आतंकवाद विरोध में अमेरिका: कितने छदम युद्ध लड़ोगे महारथी!

1:47 pm or November 3, 2014
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– सुभाष गाताड़े –

क्या अमेरिकी सरकार द्वारा आतंकवाद पर निगरानी रखने के लिए जो प्रचण्ड सूची तैयार की गयी है, जिसका निरन्तर नूतनीकरण होता रहता है, उसमें दर्ज आधे नाम ऐसे लोगों के हैं जिनका किसी आतंकवादी समूह से कोई सम्बन्ध नहीं है ? ‘इण्टरसेप्ट’ नामक न्यूजसाइट पर अगस्त माह में खोजी पत्रकारों जेरेमी शाहिल और रायन डेवेरू द्वारा वर्गीक्रत दस्तावेज के आधार पर प्रकाशित एक स्टोरी यही बयां करती है। गौरतलब है कि स्नोडेन द्वारा किए गए पर्दाफाश से अभी अमेरिकी हुकूमत सम्भल ही रही थी कि इस उदघाटन के चलते ओबामा प्रशासन को फिर एक बार शर्मिन्दगी उठानी पड़ी है।

इण्टरसेप्ट के सम्पादक जान कुक ने बताया कि इस स्टोरी ने अमेरिकी सरकार की निगरानी सूची/वाॅचलिस्ट तैयार करने की ज्यादतियों को लेकर ‘‘महत्वपूर्ण सूचनाएं’’ उजागर की। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया था कि ‘इन स्टोरी के सार्वजनिक प्रकाशन का अगर अपराधीकरण किया गया तो वह उन्हीं ताकतों को मदद पहुंचाएगा जो जवाबदेही के बिना असीमित ताकत का इस्तेमाल करते हैं।’

ध्यान रहे कि अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन और अन्य मानवाधिकार संगठनों की तरफ से प्रस्तुत दस्तावेजों को पाने के लिए लम्बे समय से प्रयास चल रहे थे क्योंकि उनके सामने ऐसे कई केस आए थे, जिनमें महज इस सूची में नाम होने के चलते कइयों का नाम ‘नो फलाय लिस्ट’ अर्थात ‘उड़ने पर प्रतिबन्धित व्यक्तियों की सूची’ में शामिल किया गया था, जबकि उनका किसी भी आतंकी संगठन से या आतंकी कार्रवाइयों से कभी दूर दूर तक का रिश्ता नहीं रहा है। विडम्बना यह भी रही है कि किसी का नाम उपरोक्त सूची में शामिल ंहै, यह जानने का भी किसी के पास कोई रास्ता नहीं रहा है।

गौरतलब है कि वर्गीकत सूचनाओं के आधार पर प्रस्तुत इस स्टोरी को कइयों ने अदालती कार्रवाइयों का आधार बनाया है। एक संघीय न्यायाधीश ने यहभी कहा है कि निगरानी सूची में अपनी स्थिति को जानने से लोगों को रोकनेवाला प्रावधान असंवैधानिक है।

पिछले दिनों यह ख़बर भी आयी थी कि अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी एफ बी आई ने उस व्हिसलब्लोअर को चिन्हित कर लिया है जिसने आतंकी वाचलिस्ट को लेकर इण्टरसेप्ट न्यूजसाइट को दस्तावेज लीक किए थे। अनाम सूत्रों के हवाले से याहू न्यूज पर प्रकाशित रिपोर्ट में लिखा गया था कि उत्तरी वर्जिनिया के एक फेडरल कान्टाक्टर के एक मुलाजिम के मकानों पर पिछले दिनों एफ बी आई के लोगों ने छापा डाला था तथा संघीय अभियोजकों ने भी इस मामले में आपराधिक जांच शुरू की है।

आतंकवाद विरोध में युद्ध की समूची संकल्पना में समाहित ‘ढोल के इन पोल’ की बात बरबस पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर के सुरक्षा सलाहकार  ब्रेजिन्स्की के इस कथन को याद दिलाती है कि किस तरह आतंकवाद के खिलाफ युद्ध छेडनेका अमेरिकी सरकार का फैसला दरअसल डर की संस्कति को बढ़ावौ देने के लिए लिया गया जो ‘‘तर्कबुद्धि को धुंधला करती है, भावनाओं को भड़काती है और लोकरंजक राजनेताओं का रास्ता सुगम करती है जो उन नीतियों के हक में लोगों को लामबन्द करना चाहते हों, जिनकी वह हिमायत करते हैं।’ यह उस व्यक्ति का कथन है जिसे इराण एवं निकारागुआ के इन्कलाब के बाद अमेरिकी विदेश नीति को अधिक जंगखोर बनाने का ‘श्रेय दिया जाता है।’

वैसे यह कोई पहली दफा नहीं है कि आतंकवाद विरोधी युद्ध की असलियत उजागर हुई हो। 9/11 की ग्यारहवीं सालगिरह समाप्त होने के चन्द दिनों बाद ही सामने आयी अमेरिकी सीनेट की रिपोर्ट ने अमेरिकी सरकार द्वारा आतंकवाद की सूचनाओं के संग्रहण के लिए बनाए महाकाय ढांचे की समीक्षा की थी जिसमें बताया गया था कि जनता के करों से प्राप्त सैकड़ो बिलियन डाॅलर की लागत लगी से बना यह ढांचा अपने आप में सफेद हाथी साबित हुआ है , जिसने बहुत कम जरूरी सामग्री एकत्रित की है, जबकि उसने निरपराध अमेरिकियों के जीवन के बारे में जानकारियों को अनुचित ढंग से इकट्ठा किया है !

रिपोर्ट में बताया गया था कि ‘हमारी जांच में हमें ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं मिली जो उजागर करे कि इस ढांचे के चलते आतंकवाद के खतरे को उजागर किया जा सका या एक सक्रिय आतंकी साजिश को समय रहते ही बेपर्द किया जा सका। सीनेट की प्रस्तुत रिपोर्ट 9/11 के बाद की एक कड़वी हकीकत को बयां करती है। राष्ट्रीय सुरक्षा कार्यक्रम हमेशा फैलते ही जाते हैं, कभी संकुचित नहीं होते, जबकि उनके लिए प्रयुक्त पैसा एवं मानवशक्ति आतंकवाद के वास्तविक मुद्दे से कई गुना अधिक होती है।

एक मुस्लिम समूह द्वारा अपने सदस्यों में वितरित किताबों की सूची, या अमेरिकी नागरिकों का मस्जिद में वक्तव्य या बच्चों के लालन पालन में मुस्लिम समूह को दी गयी सलाह, जैसी सूचनाओं का अमेरिका जैसी साम्राज्यवादी शक्ति की सुरक्षा के साथ क्या सम्बन्ध हो सकता है ? उपरी तौर पर देखें तो कुछभी नहीं। मगर हम आतंकवाद सम्बन्धी सूचनाओं के संग्रहण को लेकर 9/11 के बाद अमेरिकी सरकार द्वारा विकसित विशाल ढांचे को देखें तो उनमें ऐसी सूचनाएं अतिगोपनीय श्रेणी में मिल जाएंगी।

अगर हम इस बात को देखें कि 9/11 के पहले अमेरिकी संघीय सरकार के पास महज 16 ऐसे लोगों की सूची थी जिनका नाम ‘नो लाय’ फेहरिस्त में दर्ज था अर्थात जिन्हें विमानपर्यटन के लिए खतरा समझा जाता था, यह आंकड़ा जार्ज बुश के राष्टपतिकाल में 4 लाख से अधिक संख्या पार कर चुका था। उन्हीं दिनों यह बात चर्चा में आयी थी कि दुनिया पर अपनी चैधराहट कायम रखने के लिए व्याकुल अमेरिकी साम्राज्यवाद की पोटली में आतंकवाद एक ऐसा शिगूफा है जिसका उसने जानबूझ कर हौवा बना कर रखा है। सोविएत रूस के विघटन और सोविएत खेमे की समाप्ति के बाद अब ‘कम्युनिजम’ का हौवा भी वह दुनिया को दिखा पाने की स्थिति में नहीं है। अमेरिका अच्छी तरह जानता है कि ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ की बात करते हुए वह न केवल अपने मुल्क के नागरिकों के नागरिक अधिकारों पर अधिकाधिक अंकुश कायम रख सकता है बल्कि ऐसी अफगाणिस्तान, इराक जैसे मुल्कों पर हमला कर उन्हें अपने नियंत्रण में रखने की भी कोशिश कर सकता है। अलबत्ता अमेरिकी हुकूमत की सार्वजनिक भंगिमा जो भी हो, यह नहीं कहा जा सकता कि वे अपनी नीतियों और आतंकवादी गतिविधियों के बीच के अन्तर्सम्बन्ध के बारे मंे परिचित नहीं है। अपने एक महत्वपूर्ण आलेख ‘अवर वार आन टेररिजम’ (www.progressive.com) में रैडिकल अमेरिकी विद्वान हावर्ड झिन इस बात को स्वीकार किया था कि जब तक सौ से ज्यादा देशों में फौजें तैनात करने, फिलिस्तीन पर कब्जे का जायज ठहराने या मध्यपूर्व के तेल पर नियंत्राण करने के नापाक इरादों का अमेरिका परित्याग नहीं करता तब तक अमेरिकी नागरिक हमेशा ही डर में जीने के लिए मजबूर होगा। अगर हम घोषणा करें कि हम इन नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहते हैं और उनको बदलना चाहते हैं, मुमकीन है कि हमारे खिलाफ विद्वेश का जो प्रचण्ड भण्डार संचित हुआ है, जिससे आतंकवादियों को खाद-पानी मिलता है, वह सूख जाये।’

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