बेअसर बाल आयोग,बेपरवाह अधिकारी

4:13 pm or November 10, 2014
Children Rights

– अमिताभ पाण्डेय –

बच्चों के अधिकारों का संरक्षण ,संवध्र्दन हो सके इसके लिए मध्यप्रदेश में भी बाल अधिकार संरक्षण आयोग का गठन कुछ वर्ष किया  है। मध्यप्रदेश शासन ने इस आयोग को न्यायिक  शक्तियां देकर प्रभावशाली बनायां। आयोग अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा किया। अध्यक्ष के साथ ही आयोग के सदस्यों को भी पर्याप्त अधिकार सम्पन्न बनाकर आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई। इतना सब कुछ होने के बाद भी आयोग की कार्यप्रणाली आम जनता को प्रभावित नहीं कर पाई । आयोग में की गई शिकायतों के बावजूद बच्चों के हक ,अधिकार का उल्लधन लगातार हो रहा है। बच्चे स्कूल में हो या स्कूल के बाहर वे अन्याय, उत्पीडन का शिकार हो रहे है। स्कूलों में बच्चों की पिटाई, स्कूल प्रबंधन की मनमानी, ज्यादा फीस वसूली के मामले अकसर समाचार पत्रों की सुर्खियां बनते रहते हैं तो दूसरी ओर जो बच्चे पढने योग्य उम्र में स्कूल नहीं जा पा रहे हैं उनके शोषण, उत्पीडन की घटनाएं भी सामने आती रहती है। बाल श्रम , कार्यस्थल पर बच्चों के साथ तरह तरह से अन्याय होता है। गरीब पिछडे कमजोर वर्ग के बच्चे विपरीत परिस्थियों में भूखे प्यासे रहकर क्षमता से अधिक काम करने पर मजबूर हैं। बाल श्रम के नजारे हमारे आसपास कहीं भी अकसर दिखाई दे जाते है लेकिन बाल श्रम,बच्चों का श्शोषण, उत्पीडन रोकने की जिम्मेदारी जिन सरकारी विभागों की हेै उनको बाल श्रम की घटनाएं बहुत कम नजर आती है। सरकार के रिकार्ड मध्यप्रदेश में बाल श्रमिक इतने कम बताये जाते है कि कोई भी उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। अफसोस यह है कि बाल अधिकार संरक्षण आयोग को सरकार की ओर से जो विधिक शक्तियॅा दी गई वे भी बच्चों के साथ होने वाले अन्याय ,शोषण को पूरी तरह से खत्म करने में सफल नहीं हो पाई है। अन्याय,शोषण के विरूध्द बाल अधिकार संरक्षण आयोग को प्राप्त होने वाली शिकायतों की जांच की रफ्तार इतनी धीमी है कि उसका कोई ऐसा परिणाम नहीं निकलता जिससे अन्याय ,उत्पीडन की घटनाओं को सख्ती से रोका जा सके। कई प्रकरणों में यह देखा गया है कि बाल आयोग की ओर से शिकायतों की जांच जिन अधिकारियों को दी जाती है वे गंभीरतापूर्वक उस पर कार्यवाही नहीं करते। बच्चों की शिकायतों को हल्के से निपटाने, नस्तीबध्द करने,खारिज करने, निराधार बता दिये जाने की कोशिश की जाती हेै। ऐसी कोशिशों का नतीजा यह है कि मध्यप्रदेश में आज तक बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने किसी भी शिकायत में ऐसा प्रभावशाली  फेसला नहीं सुनाया जिससे अन्याय , उत्पीडन करने वालों के मन में डर पैदा हो सके। ऐसा प्रतीत होता है कि आयोग का काम शिकायत मिलने पर जांच कमेटी बनाने, जांच  करवाने, कारण बताओ नोटिस देने तक ही सिमटकर रह गया है। इन सारी गतिविधियों से अन्याय, उत्पीडन का शिकार हुए बच्चे को क्या राहत मिली अथवा मिल रही है ? इस बारे गहराई से चर्चा ओैर चिंतन किये जाने की जरूरत है।

बाल अधिकार संरक्षण आयोग के आदेश, निर्देश कितने बेअसर हैं ? आदेश ,निर्देश के प्रति जिम्मेदार अधिकारी कितने बेपरवाह हैं ? इसका खुलासा खुद आयोग की अध्यक्ष श्रीमती उषा चतुर्वेदी ने किया है। श्रीमती चतुर्वेदी ने मीडिया को बताया कि आयोग को मिली रही शिकायतों के बाद जब जांच रिपोर्ट मंगाई जाती है तो अनेक मामलों में वह आधी अधूरी होती है अथवा शिकायत को निराधार बता दिया जाता है। उनका कहना था कि बच्चों की शिकायतों की जांच का जिम्मा आयोग द्वारा जिन जांच कमेटियों को , अधिकारियों को दिया जा रहा है  वे अनेक प्रकरणों की निष्पक्ष जांच  नहीं कर रहे हैं। आयोग की जानकारी में स्कूल प्रबंधन की मनमानी से जुडे ऐसे मामले भी आये हैं जिनमें जांच अधिकारी ने गंभीरतापूर्वक जांच  का काम नहीं किया। शिकायतों की जांच में लापरवाही देखी गई। जांच  कमेटियों द्वारा निष्पक्ष जांच  नहीं की गई। ऐसी जांच रिपोर्ट पर  आयोग ने नाराजी जाहिर की है। आयोग ने निष्पक्ष जांच नहीं करनेवाले अधिकारियों पर कार्यवाही करने की प्रक्रिया प्रारंभ की है। इसके बाद अधिकारियों की लापरवाही, स्कूल प्रबंधन को शिकयतों से बचाने की कोशिशें बदं हो जायेगीं ,ऐसा दावा नहीं किया जा सकता है।

यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि बाल अधिकार संरक्षण आयोग के दिशा- निर्देश को लेकर बाल अधिकारों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए जिम्मेदार शासकीय विभाग गंभीर नहीं है। बाल अधिकारों का संख्ती से पालन शायद सरकार की प्राथमिकताओं में नहीं है इसीलिए बच्चों के शोषण,उत्पीडन का सिलसिला बंद नहीं हो रहा है। जो बच्चे स्कूल जा रहे हैं वे स्कूल प्रबंधन की मनमानी से परेशान हैं । जो बच्चे स्कूल से बाहर हैं वे घर-दुकान- बंगलें- होटल- कारखाने- ईट-भट्टे अथवा ऐसी ही किसी जगह पर काम करते हुए शोषण उत्पीडन को बर्दाश्त करते हुए जीने पर मजबूर है। ज्यादा मजबूर ,परेशान होने पर ऐसे बच्चों की मौत भी हो जाती है। वे कई बार फांसी के फन्दे पर लटके मिलते है, तो कई बार आग लगने से उनकी मौत हो जाती है। बेवक्त मरे या मारे गये इन गरीब बच्चों की मौत का कारण अकसर पता ही नहीं चलता।

पिछले दिनों सामाजिक सरोकार से जुडी विकास संवाद और इक्वेशंस नामक दो संस्थाओं ने मध्यप्रदेश के धार्मिक, पर्यटन स्थलों पर बच्चों के शोषण से जुडी एक शोधपूर्ण रिपोर्ट प्रकाशित की थी । इस रिपोर्ट में बताया गया था कि बच्चे अमानवीय उत्पीडन का शिकार हो रहे हैं। रिपोर्ट की प्रति बच्चों के हक अधिकार सुनिश्चित करनेवाले सभी शासकीय विभागों को भी प्रेषित की गई। रिपोर्ट शामिल तथ्यों के आधार पर बच्चों को श्रम ,शोषण, उत्पीडन के मजबूर करने वालो पर क्या कार्यवाही हुई ? इसका अभी पता नहीं चल सका है।

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