अंतर सरकारी पैनल की पांचवी रिपोर्ट – जलवायु परिवर्तन सिर पर मंडरता खतरा

4:06 pm or November 10, 2014
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– प्रमोद भार्गव –

जलवायु परिवर्तन की भयावहता को प्रगट करने वाली वैज्ञानिकों कि प्रमाणिक रिपोर्टें लगातार आ रही हैं। जिस तरह से प्राकृतिक आपदाओं की निरंतरता बढ़ रही है,उससे साफ हो जाता है कि वैज्ञानिकों द्वारा खतरे के दिए जा रहे संकेत असंदिग्ध हैं। लिहाजा अंतर सरकारी समिति की पांचवी ताजा रिपोर्ट पर गंभीरता से विचार करके जलवायु परिवर्तन के कारक बन रहे कारकों पर अंकुश लगाने की कोशिशें नहीं कि गईं तो दुनिया का तबाही की और बढना तय है। क्योंकि इस रिपोर्ट में भी दर्शाया गया है कि समुद्र और वायुमंडल के तापमान में वृद्धि,वैश्विक वर्षाचक्र में बदलाव,हिमखंडों का पिघलना और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि ऐसी घटनाएं हैं,जो जलवायु परिवर्तन के ऐसे  संकेत हैं,जो पृथ्वी को संकट में डाल सकते हैं। इन खतरों के बढ़ने के कारणों में प्रमुख कारण वह औद्योगिक-प्रौद्योगिक विकास है जो ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन तो लगातार बढ़ा रहा है,लेकिन उनकी कटौती के लिए कोई देश तैयार नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की महासचिव बान की मून ने,इस रिपोर्ट को जारी करते हुए नेताओं से उम्मीद की है कि दिसंबर 2014 में पेरू के शहर लीमा में जलवायु परिवर्तन के सिलसिले में जो बैठक प्रस्तावित है,उसमें इस मुद्दे के गतिरोध को तोड़ते हुए मुकाम तक पहुंचाएं। विकसित और विकासशील देशों के उदारवादी चिंतन से जुड़े 193 देशों के प्रतिनिधियों की अब तक हुई शिखर परिचर्चाएं के परिणाम स्वरूप तय किए गए क्योटो प्रोटोकाॅल के  प्रावधान काॅर्बन उत्सर्जन में कमी को अमल में नहीं लाया जा सका है। और न ही विकसित राष्ट्रों द्वारा विकासशील राष्ट्रों को हरित प्रौद्योगिकी की स्थापना संबंधी तकनीक दी गई है। लिहाजा संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में रची गई इस अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संधि के कोई बाध्यकारी हल वैश्विक पंचायतों में नहीं निकल पा रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन पर हुई पंचायतों को पृथ्वी बचाने के श्रेष्ठ अवसर के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन काॅर्बन उत्सर्जन की कटौती को लेकर विकसित और विकासशील देशों के अपने-अपने पूर्वाग्रह हैं। नतीजतन ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 20 प्रतिशत कमी के लक्ष्य पर कोई सहमति नहीं बन पाती। अमेरिका समेत अन्य उभरती अर्थव्यस्थाओं वाले देश इस कटौती के लिए किसी बाध्यकारी संधी पर हस्ताक्षर करने को तैयार नहीं होते। भारत भी इस मुद्दे पर अपने औद्योगिक एवं आर्थिक हितों का पूरा ख्याल रखता है।

इसीलिए भारत भी ग्रीन हाउस गैसों पर नियंत्रण से जुड़े तीन प्रमुख मुद्दों पर असहमति जताता रहा है,जो उसके औद्योगिक हितों पर कुठाराघात करने वाले हैं। ये हैं, कॉर्बन उत्सर्जन में कटौती पर कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतराराष्ट्रीय लक्ष्य, कॉर्बन उत्सर्जन कम करने के लिए किसी राष्ट्रीय कार्रवाही की अंतर्राष्ट्रीय जांच और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कोई बंधनकारी शर्त नहीं मानना। दरअसल भारत सरकार ने ये शर्तें इसलिए सामने रखी थीं,क्योंकि भारत को विकसित देशों से यह उम्मीद नहीं थी कि वे जरूरी आर्थिक मदद के साथ कॉर्बन उत्सर्जन नियंत्रित प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराएंगे। यह आशंका उस वक्त सटीक सबित हुई जब विकासशील देश कोपेनहेगन के विश्वस्तरीय पर्यावरण सम्मेलन में क्योटो प्रोटोकाल को ही दरकिनार करने के मंसूबे जाहिर करने लगे थे। धनी देशों की गरीब देशों को धोखे में डालने वाली इस मंशा के मसौदे का खुलासा ब्रिटेन के अखबार ‘गार्जियन‘ ने किया था। मसौदे में विकासशील देशों को हिदायत दी गई थी कि वे वर्ष 2050 तक प्रति व्यक्ति 1.44 टन काॅर्बन से अधिक उत्सर्जन नहीं करने के लिए सहमत हों,जबकि विकसित देशों के लिए यह सीमा सिर्फ 2.67 टन तय की गई थी।

इस धोखाधड़ी का खुलासा होने से पूर्व जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय समिति ;आईपीसीसी  के अध्यक्ष राजेंद्र पचैरी ने पहले ही आगाह किया था कि 1990 के स्तर से महज तीन प्रतिशत कटौती के अमेरिकी लक्ष्य के कारण संधि का पालन मुश्किल होगा,कि औद्योगिक देशों से ज्यादा कटौती की अपेक्षा की जाए। आईपीसीसी ने 2007 में ही चेता दिया था कि 2020 तक 1990 के ग्रीन हाउस उत्सर्जन की तुलना में 25 से 40 प्रतिशत तक कमी लाकर प्राकृतिक आपदाएं सूखा,बाढ़ और समुद्र के बढ़ते जलस्तर जैसे प्रलयंकारी दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है। लेकिन इन चेतावनियों को कोई भी देश मानने को तैयार नहीं है। यही वजह है कि एक के बाद एक समुद्री तूफानों की आवृत्ति लगातार बढ़ रही है। हुदहुद की पूंछ पकड़कर चला आया निलोफर तूफान इसका ताजा उदाहरण है।

क्योटो संधि के प्रारूप के अनुकूल पर्यावरण के लिए अहितकारी गैसों के उत्सर्जन पर कटौती के बारे में विकसित और विकासशील देशों के समूहों के बीच आम सहमति तो दूर की कौड़ी रही,एक सर्वमान्य सहमति राजनीतिज्ञ वक्तव्य पेश करने के सुझाव पर भी गहरे मतभेद उभरकर सामने आ गए थे। जापान,कनाडा,न्यूजीलैण्ड और हॉलैंड जैसे औद्योगिक देशों का प्रबल आग्रह था कि कॉर्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए सभी देशों के लिए एक ही सशर्त आचार संहिता लागू हो। विकासशील देशों ने इस शर्त को सिरे से खारिज कर दिया था। इन देशों का वाजिब तर्क यह था कि विकसित देश अपना औद्योगिक-प्रौद्योगिक प्रभुत्व व आर्थिक समुद्धि बनाए रखने के लिए जबरदस्त ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके अलावा ये देश व्यक्तिगत उपभोग के लिए भी ऊर्जा का बेतहाशा दुरूपयोग करते हैं। इसलिए खर्च के अनुपात में ऊर्जा कटौती की पहल भी इन्हीं देशों को करना चाहिए। विकासशील देशों की यह चिंता वाजिब है,क्योंकि वे यदि किसी प्रस्ताव के चलते ऊर्जा के प्रयोग पर अंकुश लगा देंगे तो उनकी समृद्ध होती अर्थव्यस्था की बुनियाद ही दरक जाएगी। इसी मंशा के चलते एक चैथाई कॉर्बन उत्सर्जन करने वाले अमेरिका ने क्योटो संधि से दूरी बनाए रखी। और उसने मात्र 17 प्रतिशत कॉर्बन उत्सर्जन कम करने का भरोसा जताया था।

अंतराष्ट्रीय ऊर्जा संस्थान के अनुसार 2007 में विकसित राष्ट्रों की काॅर्बन उत्सर्जन में भूमिका अमेरिका 19.1,आस्ट्रलिया 18.8 और कनाडा 17.4 मीट्रिक टन प्रति व्यक्ति थी। वहीं विकासशील देशों में चीन 4.6 भारत 1.2 और नेपाल की भूमिका 0.1 मीट्रिक टन प्रति व्यक्ति थी। चैथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश होने के बावजूद भारत में प्रति व्यक्ति काॅर्बन उत्सर्जन की दर विश्व की औसत दर से 70 फीसदी कम है और अमेरिका के मुकाबले यह 93 प्रतिशत नीचे है। वैसे भी 1990 से लेकर अब तक भारत में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में केवल 65 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। 2020 तक यह दर बमुश्किल से 70 प्रतिशत तक पहुंचने की उम्मीद है। यदि बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों से इसकी तुलना की जाए तो यह बहुत कम है। अमेरिका और चीन की तुलना में यह दर क्रमशः 15 और 14 प्रतिशत कम है। बावजूद इसके पृथ्वी का तापमान बढ़ाने के लिए सभी औद्योगिक देश दोषी हैं। आबाद जीवन के लिए बढ़ता तापमान एक भयावह संकट है, लिहाजा यह वक्त का तकाजा है कि मानव आबादी भू-मण्डल के खतरनाक एवं अपरिवर्तनीय हालातों से सामना करे,इससे पहले इस वैश्विक समस्या से एक चुनौती के रूप में निपटना जरूरी है। इसलिए जिन देशों के पास अर्थ,ज्ञान और तकनीक की विरासत मौजूद है,वे इस थाती को मानवता की सुरक्षा के लिए उपलब्ध कराएं।

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