चल बसा सरिस्का का कसाई

1:06 pm or April 7, 2014
0704201412

डॉ. महेश परिमल-

चुनाव के इस मौसम में पर्यावरणविदों के लिए एक खबर ने राहत दी है। अब यदि यह कहा जाए कि संसार चंद चल बसा, तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। पर जो संसार चंद को जानते हैं, वे यह भी अच्छी तरह से जानते हैं कि उससे बड़ा कसाई आज तक पैदा ही नहीं हुआ। वह तो सरिस्का का वीरप्पन था। उस पर 850 बाघों की हत्या का आरोप था। उसने 2004 में राजस्थान के सरिस्का अभयारण्य में बाघों की पूरी बस्ती का ही खात्मा कर दिया था। बाघों के अलावा उसने कुल 5 हजार जंगली जानकारों के शिकार का भी आरोप था। वह इनका शिकार कर उसके चमड़े और दांत का बड़ा व्यापारी था। उसने करीब 50 हजार भेडिए और सियार का भी शिकार किया था। ऐसा नराधम कैंसर से मर गया। लोगों का मानना है कि उसकी यह मौत इतनी आसान नहीं होनी थी। उसकी मौत इससे भी बदतर होनी थी। दिल्ली के सदर बाजार से अपनी जिंदगी शुरू करने वाला संसार चंद को इस हालत में लाने के लिए हमारे देश का भ्रष्ट तंत्र ही दोषी है। वनविभाग के रिश्वतखोर अधिकारियों के कारण ही वह इतना आगे बढ़ पाया। इतने जानवरों की हत्या के आरोपी इस व्यक्ति को सरकार ने केवल तीन साल की सजा दी थी। उसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर संसार चंद को छोड़ दिया गया, तो यह इंसानों की खाल भी बेच देगा।

1974 में संसार चंद जब पहली बार बाघ और चीते की 680 खालों के साथ पकड़ा गया, तो लोगों की नजरों में पहली बार सामने आया। तब तक उसे पर 57 मामले चल रहे थे। उसके साथ उसकी पत्नी, पुत्र और भाई भी शामिल थे। इसके पहले वह केवल 16 वर्ष की आयु में पकड़ा गया था। उस समय उसे बहुत ही मामूली सजा हुई। उसकी उम्र को देखते हुए हाईकोर्ट ने उसकी सजा कम कर दी थी। सजा पूरी कर जब वह जेल से बाहर आया, तब उसने जो हरकतें की, उससे पर्यावरण प्रेमियों को लगा कि उसे और सजा मिलनी थी। क्योंकि सजा पूरी करने के बाद वह वन्य प्राणियों के लिए काल बन गया। उस पर वन्यप्राणियों की हत्या का केस चला। पर रिश्वतखोर वनविभाग के अधिकारियों द्वारा साक्ष्य ठीक से न जुटाए जाने के कारण उसे वैसी सजा नहीं हो पाई, जिसका वह वास्तविक रूप से हकदार था। हर बार वह कानून के जाल से छिटक जाता। इसीलिए कुछ समय बाद ही वह बाघों के चमड़े का अंतरराष्ट्रीय व्यापारी बन गया। आश्चर्य इस बात का है कि वह बिना किसी भय के सरिस्का में बाघ का शिकार करता। उसके लिए किसी प्रकार की रोकटोक नहीं थी। समझा जा सकता है कि वनविभाग में उसकी कितनी पैठ थी?

राजस्थान पुलिस ने 2004 में जब संसारचंद के परिवार के पास से उसकी गोपनीय डायरी कब्जे में ली, तब पता चला कि उसने 40 बाघों के चमड़े और 400 चीते के चमड़ों का सौदा किया था। यह सौदे अक्टूबर 2003 से सितम्बर 2004 के बीच यानी केवल 11 महीनों में ही हुए थे। इस बारे में जब संसारचंद से पूछताछ हुई, तब उसने कबूला कि उसे बाघ के 470 और चीते के 2130 चमड़ों को नेपाल और तिब्बत के ग्राहकों को बेचा है। सितम्बर 2004 में जब उसके पास से बाघ के 60 किलो जबड़े बरामद किए गए, तब सभी चौंक उठे थे। सरिस्का में उसका इतना अधिक आतंक था कि उसने एक के बाद एक करके सैकड़ों बाघों को मार डाला, पर प्रशासन पूरी तरह से गाफिल बना रहा। वनविभाग केवल उसका तमाशा ही देखता रहा। वन्यप्राणियों के चमड़े और जबड़े की मांग हमारे देश की अपेक्षा चीन में अधिक होने के कारण संसार चंद ने तगड़ी कमाई की। चीन के बाघ के अंगों से कई चीजें बनाई जाती हैं। इससे उसकी और कमाई बढ़ने लगी। तब वह और अधिक बाघों का शिकार करने लगा। कुछ समय बाद तो वह इसका इतना अधिक आदी हो गया था कि जब तक वह बाघ का शिकार न कर ले, उसे चौन नहीं मिलता था। बाद में वह वन्य प्राणियों को जहर देकर मारने लगा। जिसका वह चमड़ा उतार लेता था। जब वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ के कार्यकर्ताओं ने जब यह बताया कि ल्हासा में बाघ और चीते के चमड़े खुले आम बिक रहे हैं, तब सरकारी तंत्र जागा। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। चीन के लोग बाघ और चीते के चमड़ों की मुंहमांगी कीमत देने को तैयार थे। इसलिए वह अधिक से अधिक बाघों का शिकार कर मांग के अनुसार पूर्ति करता। संसार चंद के खिलाफ कार्रवाई के लिए जब चारों तरफ से दबाव बढ़ने लगा, तब सीबीआई ने उसके खिलाफ 2005 में ‘मोका’ लगाया। उसकी पत्नी रानी,पुत्र अक्ष और भाई नारायण चंद के खिलाफ विभिन्न अदालतों में मामले पेंडिंग हैं। 2010 में संसार चंद की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसार चंद पिछले 30 सालों से यह गेरकानूनी धांधा कर रहा है। अब वह इस धांधो का आदी हो चुका है। इसलिए उसके लिए अदालत नरम रवैया नहीं अपना सकती। उत्तार प्रदेश और राजस्थान की अदालतों में भी उसके खिलाफ कई मामले पेडिंग हैं। पिछले 18 मार्च को वह कैंसर से ग्रस्त होकर इस दुनिया से चला गया, पर हजारों-लाखों मूक जानवरों और अनेक पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक राहत भरी खबर छोड़ गया।

ऐसा केवल हमारे ही देश में हो सकता है कि पर्यावरण के दुश्मन को मात्र कुछ वर्षो की सजा हो। इसके पहले भी देश में अरबों और करोड़ों का घोटाला करने वाले नेताओं को मामूली सजा हुई। यदि देश में पर्यावरण के खिलाफ काम करने वाले या पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वालों पर कड़ी सजा का प्रावधान हो, तो संसार चंद जैसे लोग पनप ही नहीं पाएं। दूसरी ओर यदि कोई लगातार बाघों का शिकार कर रहा है, उसकी खालें बेच रहा है, तो कहीं न कहीं उसे वनविभाग की शह मिली हुई होगी, तभी वह इस कार्य को अंजाम दे पा रहा है, यह मान लेना चाहिए। संसार चंद ने वनविभाग के अधिकारियों को जमकर रिश्वत दी, इसीलिए वह अपना व्यापार बढ़ा पाया। अब यदि रिश्वतखोर अधिकारियों पर शिकंजा कसा जाए, तो भविष्य में कोई संसार चंद पैदा ही न हो। होना तो यह चाहिए कि संसार चंद जैसे लोगों को किसी प्रकार की शह मिलनी ही नहीं चाहिए। पर ऐसा कभी हो पाता है?

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