अविस्मरणीय है धरती का देवता: बिरसा मुण्डा (15 नवम्बर बिरसा मुण्डा जयन्ती)

3:57 pm or November 10, 2014
Birsa Munda Stamp

– डॉ. गीता गुप्त –

आदिवासियों में आजादी की अलख जगाने वाले उस क्रान्तिकारी वीर युवक का नाम था-बिरसा मुण्डा। जिसे वनवासी क्षेत्र में धरती का आबा अर्थात देवता कहा जाता था। उसने सन 1895 में ही छोटा नागपुर के अत्यन्त पिछड़े वनांचल में स्वराज्य की घोषणा करके अंग्रेजों की सरकार को गंभीर चुनौती दी थी। जैसे शहीद भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे क्रान्तिकारियों के मन में भारत की आजादी के लिए तड़प और दीवानगी थी, वैसे ही बिरसा मुण्डा भी देश की स्वाधीनता हेतु अत्यधिक व्याकुल थे।

बिरसा का जन्म 15 नवम्बर सन 1875 को छोटा नागपुर के पास स्थित एक गांव में हुआ था। अन्य वनवासी बालकों की तरह बिरसा का बचपन भी जंगलों में घूमते और बकरियां चराते हुए व्यतीत हुआ। उन दिनों शिक्षा, चिकित्सा और सेवा के क्षेत्र में कार्य करने वाली ईसाई मिशनरियों का बोलबाला था, जो इसी बहाने धर्मान्तरण में भी जुटी हुई थी। निर्धन बिरसा के पिता ने भी ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया अतः बिरसा अब ‘दाऊद’ बना दिए गए और चाईबासा के लूथर मिशन स्कूल में उनकी शिक्षा आरम्भ हुई। बिरसा ने वहां रहकर ईसाई मिशनरी के षड्यंत्रों के बारे में जाना और पादरियों द्वारा वनवासियों का निर्मम शोषण देखकर उनका हृदय हाहाकार कर उठा। वे स्कूल छोड़कर घर लौट आये और अपने पिता को ईसाई धर्म त्याग कर पुनः हिन्दू धर्म अपनाने के लिए बाध्य कर दिया।

सन् 1891 में बिरसा वैष्णव विद्वान आनन्द पाण्डेय के संसर्ग में आए। उन्हें बिरसा ने अपना गुरु माना और उन्हीं की प्रेरणा से बिरसा में आध्यात्मिक चेतना, प्रखर राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व की भावना का प्रस्फुटन हुआ। उन्होंने अनेक वैदिक धर्मग्रंथों सहित वेद-पुराणों का भी अध्ययन किया। अपनी मेघा और विद्वता से उन्होंने वनवासियों को प्रभावित किया। पादरियों द्वारा किये जा रहे शोषण के विरुद्ध बिरसा ने खुले आम जंग छेड़ दी। अपनी निर्धनता और अभावों के बावजूद वे देश को अंग्रेजी शासन और ईसाई पादरियों के कुचक्र से छुड़ाने हेतु चिंतित थे। इसके लिए उन्हें कई बार भूखे प्यासे रहकर वनों में भटकना पड़ा। अभावग्रस्त बिरसा निरन्तर एकान्तवास करते हुए अपने समाज और देश की दुर्दशा पर चिंतन करते रहे। किंवदन्ती है कि ऐसे में ही एक दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और अनायास भगवान के दर्शन भी हुए। तदुपरान्त वे गांव लौटकर कल्याणकारी कार्यों में जुट गए। उनके आयुर्वेद का ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति वनवासियों के कष्ट निवारण में ऐसे सहायक हुए कि उन्होंने बिरसा को ‘धरती का आबा’ मान लिया। सचमुच, यह चमत्कारी घटना थी।

बिरसा वनवासियों के हृदय-सम्राट बन चुके थे। वनवासी उनकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करते थे। बिरसा ने घोषणा की कि वे कम्पनी सरकार की बेगार न करें और उनके आदेशों का पालन भी न करें। सचमुच, ऐसा ही हुआ। सन 1895 में चालफाड़ में बिरसा ने उद्घोष किया कि ‘अब वह दिन दूर नहीं, जब पादरी और अंग्रेज हमारे चरणों पर गिरकर अपने प्राणों की भीख मांगेंगे। आओ, हम एकजुट हों, अब हमारा राज आने वाला है।’ इसी के साथ उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध आन्दोलन की घोषणा कर दी और वनवासियों को फसल बोने से मना कर दिया। इस पर क्रोधित होकर अंग्रेज सरकार की पुलिस द्वारा बिरसा को गिरफ्तार करने का प्रयास किया गया परन्तु वनवासियों के सशस्त्र प्रतिरोध के कारण यह सम्भव न हो सका। पुलिस बिरसा तक पहुंच भी न सकी।

अपने प्रति अंग्रेजों के अनुदार रवैये से त्रस्त बिरसा ने अन्ततः सशस्त्र संघर्ष करने का निश्चय किया और तदनुरूप कार्यवाही आरम्भ कर दी। परन्तु तभी एक अनहोनी घट गई। 23 अगस्त सन् 1895 को स्थानीय जमींदार और पादरी लास्टी सहित पुलिस ने चुपके से पूरे गांव की घेराबन्दी कर ली और वनवासियों को इसकी भनक लगने के पूर्व ही बिरसा को गिरफ्तार कर रांची के कारागार में डाल दिया गया। जब आदिवासियों को इस घटना की जानकारी हुई तो सबने नंगे पैर रांची पहुंचकर जेल को घेर लिया। पुलिस ने उनपर निर्ममतापूर्वक प्रहार किया। तदुपरान्त बिरसा पर झूठा मुकदमा चलाया गया और उन्हें दो वर्ष का कठोर कारावास और पचास रुपये का अर्थदण्ड दिया गया। दो वर्ष तक सजा भुगतने के बाद 30 नवम्बर 1897 को बिरसा कारागार से बाहर आये। अब उन्होंने सुनियोजित तरीके से अंग्रेजी हुकूमत का सामना करने की ठान ली थी।

उन्होंने आदिवासियों की विशाल सेना का गठन आरम्भ कर दिया। सन् 1898 में चालकाड़ के निकट डुम्बारी की पहाडि़यों में हजारों वनवासियों की सभा को संबोधित कर बिरसा ने अंग्रेजों, ईसाई पादरियों और उनके समर्थकों को सबक सिखाने का आव्हान किया। उन्होंने अपनी सेना के पदाधिकारियों की भी घोषणा की। खूंटी को सेना का प्रमुख केन्द्र बनाया गया। जगह-जगह बिरसा के सन्देशों का प्रचार करने हेतु सभाएं आयोजित की गई। आदिवासी सेना संघर्ष हेतु पूर्णतः तत्पर थी। 25 दिसम्बर 1899 को बिरसा के नेतृत्व में सेना की एक टुकड़ी ने सरवादाग मिशन कम्पाउण्ड को जला दिया। दूसरी टुकड़ी ने मुढ़ मिशन कम्पाण्ड पर धावा बोला। तीसरी टुकड़ी मुड़जू मिशन पर हमला करने पहुंची तो वहां का पादरी पूर्व सूचना पाकर निकल गया। और दोनों ने जमकर संघर्ष हुआ। पांच अंग्रेज मार डाले गए। वनवासी सेना उत्साह और जोश से भरी हुई थी तथा उसके हमलों से अंग्रेज भयभीत थे।

इन हमलों के बार बिरसा ने अपनी सेना को कई टुकडि़यों में विभाजित कर उनकी सहायता से अंग्रेजी थानों पर धावा बोलने का सिलसिला कायम रखा। उन्होंने तीन सौ जवानों के साथ खूंटी थाने पर हमला बोला। फिर रांची थाने पर भी आक्रमण कर दिया तो शहर में खलबली मच गई। इन हमलों से अंग्रेज घबरा उठे। अब बिरसा के आन्दोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजों की पूरी फौज खूंटी और डुम्बारी की ओर चल पड़ी। 9 जनवरी सन 1900 को डुम्बारी की पहाडि़यां घेर ली गई। अंग्रेजी फौज और आदिवासियों की सेना में डटकर मुकाबला हुआ। परन्तु तीर-कमान, पत्थर और लाठी जैसे पारम्परिक शस्त्रों वाली वनवासी सेना आधुनिक शस्त्रों से सुसज्जित अंग्रेजी फौज का सामना आखिर कब तक कर पाती ? उस संघर्ष में पहाड़ी पर उपस्थित बिरसा की सेना के दो हजार वनवासियों में से कई सैनिक शहीद हो गए।

वहां से बच निकलने पर बिरसा ने सिंहभूम जिले के जम्कोपाई नामक इलाके में डेरा डाले। उन्होंने पुनः वनवासियों की सेना के गठन का प्रयास किया परन्तु कुछ जासूसों की मदद से पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। बिरसा बंदगांव के एक बंगले में कैद कर लिए गए। यह सूचना मिलते ही वनवासी वहां एकत्र होने लगे। तब पुलिस ने उन्हें तत्काल रांची के कारागार में पहुंचा दिया और उनके अस्सी साथियों को भी कैद में डाल दिया गया। बिरसा के दुस्साहसिक कदमों से भयभीत अंग्रेजों ने उन्हें भोजन में विष दे दिया। परिणामतः 9 जून सन 1900 को मात्र 25 वर्ष की उम्र में आजादी के दीवाने बिरसा का असमय ही प्राणान्त हो गया। वनवासियों के आक्रोश को ध्यान में रखते हुए आततायी अंग्रेजों ने होशियारी से काम लिया और यह समाचार फैलाया कि हैजा से पीडि़त होने के कारण बिरसा का देहान्त हो गया। उनके अन्य साथी फांसी पर लटका दिए गए। भारत की आजादी के लिए निर्भय होकर अंग्रेजों से लोहा लेने वाले बिरसा मुण्डा का नाम सचमुच अविस्मरणीय है।

आज स्वाधीन भारत में सिर्फ वनवासी ही नहीं वरन समस्त देशवासियों के समक्ष अनेक ज्वलंत समस्याएं हैं, जिनके निराकरण में युवाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्रत्येक काल में राष्ट्र के हित में उत्साही युवाओं ने प्राणोत्सर्ग तक करने में कोई संकोच नहीं किया है। परन्तु वर्तमान युवा पीढ़ी ऐसे क्रान्तिकारियों से प्रेरणा लेना तो दूर, उनके बारे में जानती तक नहीं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।

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