प्रदूषित होती नदियों को बचाने का संकल्प

4:21 pm or October 27, 2014
ganga_2

– योगेन्द्र सिंह परिहार –

आज पूरे देश में गंगा सफाई की गूंज सुनाई दे रही है । कहा जा रहा है गंगा नदी हमारे देश की लाईफ लाईन है । निःसंदेह गंगा नदी का अपना पौराणिक और धार्मिक महत्व है और मोक्ष दायिनी के रुप में पूरे विश्व में गंगा जी का नाम आता है। परंतु मुझे लगता है कि जो नदी आपके आस पास बह रही है वही आपके क्षेत्र की लाईफ लाईन है। नदियों, पहाड़ों, पेड़ पौधों का अपना एक महत्व है। प्राचीन काल में जब छोटे छोटे कस्बों और गांवों की बसाहट शुरु हुई तब सबसे ज्यादा इसी बात पर ध्यान दिया गया कि ये कस्बें या गांव किसी नदी के किनारे बसाये जायें। नदी के पानी का प्रत्यक्ष उपयोग पेय जल और फसलों की सिंचाई के लिए होता है। पशु, पक्षी और सभी तरह के जानवर नदी के जल से ही अपनी प्यास बुझाते हैं। नदियां अप्रत्यक्ष रुप से बड़ा कार्य करती हैं जिसमें जमीन का जल स्तर बनाये रखने में नदियों की सबसे अहम भूमिका है । लेकिन अब जमीन का जल स्तर कम से कमतर होता जा रहा है और उसका सबसे बड़ा कारण नदियों के जल का प्रदूषित होना है ।

नदियों की साफ सफाई का दायित्व हर नागरिक का है। नदियों के प्रदूषित होने के कारणों पर जाये तो सबसे चैंकाने वाला एक ही कारण सामने आता है धार्मिक और अन्य परंपराओं के निर्वहन करने में हमने नदियों की अस्मिता से खिलवाड़ किया। हम अपने घरों में हवन पूजन करते हैं और हवन की राख और फूल आदि नदियों में विसर्जित कर देते  हैं। आज कल नदियों में दीप दान का चलन काफी जोरों पर है। कागज एवं पत्तों के दोने आदि में दीप जला कर नदी के जल में प्रवाहित किया जाता है। गणेश भगवान एवं दुर्गा माता की प्रतिमाओं का विसर्जन नदी में होता है, इसी तरह दाह संस्कार के बाद मनुष्य की अस्थियों का विसर्जन भी नदियों में होता है। आस पास की फैक्ट्रियों का गंदा पानी भी नदियों में छोड़ा जाता है ।

नदियों में विसर्जित की गई चीजें नदी की सतह या किनारे पर एकत्रित हो जाती हैं जिससे नदी का जल प्रदूषित हो जाता है, साथ ही साथ वातावरण भी दूषित हो जाता है । प्रतिमाओं के विसर्जन से प्रतिमा के निर्माण में उपयोग में लाई जाने वाली गाद नदी की सतह पर जम जाती है और भूजल पुनर्भरण (Ground Water Recharge) पर इसका सीधा असर पड़ता है। इसी वजह से भूजल स्तर लगभग खत्म होता जा रहा है। षास्त्रों में गणेश और दुर्गा प्रतिमाओं के स्थापित करने का कोई उल्लेख नही आता। हां गणेश जी और दुर्गा जी की विषेश आराधना के मुहुर्त पंचागों में वर्णित हैं। बाल गंगाधर तिलक ने समाज को एकता के सूत्र में बांधने के उद्देष्य से महाराष्ट्र में गणेश उत्सव की षुरुआत की। लेकिन अब ये उद्देष्य खत्म होता जा रहा है समाज भिन्न जाति और वर्गो में बंट गया है लोग एक साथ खड़े होना पसंद नही करते । करोड़ों रु के इन उत्सवों में वातावरण ध्वनि प्रदूषण से ग्रसित हो जाता है और विसर्जन के दौरान नदियां प्रदूषित हो जाती हैं।

हमें अपनी आदतों में सुधार करना होगा । नदियों में हर तरह का विसर्जन बंद कर देना चाहिए चाहे वो प्रतिमा हो, चाहे पुष्प, चाहे अस्थियां। आज ही हम जबलपुर भेड़ाघाट रोड पर नर्मदा जी के सरस्वती घाट में हमारे मौसी के बेटे की खारी में अस्थियां एकत्रित कर विसर्जन के लिए गये थे। हम लोगों ने देखा कि घाट के किनारे पर पहले से अस्थियां पड़ी हुई थी जो पहले कोई और विसर्जित करके गया था। हम अपनी भावनाओं की पूर्ति के लिए अपने हिस्से का कार्य करके निकल जाते हैं बाद की स्थिति के बारे में सोचते भी नही। अपने मां, पिता, भाई एवं बहन की अस्थियां नदी में विसर्जन करने के बाद अस्थियां किनारे पर टिक जाती हैं और फिर लोगों के पैरों में आने लगती हैं। तब कितना बड़ा अपमान होता है, ये गंभीरता से सोचने का विषय है । अच्छा होगा कि हम इलेक्ट्रिक शवदाह  ग्रह को बढ़ावा दें, दाहसंस्कार की इस क्रिया में एक ही बार में पूरा शरीर राख हो जाता है। आप अपने मन की तृप्ति के लिए एक चुटकी राख नदी में विसर्जित कर दें बाकि बची हुई राख मिट्टी मे मिला दें फिर एक फलदार पौधा लगायें और वो मिट्टी उसमें डाल दें। और उसमेंष्मृत शरीर को पुनः उस पौधे के रुप में जीवित कर दें । मृत आत्मा को सच्ची श्रद्धांजली देने का इससे अच्छा और कोई उपाय नही हो सकता और इस तरह हम नदियों को प्रदूषण से बचाने का एक कदम बढ़ा सकते हैं।

हम अक्सर अपने घर में विधि विधान से पार्थिव शिवलिंग पूजन एवं अभिशेक करते हैं। विसर्जन मंत्रो से शिव जी को विदा करते हैं तत्पष्चात एक बाल्टी में पानी भर कर उसमें शिवलिंग का डुबो देते हैं  जब मिट्टी अच्छी तरह गल जाती है तो मिट्टी गार्डन में डाल देते हैं और पुष्प एवं अभिषेक का जल आदि भी गढ्ढा खोद कर गार्डन या खेत की जमीन में डाल देते हैं और इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का प्रदूषण नही होता और हमारी आस्था एवं श्रद्धा भी बनी रहती है।

किसी भी तरह का सुधार आप के स्वयं के पहल करने से है, नदियां वास्तव में जीवन दायिनी हैं हमें उन्हे सुरक्षित और संरक्षित करने का संकल्प लेना चाहिए और ऐसा करने के लिए परंपरायें बदलनी पड़े तो बदल देनी चाहिए । मैने कहीं सुना था कि परंपराओं की लकीरें यदि धुंधली पड़ने लगे तो नई लकीर खींचने से परहेज नही करना चाहिए।

Tagged with:     , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in