हिन्दी दिवस-14 सितंबर “जनजन की भाषा बनती हिन्दी”

2:50 am or September 8, 2014
Hindi Diwas

डा सुनील शर्मा

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू का कथन है कि- मुझे एक लंबे समय से यकीन रहा है और आज भी है कि भारत की आम जनता की वास्तिविक उन्नति और जन-जागरण अंग्रेजी के जरिये नहीं हो सकता है,आम  जनता के बीच संपर्क की भाषा अंग्रेजी नहीं हो सकती है। इसलिए यह जरूरी है कि हम हिन्दी के बारे में विचार करें। पं नेहरू का दृष्टिकोण हमेशा हिन्दी के प्रति स्पष्ट रहा और हिन्दी को उन्होंने आम आदमी की प्रगति का सोपान माना, उन्होंने अखिल भारतीय भाषा के रूप में सदैव हिन्दी की पैरोकारी की और कहा कि-अखिल भारतीय भाषा कोई हो सकती है तो वह सिर्फ हिन्दी या हिन्दुस्तानी कुछ भी कह लीजिए हो सकती है। अक्सर अ्रंग्रेजी के समर्थक के तौर प्रचारित  पं नेहरू के कथनों से यह ध्वनित होता है कि वह हिन्दी को सम्प्रेषण,संवाद और कामकाज की भाषा बनाना चाहते थे। लेकिन यह अलग बात है कि भाषाई विवादों के चलते हिन्दी को संविधान में वह उच्च और सम्मानित स्थान नहीं मिल सका जिसका वो हकदार थी।लेकिन तटस्थ भाव से देखने पर स्पष्ट है कि  हिन्दी कामकाज की भाषा बनने की हकदार है। क्योंकि यह एक सहज और सरल भाषा है,तथा देश में सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है।यही कारण है कि हिन्दी का न सिर्फ दायरा बढ़ रहा है ,बल्कि कामकाज की भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी है। अब सरकारी विभागों और गैरसरकारी उपक्रमों में भी हिन्दी का परचम लहराने लगा है, कारोबार जगत भी हिन्दी का सहारा लेकर पल्लवित हो रहा है। व्यावसायिक और नीतिगत मींटिंग और सम्मेलन चाहे उत्तर में हो या दक्षिण में, अब हिन्दी में अपनी बात रखना हेय नहीं माना जाता है। मोबाइल और कंप्यूटर पर भी हिन्दी ने मजबूत दस्तक दी है, हिन्दी को सपोर्ट करने वाले मोबाइल सेट की बाजार ज्यादा माॅग है।

हिन्दी को सरकारी प्रोत्साहन भी मिल रहा है। भारत के गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाला राजभाषा विभाग हिन्दी के प्रचार -प्रसार और प्रोत्साहन में जुटा हुआ है। गृहमंत्रालय की राजभाषा इकाई हिन्दी के प्रयोग में आने वाली व्यवहारिक परेशानियों को दूर करने में जुटी है। इस संदर्भ में उसने सरकारी विभागों को एक परिपत्र भी जारी किया है,जिसमें यह निर्देशित है कि अरूचि पैदा करने वाली क्लिष्ट हिन्दी से बचने के लिए अंग्रेजी या अन्य भाषाओं के उन शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है, जो प्रचलन में हैं तथा सरकारी काम काज एवं पत्राचार आदि में जिन्हें आसानी से समझा जा सकता है।सरकार के राजभाषा विभाग के अनुसार सरकारी कार्यालयों में लगभग 70 फीसदी तक हिन्दी का प्रयोग हो रहा है।राजभाषा विभाग ने हिन्दी प्रयोग और प्रचलन के आधार पर देश को क,ख,ग तीन हिस्सों में विभाजित किया है। क’ क्षेत्र के अंतर्गत वे क्षेत्र आते हैं,जहा कामकाज की भाषा के रूप मे हिन्दी का सर्वाधिक प्रयोग होता है।इन क्षेत्रों में लगभग 80 फीसदी तक हिन्दी का प्रयोग होने लगा है।ख और ग क्षेत्रों में भी कामकाज में हिन्दी का प्रतिशत धीरे धीरे बढ़ रहा है। सरकारी कार्यालयों और उपक्रमों में हिन्दी बढ़ते प्रयोग से आम लोगों की सहूलियत बढ़ी है। अब चाहे बैंक की जमा पर्ची हो या खाता खोलने का आवेदन हिन्दी में उपलब्ध है। एक कदम आगें सरकारी योजनाओं और इंटरनेट बैंक जैसी अत्याधुनिक सुविधा भी हिन्दी में उपलब्ध है। सरकारी विभागों के लिए हिन्दी वेबसाइट अनिवार्य की गई है जिससे आम आदमी विभाग को समझ सके। हिन्दी की बढ़ती अह्मियत कोे कारोबार जगत ने भी समझ लिया है,बहुराष्ट्रीय कंपनिया भी हिन्दी की ओर बढ़ रहीं है, क्योंकि उन्हें मालूम है कि भारत में बेहतर कारोबारी नतीजे तभी मिल सकते हैं जबकि उनके कर्मचारी हिन्दी जानें। इसलिए ये कंपनिया भी हिन्दी सीखने पर बल दें रहीं है। शेयर बाजार की सारी जानकारी हिन्दी में उपलब्ध है।बाजार और व्यापार पर आधारित टीवी चैनलों की धूम है।

जहा तक हिन्दी की संवैधानिक स्थिति की बात है तो इसकी स्थिति वैकल्पिक राजभाषा जैसी प्रतीत होती है क्योंकि  संविधान के अनुच्छेद 343 के अंतर्गत हिन्दी को संघ की राजभाषा तथा देवनागरी को संघ की लिपि के रूप में स्वीकार किया गया है लेकिन प्रथम राजभाषा आयोग की रिपोर्ट के अनुसार तथा संविधान के अनुच्छेद 343 के अधीन संसद ने राजभाषा अधिनियम 1963 पारित किया,जिसमें यह व्यवस्था दी गई कि संघ के राजकीय प्रयोजन तथा संसद में प्रयोग के लिए अंग्रेजी जारी रहेगी। केंद्रीय अधिनियमों,राष्ट्रपति के प्राधिकार से प्रकाशित राजपत्रों आदि का हिन्दी अनुवाद उसका हिन्दी में  प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा और प्रत्येक विधेयक या संशोधन के साथ उसका  हिन्दी अनुवाद अनिवार्य होगा। अधिनियम में यह भी व्यवस्था दी गई है कि किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति से,अंग्रेजी के अतिरिक्त हिन्दी या उस राज्य की राजभाषा को राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा पारित किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के लिए अधिकृत कर सकेगा। इस अधिनियम की अगली महत्तवपूर्ण बात यह है कि संघ तथा अहिन्दी भाषी राज्यों के बीच पत्राचार के लिए हिन्दी का प्रयोग किया जाए तो उसके साथ उसका अंग्रेजी अनुवाद भी होना चाहिए। विधेयक में यह व्यवस्था भी दी गई है कि कुछ विशेष कार्य जैसे-प्रस्ताव, सामान्य आदेश अधिसुचनाए, प्रेस विज्ञप्ति आदि में हिन्दी और अंग्रेजी   दोनों का प्रयोग अनिवार्य होगा। इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दी पूरे तौर पर राजभाषा नहीं हैं बल्कि उसकी स्थिति वैकल्पिक राजभाषा की है।

वैसे हिन्दी के प्रयोग के संबंध में सरकार की नीतिया सदैव लोकतांत्रिक रहीं है। और इस भाषा को किसी पर थोपा नहीं गया है। तब भी लगातार हिन्दी का वर्चस्व और प्रयोग लगातार बढ़ता जा रहा है और हिन्दी  देशभर में संपर्क भाषा के रूप मे स्थापित होकर जनजन की भाषा बन रही है।

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