नौकरी में बने रहने के लिए डिंब फ्रीजिंग – अभिशाप या वरदान !

1:39 pm or November 3, 2014
Egg-Freezing

– अंजलि सिन्हा –

एक वेबसाइट की ख़बर के मुताबिक फेसबुक तथा एप्पल जैसी कम्पनियां अपनी महिला कर्मचारियों के सामने प्रस्ताव रख रही हैं कि यदि वे मां बनने की ख्वाहिश टाल सकती हैं तो कम्पनी उन्हें अच्छी खासी रकम देने को तैयार है। कंपनी ने कहा है कि वे अंडकोश फ्रीज करवा सकती हैं और बाद में उम्र अधिक होने पर भी वे मां बन सकती हैं। यह खर्चा कम्पनी उठाने को तैयार है। डिंब या अण्ड को फ्रीज करने के लिए लगभग 12 लाख खर्च करने को तैयार है।

सवाल यह उठता है कि श्रमिकों-कर्मचारियों की मामूली वेतन वद्धि का विरोध करनेवाली, उनके संगठनों को जड़ से समाप्त करने के लिए आमादा रहनेवाली कंपनियों  द्वारा ऐसी घोषणा करने के पीछे क्या चिन्तन काम कर रहा है। स्पष्ट है कि युवा महिला कर्मचारी – जिनके प्रशिक्षण पर भी कम्पनी अच्छा खासा खर्च करती हैं और जो अपने काम में भी बहुत उर्जा के साथ सक्रिय रहती हैं, नयी नयी चीजें सीखने के प्रति जिनकी रूचि रहती है- वे अगर जल्द से जल्द मां बन जाएं तो कम्पनियों को कई स्तर पर घाटा होता है। न केवल प्रशिक्षण में लगी लागत बेकार हो जाती है बल्कि एक प्रशिक्षित कर्मचारी के हटने से – अलबत्ता कुछ समय के लिए ही सही – उन्हें नया कर्मचारी ढूंढने में भी वक्त लगता है, जो घाटे का सौदा होता है। इससे बचने के लिए उन्होंने यह आफर दिया है।

दूसरे, यह आफर तमाम कर्मचारियों में यह सन्देश भी ले जा सकता है कि कम्पनी अपने स्टाफ के बारे में कितने मानवीय ढंग से सोच रही है। ये बड़ी बड़ी कम्पनियां लोगों की बदलती जीवनशैली, उनके चाइस आदि को देखते हुए कई बदलावों को पहले भी अंजाम दे चुकी हैं, जिसका मकसद यही होता है कि कर्मचारी की अपने काम या कम्पनी के प्रति वफादारी, निष्ठा बनी रहे। उदाहरण के तौर पर, हमारे समाज में भले ही समलैंगिक सम्बन्धों, सहजीवन के फैसलों को लेकर सहज स्वीकारभाव न हो, मगर बंगलौर की अग्रणी आई टी कम्पनियों की तरफ से अपने इन ‘विशिष्ट’ कर्मचारियों के लिए भी अनुकूल माहौल बनाया गया है। सत्तर या अस्सी के दशक में जापानी कम्पनियां जब दुनिया में अपना जौहर दिखा रही थीं, तब उनके बारे में यह बात उल्लेखित होती थी कि किस तरह उन्होंने ऐसा वातावरण बनाया है कि कर्मचारी अपनी कम्पनी के प्रति वफादार बना रहता है या उसे अपने विस्तारित परिवार का ही हिस्सा मान लेता है।

26 अक्तूबर 2014 को ‘टाईम्स आफ इंडिया’ को दिए एक साक्षात्कार में ‘बैरी युनिवर्सिटी स्कूल आफ लाॅ’ की हेल्थकेयर लाॅ और बायोएथिक्स विशेषज्ञ सुश्री सीमा मोहापात्रा डिंब को फ्रीज करने की इस आॅफर को लेकर कुछ महत्वपूर्ण मसले उठाती है। उनके मुताबिक ‘परिवार को देर से शुरू करने के लिए टेक्नोलोजी का सहारा लेने के पहले हमें कुछ वैज्ञानिक प्रश्नों पर गौर करना चाहिए। दरअसल ऐसे कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, जो लम्बे सर्वेक्षण पर आधारित हो, जो बताते हों कि दीर्घकाल तक फ्रीज करके रखा गया डिंब बाद में सही ढंग से विकसित हो सकेगा। दूसरे डाक्टरों को यह बात सुनिश्चित करनी चाहिए कि अंडा फ्रीज करने का निर्णय लेनेवाली महिलाएं कुछ गैरवाजिब अपेक्षाएं न पाल लें क्योंकि यह बात अभी तय नहीं हुई है कि जिन महिलाओं ने अंडे को फ्रीज करने का निर्णय लिया, उन्होंने स्वस्थ्य सन्तान को जनम दे ही दिया। तीसरे, अंडे को फ्रीज करने की प्रक्रिया में भी स्वास्थ्य के लिए खतरे होते हैं।

कई नारीवादियों ने इन कम्पनियों के इस आफर के प्रति आपत्ति दर्ज की है, उनका कहना है कि इससे सन्तान पैदा करने या न करने या इस फैसले को टालने को लेकर स्त्रियों के स्वायत्त निर्णय पर असर पड़ेगा, क्योंकि जो महिलाएं युवावस्था में ही परिवार शुरू करना चाहती हैं, उन्हें कम प्रतिबद्ध कर्मचारी के तौर पर देखा जाएगा जिससे वह दबाव महसूस करेंगी।

सरकारी गैरसरकारी किसी भी प्रकार की नौकरी में यह हकीकत देखने को मिलती है कि बच्चे पैदा होेने के कारण औरत के कैरियर मंे ब्रेक लगता है। प्राइवेट नौकरियों में तो नौकरी से हटा देने या खुद महिलाओं द्वारा छोड़ दिए जाने के साथ ही सरकारी नौकरियों से भी लम्बी छुटटी लेने या नौकरी छोड़ देने की घटनाएं देखने को मिलती हैं। केन्द्र सरकार ने भी महिला कर्मियों को मातृत्व अवकाश के साथ चाइल्ड केयर लीव देते वक्त यही तर्क दिया था कि ऐसी सुविधाओं से महिलाएं अपनी नौकरी में बनी रहेंगी।

इस मुददे का सही समाधान निकालने के लिए समग्रता में विश्लेस्षण करना चाहिए तथा सारे पहलुओं पर विचार करना जरूरी है। सर्वप्रथम हमें यह सोचना होगा कि हम भविष्य के समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं । जीवन के हर क्षेत्र में सन्तुलन की जरूरत होती है। साथ ही कई विकल्पों में चुनाव की आजादी तथा अवसर जरूरी है।

एक तरफ जहां मां बनना या नहीं बनना या कब बनना है यह निजी मामला है। इस पर एम्लाॅयर/मालिक का दबाव, सुझाव या परिवार के दबाव और नियम को थोपा नही जाना चाहिए । दूसरी बात महिलाओं और परिवारों को भी समय बदलने के साथ स्वयं को बदलना जरूरी है। मातत्व को पितसत्तात्मक समाज में इतना महिमामंडित किया जाता है कि वह कोई बहुत अजूबा, महान तथा साथ उपेक्षापूर्ण होता है। लिहाजा उसे इतना विशेष श्रेणी में डाल दिया जाता है कि औरत चुनाव करे कि वह कैरियर चाहेगी या मातत्व, जबकि बच्चा पैदा करना भी एक स्वाभाविक गतिविधि है जो सदियों से ही नहीं बल्कि मानव के उत्पत्ति काल से ही घटित होती रही है। दूसरी बात यह सोचने की है कि आज के समय में भी खेती-के काम में लगीं महिलाएं या मजदूर तबके की महिलाएं अपने बच्चे के लिए कितना लम्बा अवकाश ले पाती हैं ! यह बात अलग है कि आर्थिक तंगी तथा विषम परिस्थितियों के कारण बच्चा कुपोषित हो जाता है तथा मां की देखभाल न होने के कारण मात शिशु मत्यु दर का ग्राफ उंचा है लेकिन इस विपत्ति का कारण मेडिकल सुविधाओं का अभाव तथा गरीबी है जिसमें उचित देखभाल नहीं होता है न कि कुछ महिनों में औरत का काम पर लौटना है। जहां तक बच्चों की देखभाल का मसला है उसका भी समाधान औरत को घर बिठा देने में नहीं है बल्कि मजदूर आन्दोलन की वह पुरानी मांग है जो ठीक से पूरी नहीं हुई है कि अच्छे पालना घर कार्यस्थल के नजदीक हों। आंगनबाड़ी के रूप में निहायत उपेक्षित और खस्ता हाल संस्थानों में कौन माता पिता अपनी सन्तान को छोड़ना चाहेगा। समाज में मदद के और तमाम तरीके इजाद करने की जरूरत है ताकि बच्चे वाकई समाज की निधि बन पायें।

कार्यस्थलों को भी इतना प्रतियोगी और रोबोटनुमा बनने की जरूरत क्यों है जिसमें इन्सान मशीन बन जाए, उसके लिए जिन्दगी के अन्य मनोहारी पहलुओं -फिर चाहे कला, साहित्य, संस्कति हो या खेल – का आनन्द उठाने की फुरसत ही न बचे। पूंजी के तर्क के कारण जिन्दगी का सुकून और जिन्दादिली काफूर हो रही है। पूछा जाना चाहिए उन कंपनियों से कि जो लाखों खर्च करने को तैयार हैं कि महिलाएं छुटटी पर न जाएं, उन्हें जरूरत भर की छुटटी देकर जो पैसा वे वैसे देने में खर्च करेंगी उसे वह कमाये ही नहीं।

दरअसल महिलाओं के सामने अब तरह तरह से चुनौती पेश की जा रही है जो कभी कंपनियों के द्वारा तथा कभी घर परिवार के द्वारा कि तुम कैरियर और परिवार में से कोई एक चुनो। जाहिर सी बात है कि हमारे समाज में जैसी सीख मिली हुई है और जैसी पुरूषप्रधान सोच व्याप्त है उसमें महिलाओं को भी घर परिवार चुनना ही स्वाभाविक और आसान लगेगा। यहां चुनौतियां हल करनेलायक लगेंगी। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि  बाहर के दायरे को विभिन्न कोणों से औरत के लिए मित्रवत नहीं बनाया गया है, इसमें असुरक्षा का मसला भी दिमाग में लगातार हावी रहता है। घर के काम के सारे बोझ के साथ रिश्ते नातेदारी की आवभगत भी उन्हीं के हिस्से में आती है फिर कैसे सम्भव हो पाएगा कि वह उन सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए बाहर के कैरियर को भी संवारे। लेकिन सबसे जरूरी मसला अब के दौर में यही समझने का है कि कोई भी समाज और कोई क्षेत्रा महिलाओं को बहिष्कृत करके तथा घर में वापस भेज कर विकसित समाज नहीं बन पाएगा। प्राकतिक जरूरतें पूरा करने के लिए आखिर समाज सजा क्यों देगा़ ! यह मसला भी अहम है कि महिलाओं को भी इस मानसिकता से उबरना पड़ेगा कि वे घर-ग्रहस्थी को ही फुल टाइम काम की श्रेणी में न रखें तथा उस काम को अपने जीवनसाथी तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ साझा करने की लड़ाई लड़ने के साथ ही ग्रहकार्य को कम समय तथा कम उर्जा में समेटने का सीखें ताकि वे बाहर जाकर कमाने के अवसर से वंचित न हो सकें।

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