बेटियों की चिंता: हकीकत में कम,कागज पर ज्यादा

4:39 pm or October 27, 2014
Save Girl Child

– अमिताभ पाण्डेय –

मध्यप्रदेश में बेटियों की कम होती संख्या को बढाने के लिए सरकार बेटी बचाओं अभियान चला रही है। इस अभियान में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की विशेष् रूचि होने से प्रशासन ही नहीं सामाजिक और राजनीतिक दल से जुडें लोग भी बेटी बचाओं अभियान को सफल बनाने के लिए तरह तरह के आयोजन करते नजर आते हैं। राज्य सरकार ने इस अभियान के लिए बडे बजट के साथ विशेष कार्ययोजना को प्रारंभ किया है। अभियान के अन्तर्गत प्रचार प्रसार पर भी बडी रकम खर्च की जा चुकी है। इसके बावजूद बेटियों की जान पर संकट बना हुआ है। गर्भ में बेटी का पता चलते ही मार दिये जाने से लेकर, कचरे के ढेर पर फ़ेंक  कर चले जाने, नवजात बेटी को सडक किनारे छोड़कर भाग जाने, जन्म होते ही लापरवाही पूर्वक मार दिये जाने की घटनाएं लगातार हो रही हैं, होती चली जा रही है। गर्भ में बेटी का पता चलते ही मार देने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले डाक्टरों पर कडी कार्यवाही सुनिश्चित नहीं हो पाती । सरकार ने लिंग की जांच, भ्रृण के परीक्षण पर प्रतिबंध लगा रखा है फिर भी यह हो रहा है। अनेक डाक्टर न तो लिंग भ्रृण परीक्षण की जांच से इंकार कर रहे है और न ही पुलिस कचरे के ढेर में नवजात बेटी को छोड़कर भाग जाने वाले सभी आरोपियों को पकड पा रही है। बेटी के नाम से नफरत का सिलसिला उसके पैदा होने से पहले और पैदा हो जाने के बाद तक रूक नहीं पा रहा है। बेटी बचाने के लिए चलाये जा रहे जागरूकता अभियान भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे है।

इधर प्रशासन का हाल यह है कि बेटी बचाओं अभियान को जितनी गंभीरता से लिया जाना चाहिये उतनी गंभीरता से सारे अधिकारी कर्मचारी काम नहीं कर रहे है। सरकारी फाईलों में बेटी बचाओं अभियान की जो तस्वीर पेश् की जा रही है हकीगत में सभी जगह ऐसा नहीं हो रहा है। सरकारी कार्यालयों में फर्जी आंकडों के दम पर वाही वाही लूटने के शौकीन अनेक अधिकारी कर्मचारी ऐसे हैं जो मैदानी स्तर पर जाकर सच्चाई का पता लगाने के बजाय बैठे बैठे ही आंकडों से फाईलों का पेट भर रहे है। मंत्री मुख्यमंत्री तक को कुछ अधिकारियों कर्मचारियों द्वारा गुमराह किया जा रहा है। मध्यप्रदेश के एक जिले में बेटियों की बढती संख्या के झूठे आंकडें महिला बाल विकास मंत्री के सामनें रखे गये तो उन्होंने भी स्वीकार किया कि बेटी बचाओं अभियान के अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे है। हाल यह है कि झूठे आकंडों की सच्चाई का पता लगाने के लिए मंत्री की ओर से कोई प्रयास नहीं किये गये। एक सामाजिक संस्था के कार्यकर्ताओं ने मंत्री को जब आंकडों का सच बताया तब उन्होंने कलेक्टर को इसकी सच्चाई का पता लगाने के निर्देष दिये। यदि सामाजिक संस्थाओं के कार्यकर्ता झूठे आंकडों को उजागर न करें तो मंत्री हों या मुख्यमंत्री सब झूठे आंकडों को देखकर प्रसन्न हो सकते है।

हाल ही में बेटी बचाओं अभियान के तहत पेश किये जा रहे झूठे आंकडों की सच्चाई मध्यप्रदेश के भिण्ड जिले में सामने आई । भिण्ड जिले के खरौआ गाँव में सरकारी आंकडों के अनुसार बेटियों की संख्या को बढना बताया गया। शासकीय आंकडों के मुताबिक इस गाँव  में 1000 लड़कों पर 1078 लड़कियों का होना बताया गया । सच्चाई यह है कि आज भी गाँव में बेटियों की सख्ंया लडकों की तुलना में आधी भी नहीं है । इस क्षेत्र में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता शिवाजी शेखावत का कहना है कि सर्वे में दिये गये आंकडें गलत हैं । यदि दोबारा सर्वे कराया जाये तो 1000 लडकों पर खरौआ गाँव  में 500 लड़कियाँ भी नहीं मिलेगी।

सरकारी आंकडों में बेटियों की बढ़ी हुई संख्या को बढानें के लिए कई बार उन बेटियों को भी शामिल कर लिया जाता है जिनकी पहले ही मौत हो चुकी है। इस सम्बन्ध में खरौआ गाँव के निवासी जितेंन्द्र गूजर का उल्लेख जरूरी होगा। विगत 11 जून 2012 को उसकी पत्नी ने भिण्ड जिले के गोहद नगर के अस्पताल में स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया था। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद ही नवजात बेटी की मौत हो गई । मृत बच्ची का नाम अब भी गांव की आशा कार्यकर्ता के रजिस्टर  में लिखा हुआ है। यह केवल एक उदाहरण है । ऐसी और भी कई बेटिया  सरकारी रजिस्टर के मुताबिक जिवित हैं जिनकी पहले ही मौत हो चुकी है।

यहाँ  यह बताना जरूरी होगा कि भिण्ड जिला ही नहीं बल्कि पूरा ग्वालियर चम्बल संभाग बेटियों की कम होती संख्या के लिए बदनाम है। इस संभाग  में बेटियों को जन्म देने के तत्काल बाद मार डालने के घटनाएं अब दबे छुपे होती है। पहले तो बेटी के पैदा होते ही उसके मुंह में तम्बाकू डालकर मार दिया जाता था। बेटी को बोझ मानने की मानसिकता इस इलाके में पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई । उल्लेखनीय है कि भिण्ड जिले का खरौआ गांव तो सम्पूर्ण मध्यप्रदेश का ऐसा गांव  है जहॅा बेटियों की संख्या सबसे कम हे। बेटी बचाओं अभियान के कारण सरकारी अफसरों कर्मचारियों को इस अभियान की सफलता बताना जरूरी है । शायद  इसलिए मरी हुई बेटियों को भी जिंदा बेटियों की सूची में जोडकर यह बताने की कोशिश की जा रही है कि अभियान सफल हो गया। अभियान के लिए जुटाये गये सरकारी आंकडों पर भरोसा करं भिण्ड जिले के एक दर्जन गावों में अब बेटियों की सख्ंया लडकों से अधिक है जबकि सामाजिक कार्यकताओं का कहना है कि ये गलत है । अभियान की सफलता को बताने के लिए झूठे आंकडों का सहारा लिया जा रहा है।

सवाल यह है कि झूठे आंकडों से मंत्री मुख्यमंत्री को गलत जानकारी देने वालों की पहचान और उनके विरूध्द कडी कार्यवाही कभी संभव होगी भी या नहीं ? ऐसा इसलिये है कि झूठे आंकडे,गलत जानकारी देने के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं लेकिन कडी कार्यवाही के नाम पर प्रभावशाली अधिकारियों,जिम्मेदार लोगों को जांच के नाम पर बचाने की कार्यवाही शुरू हो जाती है। जांच  में किसी बडे अफसर पर आंच  नहीं आती । क्या ऐसे मामलों में जिला स्तर के अधिकारी को जिम्मेदार नहीं माना चाहिये? जब तक बडे स्तर के अफसरों पर कार्यवाही नहीं होगी तब तक झूठे आंकडों के दम पर वाही वाही लूटने सिलसिला बंद नहीं होगा।

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