21 pm or May 26, 2014
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विवेकानंद-

बीजेपी के एक पुराने नेता हैं। मौजूदा मोदी सरकार के पहले जब अटल सरकार बनी थी, तब वे उसमें मंत्री बने थे। इन नेताजी ने अटल सरकार के एक वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में एक खुलासा किया था। इस खुलासे से यह संकेत मिला था कि उस वक्त बीजेपी ने चुनाव में जनता से जो वादे किए थे, वे बस यूं ही किए हैं, उनके पीछे न कोई गभीरता थी न कोई दृष्टिकोण। इन नेताजी का नाम है मोहन गुरू स्वामी। इन्होंने उस वक्त एक अखबार को दिए साक्षात्कार में बताया था कि घोषणा पत्र बनाते वक्त अटलजी ने कहा था, इसमें बम फोड़ने की बात होनी चाहिए। जब उनसे पूछा गया कि कौन सा बम, इस पर उनका जवाब था कि एक ही बम नहीं होता, बस लिख दीजिए हो गई बात खत्म। इस तथ्य में कितनी सत्यता है यह तो वही जानें लेकिन, गलत होने की गुंजाईश इसलिए कम है क्योंकि यह बात उन्होंने चोरी-छिपे नहीं की थी। हालांकि वाजपेयी जी धमाका करने में कामयाब रहे थे। उन्होंने कांग्रेस सरकार के तैयार पड़े परमाणु बम का परीक्षण कर धमाका किया था और सारा श्रेय एनडीए सरकार को मिला था। लेकिन जिस बेतकुल्लफी से यह बात घोषणा पत्र में डाली गई थी, उससे साफ जाहिर है बीजेपी जिस पोखरण को अपनी उपलब्धि बताती रहती है उसके प्रति गभीर नहीं थी। कुछ ऐसे ही वादे इस बार किए गए हैं, जिस पर सवाल खड़े हो सकते हैं कि इन पर मोदी सरकार गभीर है या नहीं। मसलन यह बड़ा गोल-मोल जुमला है कि अच्छे दिन आने वाले हैं। इससे कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कुछ उत्साही बीजेपी कार्यकर्ता तो यहां तक कहते हैं, सच कहूं तो देश के मतदाता भी यह मानकर चल रहा है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही पाकिस्तान शरण में आ जाएगा। चीन घुटने टेक देगा। अमेरिका आगे-पीछे घूमेगा। महंगाई शून्य के करीब आ जाएगी। पेट्रोल-डीजल के दाम 10 रुपए या 20 रुपए लीटर हो जाएंगे। विकास के मामले में देश पश्चिमी देशों को पीछे छोड़ देगा, आदित्यादि। यदि वाकई ऐसा कुछ होने वाला है तो मैं भगवान से प्रार्थना करूंगा कि अब इस देश में अनंतकाल तक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री रहें और बीजेपी की सरकार रहे। संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद मोदीजी ने जिस तरह का हवा से भरे गिलास का आशावाद दिखाया है, वह बहुत गहरे संकेत देता है। और चूंकि एनडीए की पूर्व सरकार को लेकर अनुभव अच्छे नहीं हैं और जो चीज हवा से भरी होती है वह मामूली सी सुई चुभने पर फूट जाती है, इसलिए भी बीजेपी द्वारा किए गए वादे बस वादे ही लगते हैं।

अटल जी ने धमाका तो कर दिया, लेकिन इसके बाद जो-जो धमाके हुए वे देश के दामन पर दाग की तरह हैं। यह और बात है कि कुछ वाकयों को बीजेपी वाले विजय दिवस के रूप में मनाते हैं। लेकिन अब यदि हवा निकल गई तो यह देश के लिए न केवल दुखदायी होगा, शर्मनाक भी होगा। क्योंकि मोदी को लोगों ने विकास और साहस का चरम बिंदु मानकर छप्परफाड़ वोट दिया है। वाकई यह उनकी उम्मीदों का चुनाव है। इसलिए परीक्षा और कठिन है। और जो शुरूआती लक्षण दिख रहे हैं वे हवा से भरे दिखाई दे रहे हैं।

मोदी और समूची बीजेपी ने चुनाव के दौरान विकास के इतर भावनात्मक मुद्दों पर प्रचार यादा किया। जिसमें आम आदमी की समस्याओं से लेकर धार्मिक मुद्दे भी शामिल रहे। चुनाव से पहले वे कश्मीर में धारा 370 का मुद्दा उठाकर आए और ऐन चुनाव के अंतिम वक्त में उन्होंने फैजाबाद में राम मंदिर का मुद्दा बिना बोले उठा दिया। चुनाव से पहले जब नरेंद्र मोदी को पीएम इन वेटिंग बनाया जाना था तब विश्व हिंदू परिषद और इसके बेलगाम नेताओं ने धर्म संसद जैसे आयोजन किए और बार-बार घोषणा की कि मोदी यदि प्रधानमंत्री बने तो राम मंदिर बन जाएगा। बीजेपी ने इसका जिक्र अपने घोषणा पत्र में भी किया, बस अंदाज-बयां-अलग था। अब उम्मीद यही करनी चाहिए कि राम मंदिर के साथ बीजेपी के जो बुनियादी मुद्दे हैं यानि धारा 370 और समान नागरिक संहिता जिसका जिक्र मोदी ने चुनाव के दौरान अपने एक इंटरव्यू में किया था, उसे लागू किया जाएगा। वैसे भी बीजेपी की हमेशा यही मांग रही है एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे। पिछली बार जब एनडीए की सरकार बनी थी तब बीजेपी इन्हें पूरा नहीं कर पाने का कारण बताती थी कि उसे बहुमत नहीं मिला है, इसलिए कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के तहत सरकार चलेगी। बीजेपी ने यह बहाना लगातार दोहराया और उसके बाद सत्ता से बाहर हो गई। उस दौरान आरएसएस नेताओं ने यहां तक लिखा था कि यदि अटल की जगह आडवाणी प्रधानमंत्री होते तो यादा बेहतर होता। बहरहाल अब बीजेपी यह काम कर सकती है। क्योंकि अब न तो उसे किसी कॉमन मिनिमम प्रोग्राम पर सरकार चलाने की जरूरत है और न ही वह अल्पमत में है। देशवासियों ने बीजेपी को पूर्ण बहुमत दिया है। लेकिन बीजेपी ऐसा नहीं करेगी, वह इसके लिए फिर कोई नए बहाने खोजेगी इसके संकेत मोदी के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने से पहले ही मिल गए। चुनाव से पहले जो विहिप नेता गला फाड़कर मंदिर निर्माण की बात कर रहे थे, चुनाव का फैसला आने के बाद उनके सुर बदल गए। अशोक सिंघल जी पहले कहते थे जो मंदिर बनाएगा हम उसका साथ देंगे और अब वे कहते हैं कि मंदिर निर्माण का संवैधानिक रास्ता निकाला जाएगा। संघ के विचारक एमजी वैद्य ने अपने ब्लॉग में कहा है कि अब पूर्ण बहुमत है इसलिए इन पर आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन बीजेपी के किसी नेता ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया है। यानि बात साफ है, केस सुप्रीम कोर्ट में है और जब तक देश की सबसे बड़ी अदालत में यह केस रहेगा सरकार अपने स्तर पर कुछ नहीं कर सकती। मतलब मंदिर नहीं बनेगा। आस्था के अच्छे दिन नहीं आएंगे। धारा 370 का मुद्दा चुनाव से ऐन पहले तो उठाया गया लेकिन चुनाव के दौरान उसकी चर्चा नहीं की गई। यानि यह मुद्दा भी खत्म हो गया। समान नागरिक संहिता की चर्चा मोदी जी ने इंटरव्यू में कही, लेकिन इस स्पष्टीकरण के साथ कि यह सब पर थोपी नहीं जाएगी। और अंत में बीजेपी नेताओं ने ऐलान कर दिया कि सरकार सहयोगियों को साथ लेकर चलेगी। इसमें केवल शिवसेना ऐसी है, जो मंदिर और धारा 370 को लेकर बीजेपी का साथ दे सकती है। अन्य दल इसका विरोध करेंगे। यानि तीनों मुद्दों से बीजेपी ने कुर्सी पर बैठने से पहले ही मुंह फेर लिया है।

अब बात आती है महंगाई की। महंगाई को लेकर नरेंद्र मोदी सहित बीजेपी के तमाम नेताओं ने यूपीए सरकार को कटघरे में खड़ा किया और कई बार तो जमकर खरीखोटी भी सुनाई। लेकिन बीजेपी महंगाई को खुद किस तरह काबू में करेगी इसका कोई भरोसा या फार्मूला उसने नहीं बताया। और तो और चुनाव के दौरान एनडीए सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने कहा था कि चिदंबरम को मेरा जैसा वित्त मंत्री होने के लिए एक और जन्म लेना पड़ेगा। मैं समझता हूं उन्होंने ठीक ही कहा था। क्योंकि एनडीए सरकार के इन वित्तमंत्री की योग्यता को लेकर तभी बातें साफ होने लगी थीं जब इनकी सरकार थी। पूर्व वित्त एवं वाणिय सचिव एसपी शुक्ला ने तब अटल सरकार के एक साल के कार्यकाल का आंकलन करते हुए लिखा था कि डॉ. मनमोहन सिंह से असहमत हुआ जा सकता है, पर वह इस अर्थ में एक काबिल वित्त मंत्री थे कि उन्हें जो करना था, उसका स्पष्ट विजन उनके पास था। उन्होंने यह भी लिखा था कि पी चिदंबरम भी साहसी और जोखिम उठाने वाले साबित हुए हैं, पर यशवंत सिन्हा के पास न विजन है न साहस। वे प्राय: दिग्भ्रमित दिखाई देते हैं। जाहिर है ऐसा होने के लिए किसी भी नेता वह चाहे बीजेपी में ही क्यों न हो, उसे दोबारा जन्म लेना ही पड़ेगा।

खैर! अब तो अच्छे दिन आने वाले हैं, हो सकता है यशवंत सिन्हा जैसा कोई समझदार वित्त मंत्री देश को मिल जाए, वह महंगाई भी घटा दे और विदेश मंत्री कोई ऐसा मंतर फूंके कि चंद दिनों में ही सारा कालाधन वापस लौट आए तो देश के कई ईमानदार लोग तो बैठे-बिठाए लखपति हो जाएंगे। देखना यह हैं कि यह अच्छे दिन आने में कितना वक्त लगता है?

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