अवसरवादिता से भरपूर है भारतीय जनता पार्टी का घोषणा पत्र

8:26 am or April 14, 2014
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एल.एस.हरदेनिया-

भारतीय जनता पार्टी ने अपना घोषणा पत्र जारी कर दिया है। घोषणा पत्र में अन्य बातों के अलावा राममंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता की चर्चा है। परंतु इस बार यह चर्चा आक्रामक भाषा में नहीं की गई है। वरन् अत्यधिक दबी जुबान में की गई है। बाबरी मस्जिद के धवंस के बाद राममंदिर की चर्चा आक्रामक भाषा में होती थी, अब भाषा बदल गई है और उसमें वह आक्रामकता नहीं है। स्पष्ट है कि अब शायद भाजपा की समझ में आ गया है कि भगवान राम के सहारे चुनाव की वेतरनी पार नहीं की जा सकती। चूंकि भारतीय जनता पार्टी अब महसूस कर रही है कि यदि केन्द्र की सत्ता हतियाना है तो उसके लिए मुसलमानों का समर्थन चाहिए। इसलिए समान नागरिक संहिता की बात भी उतने जोर से नहीं कही जा रही है। पिछले वर्षों में भाजपा घोषणा पत्र में भी न सिर्फ राममंदिर की बात करती थी बल्कि सनातन धार्म की भी दुहाई देती थी। जैसे 1998 के घोषणा पत्र में यह कहा गया था कि सनातन धर्म भारतीय राष्ट्रवाद का दूसरा नाम है। उसमें इस बात को भी स्पष्ट रूप से कहा गया था कि भाजपा का नारा है एक राष्ट्र, एक जनता और एक संस्कृति और उस घोषणा पत्र में हिंदुत्व की भी चर्चा थी। इसी तरह यह भी वादा किया गया था कि समान नागरिक संहिता बनाने का काम विधि आयोग को सौंपा जाएगा। छह साल तक सत्ता में रहने के बाद न तो राममंदिर बनाया गया, ना ही 307 धारा समाप्त करने के लिए पहल की गई और ना ही समान नागरिक संहिता को बनाने का कार्य विधि आयोग को सौंपा गया। धारा 370 को समाप्त करना कैसे संभव होता क्योंकि धारा 370 के सबसे बड़े समर्थक और कश्मीर के नेशनल कान्फ्रेन्स के नेता फारूख अब्दुल्ला और उनके पुत्र एनडीए के अभिन्न अंग थे। सत्ता में बने रहने के लिए लोकसभा में इनके समर्थन की आवश्यकता थी। इस बार इन तीनों बातों का उल्लेख बहुत ही दबी जुबान से हो रहा है। अगले चुनाव तक शायद इन्हें पूरी तरह से भुला दिया जाएगा।

भारतीय जनता पार्टी कश्मीर से निकाले गए पंडितों को पुन: कश्मीर में भेजने की मांग करती रहती है परंतु सत्ता में रहते हुए वह इस बात को भूल जाती है। इसी तरह भारतीय जनता पार्टी का पूर्व अवतार जनसंघ बड़े जोर-शोर से यह आरोप लगाता था कि डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कश्मीर की जेल में हत्या की गई थी। परंतु सत्ता में रहने के दौरान न तो इस बात का उल्लेख किया गया और न ही डाक्टर मुखर्जी की मृत्यों के कारणों की जांच की गई।

स्पष्ट है सत्ता में आने के लिए भारतीय जनता पार्टी किसी भी प्रकार का समझौता कर सकती है। नरेन्द्र मोदी और भाजपा यह दावा करते हैं कि वे भ्रष्टाचारमुक्त शासन प्रदान करेंगे। परंतु एक के बाद एक भ्रष्टाचारी नेताओं को अपनी पार्टी में प्रवेश देने में उन्हें किसी प्रकार का संकोच नहीं होता। कर्नाटक के येदूरप्पा को भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप में मुख्यमंत्री के पद से हटाया गया परंतु वही येदूरप्पा अब फिर से भारतीय जनता पार्टी में आ गए हैं और इस समय वे कर्नाटक में न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी वरन् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भी लाड़ले हैं। इसी तरह के अनेक उदाहरण हैं जिनमें भाजपा ने अनेक भ्रष्ट नेताओं को अपने दल में स्थान दे दिया है। आपातकाल के दौरान कांग्रेस विरोधी दल एक नारा लगाते थे-संजय, विद्या, बंसीलाल, आपातकाल के तीन दलाल। इनमें संजय गांधी की पत्नि मेनका गांधी और संजय गांधी के पुत्र वरूण गांधी वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता हैं। भारतीय जनता पार्टी में रहने के बावजूद न तो मेनका ने और न ही वरूण गांधी ने संजय गांधी के विचारों को और आपातकाल में उनकी भूमिका की निंदा की है। अभी हाल में तो वरूण गांधी ने अपने पिता संजय गांधी के विचारों और कार्यक्रमों की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की। विद्याचरण जी अब इस दुनिया में नहीं हैं परंतु उन्हें भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पार्टी के टिकट पर लोकसभा के लिए उम्मीदवार बनाया था। इस तरह भारतीय जनता पार्टी उन लोगों को भी स्थान देने में नहीं हिचकिचाती है जो एक समय उनके वैचारिक विरोधी थे। यह अवसरवादिता नहीं तो और क्या है?

इस समय एक प्रश्न और विचारणीय है और वह यह है कि क्या भारतीय जनता पार्टी सैंध्दातिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम के क्रियान्वयन के प्रति प्रतिबध्द है या नहीं? नरेन्द्र मोदी बुनियादी रूप से संघ द्वारा प्रधानमंत्री पद के लिए चयन किए गए हैं। भारतीय जनता पार्टी की अधिकृत वेबसाईट में कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी संघ परिवार का प्रमुख सदस्य है। संघ परिवार का एक निश्चित लक्ष्य है। संघ परिवार हिन्दू पहचान और हिन्दू संस्कृति का प्रतिनिधि है। यहां यह जानना आवश्यक है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनैतिक विचार धारा क्या है? और क्या वह विचारधारा उस विचार धारा से मेल खाती है जिसका आधार भारतीय संविधान है? सच पूछा जाए तो संघ की विचारधारा का मुख्य उद्देश्य उस व्यवस्था को तोड़ना है जो हमारे संविधान द्वारा निर्मित की गई है। इस विचारधारा के अनेक प्रमुख अंग हैं जैसे संघ की राय है कि भारत में एकात्मक शासन प्रणाली लागू करना चाहिए। संघ के अनुसार एकात्मक प्रणाली का अर्थ है एक राष्ट्र, एक शासन, एक न्यायपालिका। संघ के सबसे बड़े विचारक एवं संघ के दूसरे सरसंघचालक श्री गोलवलकर के अनुसार ”संघीय ढांचे के कारण देश में पृथकता की भावना पैदा होती है। संघीय ढांचे के कारण देश एक है कि भावना कमजोर होती है। यदि देश एक है कि भावना को मजबूत करना है तो उसके लिए वर्तमान संघीय ढांचे को कब्र में गाड़ देना चाहिए अर्थात उन सभी राज्यों को समाप्त कर देना चाहिए जिन्हें तथाकथित स्वायक्तता प्रदान की गई है।” क्या भारत जैसे बहुभाषीय, बहुधार्मी, बहुसंस्कृति वाले देश में एकात्मक शासन की कल्पना की जा सकती है? संघ बार-बार यह दावा करता है कि संपूर्ण भारत आर्याव्रत हैं। क्या हम जब संपूर्ण भारत को आर्याव्रत कहते हैं तो हम इस बात को क्यों नहीं सोचते कि इस देश के कुछ भागों में रहने वाले लोग विशेषकर दक्षिण भारत के नागरिक जो अपने को द्रविड़ों की संतान मानते हैं उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी? फिर संघ के अनुसार आज भी मनुस्मृति की प्रासंगिकता है। जब भारत की संविधान सभा ने संविधान को अंतिम रूप दिया था तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मनुस्मृति को भारत का संविधान घोषित नहीं किए जाने पर अप्रसन्नता जाहिर की थी। इस संदर्भ में हम भाजपा विशेषकर नरेन्द्र मोदी से यह जानना चाहेंगे कि क्या वे संघ के सबसे बड़े सपने अर्थात एकात्मक शासन के निर्माण को पूरा करेंगे? क्या वे सत्ता में आने के बाद भारत के संघीय ढांचे को तोड़ने का प्रयास नहीं करेंगे? क्या वे भारत में रह रहे विभिन्न धर्मों को मानने वाले नागरिकों को समान दृष्टि से नहीं देखेंगे? आज जब भारतीय जनता पार्टी मोदी के माध्यम से 2014 के चुनाव में केन्द्र की सत्ता पर काबिज होना चाहती है इस देश के नागरिकों का यह अधिकार है कि वे उनकी उपरोक्त शंकाओं को दूर करने का प्रयास करें।

अंत में इस समय एक और जो खतरनाक नारा चल रहा है उसके प्रति भी ध्यान दिलाना आवश्यक है। भोपाल समेत अनेक स्थानों पर जो होर्डिंग लगे हैं उनमें स्पष्ट रूप से यह लिखा हुआ है कि अबकी बार मोदी सरकार अर्थात अबकी बार भाजपा की नहीं मोदी की सरकार। व्यक्ति के समक्ष पार्टी गौण हो गई है। क्या यह स्वस्थ लोकतंत्र की परपंरा का प्रतीक है? वैसे तो बुनियादी मुद्दा यह भी है कि चुनाव के पूर्व किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना संसदीय प्रणाली के बुनियादी सिध्दांतों के विपरीत है। संसदीय प्रणाली के अनुसार देश का प्रधानमंत्री वह होता है जो लोकसभा की बहुमत पार्टी का नेता होता है और उस नेता का निर्वाचन चुने हुए सांसद करते हैं। फिर एक बात जो स्पष्ट नजर आ रही है कि भारतीय जनता पार्टी अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर पाएगी इसलिए उसे दूसरे सहयोगी दलों के समर्थन की आवश्यकता है। क्या मोदी के लिए इन दलों का समर्थन प्राप्त कर लिया गया है? यदि नहीं तो प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी राय का कोई महत्व नहीं है। शिवसेना भारतीय जनता पार्टी का प्रमुख सहयोगी दल है। हम यहां स्मरण दिलाना चाहेंगे कि शिवसेना के सबसे बड़े नेता बाल ठाकरे ने अपने जीवन काल में सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे योग्य उम्मीदवार बताया था। इसी तरह भारतीय जनता पार्टी के अन्य सहयोगी दलों की भी पृथक राय हो सकती है। स्पष्ट है कि भारतीय जनता पार्टी को उनकी राय की कतई परवाह नहीं। यह विचार ही संसदीय व्यवस्था की बुनियाद को कमजोर करने वाला है।

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