भिक्षावृत्ति के कलंक से मुक्ति कब ?

7:50 am or April 14, 2014
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डॉ. गीता गुप्त-

भिक्षावृत्ति किसी भी सभ्य देश के लिए कलंक है। मगर हमारे देश में आज भी सार्वजनिक स्थलों पर भीख मांगते बच्चे, बूढ़े, युवक-युवती आसानी से दिख जाते है जो सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं। क्या आपको विश्वास होगा कि स्वाधीन भारत में आज भी कुछ ऐसे स्थान है जहां भिक्षावृत्ति आजीविका का एकमात्र साधन है। पहले बात करें बिहार की, जहां राजनेता विकास की बात करते नहीं थकते। मगर उसी बिहार में समाज कल्याण विभाग ने भीख मांगने वालों का सर्वेक्षण कर जो तथ्य उजागर किया है वह चकित कर देने वाला है। सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि बिहार में भिक्षावृत्ति अपनाने वालों में ऊंची जाति के शिक्षित, यहां तक कि स्नातक उपाधिधारी भी सम्मिलित हैं। यद्यपि भीख मागने वाले अधिकतर महादलित है। पटना में 2206भिक्षारियों की पहचान की गई। इनमें 1100भिक्षुओं के आधार पर जो आंकड़ा सामने आया उसमें स्नातक एक प्रतिशत, इण्टरमीडिएट तीन से चार प्रतिशत और बड़ी संख्या में साक्षर पाए गए।

सर्वेक्षण के अनुसार, गया जिले में 2356 भिक्षुक पाए गए। जिनमें सामान्य जाति के 80, पिछड़ी जाति के 235, दलित 367 व महादलित 1674 हैं। इनमें 95 प्रतिशत हिन्दू तथा 5 प्रतिशत अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं। भीख मांगने वालों में स्त्रियों की संख्या 64 प्रतिशत और पुरुषों की संख्या 34 प्रतिशत है। इस अमानवीय कार्य को रोकना नितान्त आवश्यक है पर अभी तक किसी सरकार के एजेण्डे में इसका समावेश दिखाई नहीं देता। बिहार सरकार विकास की बड़ी-बड़ी बातें कर देती है जो स्वयं उजागर है। भिखारियों पर किसकी निगाह नहीं जाती ? राज्य, देश या इन सभी को ? लेकिन इसके लिए क्या सरकारें दोषी नहीं, जो अपने नागरिकों को जीविकोपार्जन के लिए सम्मानजनक सहज साधान सुलभ नहीं करा पातीं ?

उत्तर प्रदेश के कानपुर के पनकी क्षेत्र में स्थित कपड़िया बस्ती नामक गांव में तो भीख मांगना सम्मानजनक पेशा माना जाता है। टूटी झोपड़ियां, एक-दो पक्के मकान और कच्ची सड़क वाले इस गांव की जनसंख्या तीन चार हजार होगी। गांव के हर पुरुष, यहां तक कि नवयुवकों के चेहरे पर भी दाढ़ी है। यह दाढ़ी आजीविका के लिए उगायी गई है। बस्ती का हर घर भिक्षा के बूते पर चलता है। प्रतिदिन घर का हर आदमी साधु का वेश धारण कर भीख मांगने निकल पड़ता है। यही उनका धांधा है। बस्ती निवासी एक भिक्षुक ने बीबीसी को बताया कि उनके पूर्वज घूमन्तू जीवन जीते थे और भीख मांगकर पेट भरते थे। लगभग डेढ़-दो सौ वर्ष पूर्व में कानपुर आये। तब पनकी के जमींदार राजा मानसिंह ने घूमन्तुओं से वहीं बस जाने का आग्रह किया। बस, तभी से वे वहां बस गए मगर भिक्षावृत्ति का क्रम जारी रहा। हर दिन गेरुआ वस्त्र लपेट, माथे पर चन्दन लगा, एक हाथ में कटोरा और दूसरे में डंडा लेकर वे भीख मांगने चल पड़ते हैं। भिक्षा के लिए पूरे भारत में भ्रमण करते हैं। नवरात्र में पश्चिम बंगाल, गणेशोत्सव के समय महाराष्ट्र और कुम्भ मेले में उनका इलाहाबाद प्रवास तय रहता है।

विडम्बना देखिए कि उस गांव में शायद ही कोई शिक्षित हो। 80 वर्षीय प्रताप कपड़िया बस्ती में ही पैदा हुए थे। अपने पिता की तरह उन्होंने भी भिक्षावृत्ति से ही जीवन यापन किया और आज उनके चार बेटे भी मन्दिरों में भीख मांगकर अपना गृहस्थ जीवन जी रहे हैं। प्रताप कभी विद्यालय नहीं गये। क्षेत्र के पार्षद अशोक दुबे विडम्बनाओं की बात तो करते हैं मगर इनका कोई हल उन्हें नहीं सूझता और कोई राजनेता भी इस बारे में चिंतित नहीं हैं। सोचने की बात है कि इक्कीसवी शताब्दी में भी कपड़िया बस्ती में अशिक्षा का अंधाकार व्याप्त है। लोग पढ़ते-लिखते नहीं। एक किलोमीटर दूर स्थित विद्यालय में बच्चे केवल मधयान्ह भोजन के लिए जाते हैं फिर हनुमान मंदिर में भीख मांगने की कला सीखते हैं। गांववासी किसी भी शासकीय योजना का लाभ नहीं लेते। परिवार-नियोजन से वे अनभिज्ञ हैं। 65 वर्षीया केसरबाई के 14 बच्चे हैं। उन्हें याद नहीं कि उन्होंने कितने बच्चों को जन्म दिया।

कपड़िया बस्ती में गरीबी नहीं है। लोग भीख मांगकर अच्छा पैसा कमा लेते हैं। एक दिन में 500 रुपए तक की कमाई मामूली बात है। पर्वों के समय कमाई अधिक होती है लेकिन वे शराब में पैसे फूंक देते हैं। शराब को शिवजी का प्रसाद मानने वाले भिखारी नशे में धुत्त होकर मार-पीट करते हैं। पुलिस उनकी बस्ती में आती रहती है लेकिन वे सुधारते नहीं। पार्षद अशोक दुबे का मानना है कि वहां के लोग कभी भिक्षावृत्ति नहीं छोड़ सकेंगे। जीवन-यापन हेतु दूसरा उपाय अपनाने वाले की वहां कद्र नहीं होती। यहां तक कि भीख न मांगने वाले युवक के विवाह में कठिनाई आती है। कानपुर के एक महाविद्यालय में समाजशास्त्र के विभागाधयक्ष तेजबहादुर सिंह के अनुसार कपड़िया बस्ती के लोग केवल भीख मांगकर जी रहे हैं तो यह समाज और देश के लिए हितकर नहीं है। उनमें एक जुनून जगाना होगा ताकि वे इस पेशे को छोड़ सकें। यह सरकार का दायित्व है। दूसरी आवश्यक चीज़ है-शिक्षा। उन्हें शिक्षित करके उनमें आत्मसम्मान जगाना होगा। तीसरी आवश्यक बात है-आर्थिक स्वावलंबन। इसके लिए कपड़िया बस्ती से कुछ ही दूर स्थित कानपुर के औद्योगिक कल-कारखानों में उन्हें काम करने के अवसर सुलभ कराये जा सकते हैं। इन सबके लिए उन्हें मानसिक तौर पर तैयार करना सबसे पहली आवश्यकता है। पर यह बहुत आसान नहीं है। तो क्या भिक्षावृत्ति के कलंक से वह गांव कभी मुक्त ही नहीं होगा, हम यह मान लें ? स्वतंत्र भारत में यदि आज भी लोग आजीविका के लिए कर्म की बजाय भाग्य या दूसरों की दया अथवा भिक्षा पर निर्भर हैं तो यह घोर लज्जास्पद है। इस स्थिति को दृढ़तापूर्वक बदला जाना चाहिए। चाहे इसके लिए कितने भी कठोर कानून क्यों न बनाने पड़ें।

प्रश्न सिर्फ उत्तर प्रदेश और बिहार का नहीं, समूचे देश का है। भिक्षुक हर राज्य में विद्यमान हैं। संख्या कहीं कम या अधिक हो सकती है पर भिक्षावृत्ति का कलंक तो सर्वत्र है। सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए। भीख मांगना कोई सम्मानजनक पेशा नहीं वरन अनैतिक कार्य और अघोषित सामाजिक अपराधा है। जब किसी गैंग या माफिया द्वारा जबरन बच्चों, महिलाओं या किसी से भी भीख मंगवायी जाए, तब यह कानूनन अपराधा भी है। इस विशाल देश में कोई भूखा न रहे और भूख के कारण अपराधा न करे, इसीलिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम का प्रस्ताव लाया गया। पर अब कोई निट्ठल्ला या निष्क्रिय न रहे ऐसा उपाय भी आवश्यक है यानी ‘राइट टू जॉब’ की बात भी करनी होगी। ‘मनरेगा’ इसी दिशा में सरकार द्वारा उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन काम करने की मानसिकता का विकास इसके लिए अनिवार्य है। चूंकि भीख मांगना सभ्य समाज का लक्षण नहीं और आत्मसम्मान तथा स्वाभिमान जाग्रत किए बिना इससे किसी को विमुख नहीं किया जा सकता। अतएव सरकार को शिक्षा के प्रसार पर बल देना चाहिए। शिक्षा ही व्यक्ति को संस्कारित कर उसे चैतन्य और स्वाभिमानी बना सकती है। लेकिन यह अकेले सरकार के बूते की बात नहीं, इसमें सभी समाज सेवी व्यक्तियों और संगठनों को अपना सहयोग देना होगा। तभी देश को भिक्षावृत्ति के कलंक से मुक्ति मिल सकेगी।

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