जच्चा-बच्चा को बचाने की पहल

1:14 pm or November 3, 2014
baby-india

– अरविंद जयतिलक –

शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के उद्देश्य से बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और यूएनएआइडी के सहयोग से ‘भारत नवजात कार्ययोजना’ की शुरुआत एक स्वागतयोग्य पहल है। कार्ययोजना में गर्भाधान से पूर्व तथा गर्भ के दौरान, प्रसव के दौरान, जन्म के तुरंत बाद नवजात की देखभाल शामिल है।

कार्ययोजना का लक्ष्य अगले 15 साल में नवजात मृत्यु दर 10 प्रति हजार से नीचे लाना है। गौरतलब है कि बाल मृत्यु दर के मामले में भारत की स्थिति बेहद चिंताजनक है। देश में हर वर्ष 13 लाख 59 हजार बच्चे पांच वर्ष की उम्र पूरा करने से पहले ही मौत का शिकार बन जाते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों की मानें तो देश में 7 लाख 58 हजार नवजात चार सप्ताह भी जीवित नहीं रह पाते। आंकड़े बताते हैं कि देश में जन्म लेने वाले हर हजार बच्चे में से 29 बच्चे 28 दिन से पहले ही दम तोड़ देते हैं। यह संख्या दुनिया भर में नवजात बच्चों की होने वाली मौत का तकरीबन 27 फीसद है। हालांकि संतोष की बात है कि वर्ष 1990 में जहां देश में 13 लाख नवजात बच्चों की मौत होती थी उसमें गिरावट आ रही है। लेकिन इसके बावजूद भी यह संख्या दुनिया के अन्य देशों से कई गुना ज्यादा है। आंकडें बताते हैं कि जन्म के पहले चार सप्ताह के दौरान मरने वाले 7 लाख 60 हजार बच्चों में 72.9 फीसद बच्चे जन्म के पहले सप्ताह में ही दम तोड़ देते हैं। जबकि 13.5 फीसद बच्चे दूसरे, तीसरे और चैथे सप्ताह में काल का ग्रास बनते हैं। मौजूदा समय में बाल मृत्यु दर 52 प्रति हजार है। भयावह स्थिति यह है कि प्रत्येक एक हजार प्रसव में 22 बच्चे मरे पैदा होते हैं। यह स्थिति तरक्की की बुलंदियां छू रहे भारत को शर्मसार करने वाला है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की सहस्राब्दि विकास लक्ष्य रिपोर्ट-2014 से भी उद्घाटित हुआ है कि 2012 में भारत में पांच साल की उम्र तक पहुंचने से पहले ही 14 लाख बच्चों की मौत हुई। विडंबना यह भी है कि जन्म लेने वाले अधिकांश बच्चे कुपोषित होते हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की ही बात करें तो जन्म लेने वाले कुपोषित बच्चों की संख्या 50 फीसद से अधिक होती है। देश के अन्य राज्यों की भी स्थिति ऐसी ही होती है। समझना होगा कि बाल मृत्यु दर में कमी का लक्ष्य सिर्फ कार्ययोजना तैयार करने से नहीं होगा। इसके लिए प्रसव के दौरान मातृ मृत्यु दर में कमी लाने की जरुरत है। यह तथ्य है कि भारत में हर वर्ष प्रसव के दौरान लाखों माताओं की मृत्यु होती है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि 2013 में प्रसव के दौरान 2,89,000 माताओं की मौत हुई। ‘सेव द चिल्ड्रेन’ संस्था की सालाना रिपोर्ट ‘वल्र्डस मदर्स-2012’ में कहा जा चुका है कि भारत मां बनने के लिहाज से दुनिया के सबसे खराब देशों में शुमार है। 80 विकासशील देशों में उसे 76 वां स्थान प्राप्त है। एक आंकड़े के मुताबिक देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में ही हर साल तकरीबन चालीस हजार माताएं प्रसव के दौरान मरती हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की पापुलेशन फंड-इंडिया की रिपोर्ट का भी कहना है कि 2008 में उत्तर प्रदेश और बिहार में 50 फीसद और राजस्थान में 41 फीसद से ज्यादा महिलाएं अस्पतालों के बजाए अपने घरों में शिशुओं को खतरनाक स्थिति में जन्म दिया जिनमें हजारों बच्चों की मौत हो गयी। निश्चित रुप से प्रसव के दौरान अस्पतालों की सुविधा मिलती तो हजारों बच्चों की जिंदगी बच सकती थी। लेकिन सच्चाई यह भी है कि अस्पताल बदतर हैं। अस्पतालों में डाक्टरों की भारी कमी है। जहां डाक्टर हैं, वहां दवा नहीं है। मरीजों को मोटी रकम चुकाकर बाहर से दवा खरीदनी पड़ती है।

गांव-कस्बों की हालत और बुरा है। सरकार के कड़े दिशा निर्देशों के बावजूद भी डाॅक्टर दूरदराज गांवों में जाने को तैयार नहीं। बदतर सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में ग्रामीणजनों को निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है जहां उनसे भारी धनउगाही की जाती है। इससे बचने के लिए ही लोग प्रसव प्रक्रिया को परंपरागत रुप से घर पर कराने को मजबूर होते हैं। लेकिन इसकी कीमत गर्भवती महिलाओं को जान देकर चुकानी पड़ती है। एक आंकड़े के मुताबिक दवा और उचित इलाज के अभाव में 20 वर्ष से कम उम्र की 50 फीसदी महिलाएं प्रसव के दौरान दम तोड़ देती हैं। दूरदराज क्षेत्रों में स्थापित अस्पतालों में चिकित्सकीय उपकरणों की भारी कमी और डाक्टरों की हीलाहवाली से 10 से 15 फीसदी मरीजों को काल के गाल में समाना पड़ता है। आज देश में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की भी भारी कमी है। एक आंकड़े के मुताबिक देश में 74000 मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और लगभग 21066 आंग्लिजरी नर्स मिडवाइफस् की कमी है। मैदानी इलाकों में हजार की आबादी पर एक आशा कार्यकर्ता और पांच हजार की आबादी पर एक एएनएम होना चाहिए। जबकि वर्तमान में ऐसा नहीं है। उचित होगा कि सरकार इन खाली पदों को तत्काल भरे। हालांकि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने प्रसव के दौरान हो रही मौतों की रोकथाम और गर्भवती महिलाओं को कुपोषण से बचाने के लिए इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना को मंजूरी दी है। अगर उस योजना को मूर्तरुप दिया जाता है तो निश्चित रुप से उसका लाभ मिलेगा। योजना के अनुसार कुछ शर्तों के साथ देश की अधिकांश गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था से लेकर बच्चे को जन्म देने के छः महीने बाद तक चार हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि तीन किस्तों में दी जाएगी। योजना के शुरुआती चरण में देश के सिर्फ 52 जिलों का चयन किया गया लेकिन अब इसका दायरा बढ़ा दिया गया है। निःसंदेह इससे करोड़ों गर्भवती महिलाओं को फायदा मिलेगा। गौरतलब है कि यह योजना ब्राजील, अर्जेंटीना सहित कुछ विकासशील देशों में सफलतापूर्वक चल रही है और खूब लोकप्रिय भी है। अगर यह योजना भारत में भी सफल होती है तो न केवल प्रसव के दौरान हो रही मौतों पर रोकथाम लगेगा बल्कि अन्य सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिलेगें। मसलन बाल मृत्यु दर में भारी कमी आएगी।

गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य बेहतर होगा और बढ़ती जनसंख्या एवं बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराईयों पर रोक लगेगा। इसलिए कि इस योजना का लाभ सिर्फ उन्हीं गर्भवती महिलाओं को दिया जाना है जिनकी उम्र 19 वर्ष है। यानी योजना का लाभ उन्हीं गर्भवती माताओं को मिलेगा जो मां बनने की उम्र 19 वर्ष की शर्त को पूरा करती हैं। निश्चित रुप से यह शर्त बाल विवाह पर रोक लगाने की दिशा में कारगर सिद्ध होगा। यह सच्चाई है कि आज भी गांवों और अशिक्षित पिछड़े क्षेत्रों में लड़कियों का विवाह कम उम्र में कर दिया जाता है। नतीजतन वे शीध्र मां बन जाती हैं और उनमें खतरनाक बिमारियां घर कर लेती हैं। प्रसव के दौरान उनके जान जाने का खतरा बना रहता है। इस योजना से प्रसव शिशु भी कुपोषित नहीं होंगे। आमतौर पर पैसों की कमी से गर्भवती महिलाएं अपने बच्चों को उचित पोषण नहीं दे पाती लिहाजा जन्म के समय से ही बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाते हैं। एक आंकड़े के मुताबिक पांच साल की उम्र के बच्चों में 43 फीसदी अंडरवेट होते हैं। यानी कहा जा सकता है कि दुनिया के सर्वाधिक कुपोषित बच्चे भारत में रहते हैं। बानगी के तौर पर देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में गर्भवती महिलाओं और उनके शिशुओं की मृत्यु दर का औसत विश्व के सर्वाधिक पिछड़े कहे जाने वाले क्षेत्रों विशेषकर अफ्रीका और लातिन अमेरिकी देशों के समान है। आंकड़े बताते हैं कि यूपी में गर्भवती महिलाओं और उनके शिशुओं की मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से दोगुने से भी अधिक है। यह स्थिति ठीक नहीं है। इससे निपटने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को दीर्घकालीन योजना बनाकर राज्यों को साथ लेना होगा। अगर ‘भारत नवजात कार्ययोजना’ को जमीनी आकार दिया जाता है तो निश्चित रुप से इसके परिणाम सकारात्मक परिणाम मिलेंगे।

Tagged with:     , , , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in