सेना में यौन प्रताडना श्रीलंका सेना की स्वीकारोक्ति के मायने

8:16 am or April 14, 2014
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अंजलि सिन्हा-

मिलों के आत्मनिर्णय के आन्दोलन को बर्बर ढंग से कुचलने के लिए पूरी दुनिया में आलोचना का शिकार हो रही श्रीलंकाई सेना अब एक नये विवाद में फंसती दिख रही है। श्रीलंका की सेना अपने प्रशिक्षु महिला सैनिकों के साथ यौन शोषण के आरोप में किस तरह संलिप्त रही है इसके प्रमाण सामने आए हैं।

जिन दिनों तमिल विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाइयों में श्रीलंका की सेना सक्रिय थी, उन्हीं दिनों से ऐसे आरोप लगते रहे हैं, लेकिन कभी कोई जांच या सुनवाई नहीं हुई थी। हाल में एक वीडियो रेकॉर्ड कहीं से लीक हुआ जिसकी जांच श्रीलंका की आर्मी मिलिटरी पुलिस ने की। जांच में वीडियो असली बताया गया है तथा सेना की तरफ से यह स्वीकार किया गया है कि महिलाओं के साथ यौन शोषण हुआ है तथा दोषियों के खिलाफ जांच एवं कार्रवाई होगी। वीडियो अक्तूबर 2012 में बनाया गया है और स्थान है उत्तर-मध्य जिले का अनुराधापुर जिसमें प्रशिक्षु महिला सैनिकों को प्रशिक्षु पुरूष सैनिक प्रताडित करते दिख रहे हैं। सरकार ने अपने देश में इस वीडियो को ब्लॉक कर दिया है, लेकिन वेबसाइट पर इसे दूसरे देश अभी भी देख सकते हैं। इसके पहले भी वीडियो द्वारा तथा अन्य सबूतों द्वारा शिकायत आती रही है, लेकिन सेना ने हमेशा उन शिकायतों को खारिज कर दिया है।

वैसे रेखांकित करनेवाली बात यह है कि यौन अत्याचार के आरोप श्रीलंका की सेना पर पहली दफा नहीं लग रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका की मानवाधिकार वकील तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ की सलाहकार यास्मीन सूका ने एक शोध रिपोर्ट जारी करते हुए बताया कि श्रीलंका की सेना युध्द खत्म होने के बावजूद अल्पसंख्यक तमिल समुदाय की महिलाओं के साथ यौन हिंसा करती रही है। बड़े पैमाने पर बलात्कार तथा अप्राकृतिक यौन हिंसा को अंजाम दिया जाता रहा तथा यह सब की जानकारी सरकार में बैठे लोगों को भी थी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

मामला सिर्फ श्रीलंका की सेना का नहीं है बल्कि दुनिया भर के कई देशों की सेनाओं द्वारा अपने मातहत महिला कर्मियों के अलावा आम जनता की महिलाओं को अपनी यौनकुंठा का शिकार बनाया जाता रहता है। सेना के जवानों को अपने विभाग के साथ सरकार से जो शक्ति हासिल है उसका भरपूर दुरूपयोग करते वह दिखते हैं। पिछले दिनों अमेरिकी सेना के अन्दर महिला कर्मियों के साथ कितने बड़े पैमाने पर यौन अत्याचार होता है, इसका खुलासा हुआ था। इसे लेकर ‘ द साइलेन्ट वॉर’ नाम से एक डाक्युमेंटरी भी बनी थी।

पता चला था कि अमेरिका जहां कुल 14 लाख की सेना में सक्रिय महिला सैनिकों की आबादी दो लाख से (14.5 फीसदी) से अधिक है वहां       हाल यह है कि तीन में से एक महिला सैनिक यौन अत्याचार का शिकार होती है। अगर दो साल पुराने आंकड़ों पर गौर करें तो अमेरिकी रक्षा विभाग पेण्टागन की सेक्युअल असॉल्ट प्रीवेन्शन एण्ड रिस्पॉन्स आफिस के मुताबिक अक्तूबर 2010 से सितम्बर 2011 के दरमियान वहां महिला सैनिकों पर यौन हमलों की 3,192 घटनाएं दर्ज की गयीं, जबकि उसका यह भी आकलन है कि महज 14 फीसदी घटनाएं रिपोर्ट हुई अर्थात बाकी घटनाओं को लेकर उत्पीड़ितों ने खामोशी बरतना मुनासिब समझा। अध्ययन यह भी बताता है कि अधिकतर यौन हमले सेना के सदस्यों द्वारा सेना के सदस्यों के खिलाफ ही होते हैं और कई बार सहकर्मी पुरूष सैनिक भी ऐसे हमलों का शिकार बनते हैं हालांकि ऐसे हमलों में पीड़ितों की अधिकतर आबादी 25 साल से कम उम्र की महिला जुनियरों की होती हैं और हमलावरों की ”विशाल आबादी” 35 साल से कम उम्र के पुरूषों की, जो उनसे उंचे पदों पर होते हैं। (http: www.huffingtonpost.com/2012/10/06/military-sexual-assault-defense-department_n_1834196.html)

अगर हम अपने मुल्क की बात करें तो देख सकते हैं कि वह भी इससे अछूता नहीं हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक मुल्क के अन्दर अशान्त घोषित क्षेत्रों में इनके मनमानी की कोई सीमा नहीं दिखती। उत्तर पूर्व के मणिपुर की थांगजाम मनोरमा का किस्सा लम्बे समय तक सूर्खियों में रहा है। मणिपुर जनान्दोलन की इस कार्यकर्ती को असम राइफल्स के जवान घर से ले गए और बाद में उसकी क्षत विक्षत लाश मिली थी, जिसके साथ सामूहिक बलात्कार भी हुआ था। याद रहे कि 2004 में इस मसले पर मणिपुर में व्यापक जनान्दोलन चला था। कश्मीर में भी शोपियां नामक स्थान पर कुछ साल पहले दो महिलाओं के साथ हुए सामूहिक बलात्कार एवं बाद में उनकी मौत को लेकर पूरे राज्य में जबरदस्त आन्दोलन चला था, इसमें भी सेना के जवानों का हाथ बताया गया था।

मगर मामला महज अशान्त क्षेत्रों का ही नहीं हैं। सेना के अन्दर का वातावरण भी काफी मर्दवादी दिखता है। याद रहे कि कुछ साल पहले पंचकुला के काल्का में तैनात सेना की महिला अधिकारी सुश्री पूनम कौर ने सेना के तीन पुरुष अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इसमें साफ नज़र आया था कि पहले सेना ने पूनम की शिकायत को नजरअन्दाज किया। लेकिन मीड़िया में यह बात आने के बाद दबाव बना तब जांच के आदेश दिये। बाद में रक्षामन्त्री ए.के.एण्टनी की ओर से भी जांच का आदेश दिया गया था। चूंकि पूनम ने मीडिया में इस घटना का उल्लेख किया था इसलिए उसके खिलाफ भी जांच के आदेश दिए गए थे।

ऐसा नहीं हैं कि सेना में यौन उत्पीड़न की घटना पूनम के बहाने पहली बार चर्चा में आयी थी। 2005 में एअर फोर्स की फ्लाइंग ऑफिसर अंजलि गुप्ता का उनके सीनियर द्वारा यौन शोषण का मामला सामने आया था लेकिन सेना के अपने कोर्ट ने उल्टे उसे ही सजा सुनायी। 2005 में ही लेफ्टिनेन्ट सुष्मिता चक्रवर्ती ने आत्महत्या की थी। उसने अपने घरवालों को बताया था कि वह देर रात की पार्टी में सहज महसूस नहीं करती है। कॅप्टन नेहा रावत के केस का सुखद अन्त हुआ था जिसमें मेजर जनरल ए. के. लाल को दोषी पाया गया था। यँ तो सेना में पुरुष सैनिक भी भारी दबाव में होता है तथा वह भी अपने अधिकारियों का उत्पीड़न झेलता है तभी आत्महत्याओं की घटनाएं अक्सर सुनाई देती है। लौह अनुशासन के नाम पर प्रताड़ना होती रहती है। सेना के बारे में अभी ऐसी जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन जहां तक पुलिस महकमे का सवाल है वहा के ‘बंगलो बायज्’ के किस्से विभाग में चलते रहते हैं, जिसके तहत चिकनेचुपडे पुरूष पुलिसकर्मियों को वरिष्ठ अधिकारियों के बंगले पर तैनात किया जाता था। प्रश्न उठता है कि एक लोकतांत्रिक कहलानेवाले मुल्क में क्या यह जरूरी नहीं बनता कि समाज की ही तरह सेना में भी यौन अत्याचार के प्रति जीरो टालेरेन्स की नीति बनायी जाय।

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