एजेंडा सामाजिक न्याय पर खिलाड़ी संघ

2:45 pm or November 3, 2014
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– राजीव यादव –

पिछले दिनों लखनऊ में हुई आरएसएस की अखिल भारतीय केन्द्रीय कार्यकारी मण्डल की बैठक के पूर्व ही कोर कमेटी में उसके परिवारी संगठनों की तरफ से आ रहे एजेंडों ने साफ कर दिया था कि वो दलितों-पिछड़ों के साथ युवाओं को खास तरजीह देंगे। इसे सिर्फ हिन्दुत्वादी छवि के साथ लगे ‘कट्रता’ के टैग को हटाने की प्रक्रिया से हटकर उसके ‘समरसता’ जैसे अभियानों का कथित ‘सामाजिक न्याय’ और ‘सोषल इंजीनियरिंग’ की राजनीति करने वालों के बरक्स एक सुनियोजित संगठित रणनीति के रुप में देखने जरूरत है।

मसलन, दीपावली को ‘छुआछूत मुक्ति’ को समर्पित करते हुए विहिप ने साफ किया कि वो ऐसे संबन्ध निर्माण करना चाहते हैं, जो किसी भी राजनीतिक प्रक्रिया से न टूटें। अपने राजनीतिक चेहरे भाजपा को मजबूती देने में संघ को दलितों-पिछड़ों का साथ दूर तक और स्थाई चाहिए। इसी के तहत विहिप ने दलितों से ‘चैका-भोजन’ का नाता जोड़ने और ‘हिंदू परिवार मित्र’ की रणनीति अपनाई है। तो वहीं युवाओं में संघ की लोकप्रियता और हिंन्दुत्व की भावना मजबूत करने के लिए तीर्थ स्थलों को पर्यटन स्थल की तरह विकसित करने का भी प्रस्ताव दिया।

दलितों-पिछड़ों या फिर युवाओं को संघ ढाचे में स्थायी स्परुप देने की प्रक्रिया उस सामाजिक न्याय की राजनीति जो हिंदू धर्म में ‘ससम्मान’ स्थान पाने के लिए या समाहित होने के लिए ही थी या फिर वह युवा वर्ग जो लड़के-लड़की के घूमने-फिरने को ही ‘बेखौफ आजादी’ का नाम दे देता है, इन दोनों प्रकार की राजनीति को संकट में ला देगा। इसीलिए सामाजिक न्याय के नाम पर दलितों और पिछड़ों को गोलबंद करने वाली राजनीति संघ द्वारा वंचित तबके को गुमराह करने की बात कर रही हैं। पर अगर हम इन अस्मितावादी रुझानों से हटकर देखें तो अगर संघ जो कह रहा है, उसे ‘ईमानदारी’ से पूरा कर देगा तो क्या होगा? आखिर सवाल साथ बैठने, खाने-पीने का ही तो था? आखिर दलित और पिछड़े को इस वक्त क्या चाहिए? इसका आकलन करने की जरुरत है।

इन दिनों जब यूपी और बिहार को केन्द्रित करते हुए भाजपा ने लगातार कई फेर बदल सिर्फ इसलिए किए कि सामाजिक न्याय के नाम पर जो राजनीति की जा रही है, उसको वह संबोधित कर सके। तो ऐसे में सिर्फ उसे सांप्रदायिक कह कर खारिज नहीं किया जा सकता। क्योंकि सांप्रदायिकता उसका कोई गुप्त एजेण्डा नहीं है। ऐसे में देखना तो यह चाहिए कि वह जिस दलित-पिछड़े समूह को संबोधित कर रही है, उसकी कहीं यही आकांक्षा तो नहीं है? जिसे भाजपा पूरा कर रही है? ब्राहमणवाद या मनुवाद विरोधी राजनीति की दो तरह की धारणाएं आम हैं। एक यह कि मनुवादी वर्ण व्यवस्था जाति आधारित न होकर कर्म आधारित थी, लेकिन ब्राहमणवादी ताकतों ने इसे जाति आधारित कर, पूरे दलित-पिछड़े समुदाय को समाज के निचले पायदान पर धकेल दिया। तो वहीं दूसरा आर्य-अनार्य की बहस जिसके तहत वंचित तबके को अनार्य कहते हुए आर्यों द्वारा उनकी पूरी व्यवस्था को कब्जाने की बात कही जाती है। यादवों की लोरिक सेना, राजभरों की सुहेल देव सेना जैसी अवधारणाओं को लेकर कुछ पिछड़ी जातियां अपनी आक्रमक छवि से अपने वंशजों के क्षत्रिय होने के दावे करती हुई दिखती हैं। ऐसी कई बहसों में उलझी ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति के ‘बौद्धिक प्रकोष्ठ’ इस तरह की बहसों को पुनः स्थापित करने की कोशिश में हैं। पर यहां इस बात को साफ करना होगा कि ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति करने वाले क्या इन बहसों को खुले मंचों पर स्वीकार कर पाएंगे? जिस तरह वे अल्पसंख्यक समुदाय को संबोधित करते हुए आारएसएस द्वारा देष के सभी नागरिकों के हिंदू होने के बयान पर प्रतिक्रिया करते हैं, क्या वे इसीतरह दलितों-पिछड़ों को संबोधित कर सकते हैं?

दरअसल, यूपी-बिहार में ‘सामाजिक न्याय’ के अलंबरदार कमंडल के बाद अल्पसंख्याकों के प्रति बढ़ती सांप्रदायिकता के वैचारिक पहलुओं पर न खुद को टिका पाए और न ही अपने जनाधार को। इसीलिए कोई मायावती भाजपा के साथ सरकार बनाने को तैयार हो जाती हैं। तो कभी बाबरी मस्जिद के विध्वंस में गुनाहगार माने जाने वाले कल्याण सिंह को मुलायम अपने साथ ले लेते हैं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि मुलायम-मायावती किसी सांप्रदायिकता विरोधी राजनीति की पैदावार नहीं हंै। वो तो हिंदू समाज के अन्र्तविरोधों की पैदाइश हैं। इसीलिए जो कांशीराम 1992 में सांप्रदायिकता विरोधी मुहीम में शामिल दिखते हैं, को जब भाजपा के साथ सरकार बनाने का सवाल आता है तो वह कह बैठते हैं कि वो भी हिंदू हम भी हिंदू। मतलब कि जब तक दलित-पिछड़ी राजनीति को हिन्दुओं के कथित कुलीनों का समर्थन नहीं था या उससे वह गठजोड़ नहीं कर पा रही थीं तब मुस्लिमों को साथ लेकर सिर्फ अपनी ताकत का एहसास कराने तक की यह कोशिश थी। अगर ऐसा नहीं था तो कैसे कोई मायावती गुजरात 2002 मुस्लिम विरोधी जनसंहारों के बाद मोदी के मंच पर जा सकती थीं। इसी तरह अगस्त 2003 में जब मायावती के सिर से ‘ताज’ छिना तो मुलायम ने बड़े स्तर पर दल-बदल कराकर सत्ता को हथियाया। इस सरकार के पीछे अमर सिंह और राजनाथ सिंह का मुलायम प्रेम कौन भूल सकता है। उस समय संघ ने यह कहा था कि उसके एजेण्डे को जो आगे बढ़ाएगा वह उसके साथ है और मौजूदा सरकार उसके माकूल है।

बहरहाल, सितंबर 1997 में कल्याण सिंह, नवंबर 1999 में राम प्रकाश गुप्ता और 2000 में राजनाथ सिंह का मुख्यमंत्री बनना साबित कर रहा था कि भाजपा का जो नेतृत्व है वह न जनता को एड्रेस कर पा रहा है और न ही संघ के एजेंडे को। भाजपा ने मायावती को समर्थन देकर सामाजिक न्याय की राजनीति के भ्रम को तो तोड़ दिया था पर चूंकी इन तबकों की आकाक्षांए जो अभी भी उसके साथ जुड़ी थीं, को अलग कर पाना इतना आसान नहीं था। दरअसल, जब संघ कहता है कि उसके लोग हर राजनीतिक दल में हैं तो उसका अभिप्राय हार्डकोर संघी से नहीं होता। वह उस वैचारिक प्रक्रिया की बात करता है जिसके तहत वह दूसरों को समाहित करता है। संघ को दोश देने से अधिक इस राजनीतिक प्रक्रिया के गुण-दोशों को चिन्हित करना होगा। 2013 में मुजफरनगर व आस-पास की सांप्रदायिक हिंसा को जाट बनाम मुस्लिम बताने वाले मुलायम सिंह को 2012 में फैजाबाद में हुई सांप्रदायिक हिंसा पर भी अपने विचार रखने चाहिए। जहां भाजपा के विधायक राम चन्द्र यादव के नेतृत्व में यादवों ने संगठित रुप से मुसलमानों पर हमले किए। यादवों के सांप्रदायिकरण की यह कोई नई परिघटना नहीं है, 1989 भागलपुर से लेकर तमाम ऐसे उदाहरण हैं।

1989 की जनता दल की मुलायम सरकार में सांप्रदायिकता मुसलमानों के लिए सवाल था, पिछड़ों के लिए नहीं। उनके लिए तो उनके समुदाय के मुख्यमंत्री का सत्तासीन होना ही प्रमुख एजेंडा था। तो ऐसे में वही पिछड़ा जब उसी अस्मिता पर मोदी को पिछड़ा प्रधानमंत्री के रुप में चुनता है तो इतनी हाय तोबा और सांप्रदायिकता बढ़ रही है का डिढ़ोरा पीटने का किसी मुलायम या मायावती को हक नहीं है। उन्हें बताना चाहिए कि वो जिस पिछड़े-दलित समाज से आते हैं, वहां सांप्रदायिकता रोकने के लिए उन्होंने क्या किया। जो दलित समाज भाजपा के गठजोड़ से सत्तासीन होने को मायावती की एक कूटनीतिक चाल कहकर अपनी अस्मिता की सन्तुश्टी करता है, क्या मायावती उससे कहेंगी की उन्होंने यह करके पूरे दलित राजनीति को ब्राह्मणवाद के हवाले कर दिया?

दोनों ने कुछ नहीं किया और दोनों के खात्में की जो तस्वीर सामने आ रही है वह इसीलिए और साफ हो रही है। साथ बैठने, खाने-पीने तक की अस्मिता पर आधारित इस तबके को फासीवाद के बड़े खतरे के खिलाफ लामबंद करने की कोई कोशिश नहीं हुई। यह किसी भूल के तहत नहीं बल्कि सोची समझी साजिश के तहत हुआ। क्योंकि अगर ऐसा होता तो दलित-पिछड़ी जातियों में नहीं बल्कि अपने वर्गीय गोलबंदी में लड़ता, जो जाति आधारित राजनीति को संकट में ला देता। और यह संघ के लिए भी मुफीद था कि ऐसा करके ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति उनके काम को और आसान कर रही थी। उसे मालम था कि अब जब मुसलमान अपने हक-हुकूक की बात करने लगा है तब वह उसके खिलाफ उसको खड़ा कर देगी। सच्चर कमेटी के बारे में बिना किसी जानकारी के दलित-पिछड़ा उसके खिलाफ हो जाता है तो वहीं उसी निर्धारित कोटे से मुस्लिमों को आरक्षण देने के सवाल को वह संघ की भाषा में ‘तुष्टिकरण’ कहने लगता है। जो कुछ हो रहा था वह हिंदुत्व में समाहित होने की प्रक्रिया थी, किसी नए निर्माण की प्रक्रिया नहीं थी। तो अब फिर ‘सामाजिक न्याय के खिलाड़ी’ क्यों किसी नए निर्माण को खोज रहे हैं?

ठीक इसी तरह युवा वर्ग जो किसी पार्क, रेस्टोरेंट या पब में बजरंगी गुण्डों से पिटता है, पर उसे किसी ‘साहेब’ द्वारा किसी महिला का पीछा कराने वाला पसन्द है। वह क्या चाहता है? इसको समझना होगा। अगर हम नहीं भी समझें तो संघ तो उसको समझ ही रहा है। युवा वर्ग को आकर्शित करने के लिए धर्म स्थलों को पर्यटन स्थलों के रुप में या विकसित करने को कह कर अपने अनुशांगिक संगठनों को उसने साफ संकेत दे दिया है। जिसे हम हाल में हुए लोकसभा चुनावों से पहले भी देख सकते हैं कि जो बजरंग दल सरीखे संगठन वैलेनटाइन डे आदि पर बड़े सक्रिय रहते थे, वे लगभग निष्क्रिय दिखे। उन दिनों तो मोदी को लेकर मेघना पटेल के पोस्टर चर्चा में थे। ऐसे में बाजार आधारित युवाओं की स्वायत्ता और स्वतंत्रता जो किसी फासीवादी राजनीति का ही चारा होती है, उसका सिर्फ सतही ढंग से मून्ल्यांकन करना या फिर यह कहना कि ऐसा संघ दबाव में कर रहा है या फिर ‘लव जिहाद’ के मुद्दे के पिटने के बाद कर रहा है, यह खुशफहमी भर रहेगी।

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