इंदिरा जी को सम्मान न देकर मोदी ने यह प्रदर्शित किया कि उनका दिल कितना छोटा है

4:36 pm or November 10, 2014
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– एल.एस.हरदेनिया –

नरेन्द्र मोदी ने 31 अक्टूबर को जो किया शायद वह बहुसंख्यक भारतवासियों को अच्छा नहीं लगा होगा। उस दिन भारत के एक महान सपूत का जन्मदिन था साथ ही भारत मां की एक बहादुर पुत्री का बलिदान दिवस भी। शायद नरेन्द्र मोदी को यह पता होगा कि 31 अक्टूबर को इंदिरा जी ने स्वयं मौत को निमंत्रण दिया था। इंदिरा जी की सुरक्षा में देश के सभी क्षेत्रों के रहने वाले शामिल थे। आपरेशन ब्लूस्टार के बाद उनके सुरक्षाकर्मियों में शामिल सिक्खों को हटा दिया गया था। आपरेशन ब्लूस्टार के बाद सिक्ख इंदिरा जी से सख्त नाराज थे। इसलिए संदेह होना स्वाभाविक था कि कहीं सिक्ख सुरक्षाकर्मी इंदिरा जी को नुकसान न पहुंचा दें। इसलिए सिक्ख सुरक्षाकर्मियों को हटा दिया गया। इंदिरा जी को यह बात नागवार गुजरी और उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सिक्ख सुरक्षाकर्मियों को वापिस बुलाया जाए। उन्हें वापिस बुलाया गया और उनने ही इंदिरा जी की हत्या कर दी। इंदिरा जी के परिवार से सिक्ख सुरक्षर्मियों के स्नेही संबंध थे, यह स्वयं राहुल गांधी ने कुछ दिन पूर्व बताया था। राहुल ने कहा था कि वे सुरक्षाकर्मी उन्हें गोद में लेकर खिलाते थे। इस तरह की परिस्थिति के बाद भी सिक्ख सुरक्षाकर्मियों ने इंदिरा जी की हत्या की। इस तरह इंदिरा जी ने जानबूझकर सिक्ख सुरक्षाकर्मियों को वापस बुलाकर यह संकेत दिया था कि वे भारत के प्रत्येक नागरिक को चाहे वे किसी भी क्षेत्र के हों बराबर स्नेह करती हैं। इस तरह वे एक सच्चे मायने में शहीद थीं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि सरदार वल्लभभाई पटेल ने हमारे देश की सीमा बढ़ाई। अंग्रेजों ने तो राजा रजवाड़ों को अपने कब्जे में रखा था परंतु जब भारत छोड़ने का समय आया तो अंग्रेजों ने उन्हें या तो भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या आजाद रहने का अधिकार दे दिया। पटेल ने अपनी रणनीति और दृढ़ इच्छाशक्ति से सभी रियासतों को भारत में शामिल कर लिया।

यह ऐसी अद्भुत सफलता थी जिसने सरदार पटेल को अमर बना दिया। कश्मीर और हैदराबाद के विलय में काफी समय लगा। जहां तक कश्मीर का सवाल है वहां के तत्कालीन राजा हरिसिंह अपनी रियासत को आजाद रखना चाहते थे। जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने हरिसिंह को चेतावनी दी कि उनका ऐसा निर्णय कश्मीर के हित में नहीं होगा। नेहरू जी ने हरिसिंह को संदेश भेजा कि वे कश्मीर आना चाहते हैं। इस पर राजा हरिसिंह ने कहा कि यदि वे आयेंगे तो उन्हें गिरतार कर लिया जाएगा। इसके बाद सरदार पटेल ने उन्हें संदेश भेजा कि वे कश्मीर आना चाहते हैं परंतु उनसे भी हरिसिंह ने कहा यदि वे आयेंगे तो उन्हें भी गिरतार कर लिया जायेगा।

इसके बाद सरदार पटेल ने माउंटबेटन से कहा कि वे कश्मीर जायें और उस पागल (हरिसिंह) को समझाएं कि वह चाहे तो भारत में शामिल हो जायें और यदि वे भारत में शामिल नहीं होना चाहते तो वे पाकिस्तान में शामिल हो जायें परंतु वह किसी भी हालत में आजाद रहने का न सोचें। उसके बाद जो परिस्थिति निर्मित हुई वे सभी को ज्ञात है। पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। इसके बाद मजबूर होकर हरिसिंह को कश्मीर के भारत में विलय के समझोते पर हस्ताक्षर करना पड़ा। उसके बाद मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में पहुंच गया। उस समय तक भारत का शासन विधिवत रूप से हमें नहीं सौंपा गया था। उस समय लार्ड माउंटबेटन ही देश के सर्वेसर्वा थे। भारत और पाकिस्तान पर ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण था। उनके ही फैसले के अनुसार मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में गया। यह आरोपित किया जाता है कि यदि सरदार पटेल को कश्मीर का मुद्दा सौंप दिया जाता तो मामला उलझता नहीं। जो यह आरोप लगाते हैं वे उस समय की संवैधानिक स्थिति को भुलाकर यह आरोप लगाते हैं वाले यह भूल जाते हैं कि कश्मीर की वैसी स्थिति नहीं थी जो अन्य राजे रजवाड़ों की थी। श्रीनगर न तो रेल से जुड़ा था ना ही ठीक तरह से सड़क मार्ग से। शीघ्रता से श्रीनगर सिर्फ हवाई मार्ग से पहुँचा जा सकता था और हवाई मार्ग से उसी समय पहुंचा जा सकता था जब हरिसिंह इसकी इजाजत देता। यह भी कहा जाता है कि धारा 370 लगाने की बात नेहरू ने स्वीकार की थी। वास्तविकता यह है कि धारा 370 को विलय का मुख्य आधार हरिसिंह ने बनाया था।

भाजपा नेहरू जी को भारत के विभाजन के लिये भी जिम्मेदार मानती है। परंतु वे इस बात को भूल जाते हैं कि पटेल ने भी भारत के विभाजन को स्वीकार कर लिया था। जब यह स्पष्ट हो गया कि भारत का विभाजन अवश्यंभावी है और यदि विभाजन को स्वीकार नहीं किया जाता तो अंग्रेज बिना किसी को सत्ता सौंपे छोड़कर चले जायेंगे। यदि ऐसा होता है तो देश में अराजकता फैल जायेगी। जब ऐसी संभावना नजर आई तो पटेल ने कहा था कि जब शरीर का एक अंग कैंसर से पीडि़त हो जाता है तो उस अंग को काटकर अलग कर दिया जाता है। पटेल ने पाकिस्तान को कैंसर बताया था और बाकी शरीर (बाकी भारत) को बचाने के लिये विभाजन को स्वीकार किया था। सच पूछा जाए तो विभाजन न सिर्फ नेहरू-पटेल वरन् पूरी कांग्रेस का निर्णय था। इस तरह देश के विभाजन व कश्मीर के मामले में पटेल की वही भूमिका थी जो नेहरू और अन्य कांग्रेस नेताओं की थी।  आजाद भारत में राजे-रजवाड़ों के शामिल करने में पटेल की निर्णायक भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। परंतु इस बात को भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि उनके इस मिशन में नेहरू समेत पूरी कांग्रेस उनके साथ थी।

जहां पटेल ने देश की सीमा बढ़ाई वहीं इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इंदिरा जी ने देश की एकता कायम रखने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। बांगलादेश के मुद्दे को लेकर हमारे देश को काफी कठिनाई से गुजरना पड़ा था। बांगलादेश के लोगों ने पाकिस्तान के विरूद्ध विद्रोह कर दिया था। उस समय अमरीका खुले रूप से पाकिस्तान का साथ दे रहा था। यहां तक कि पाकिस्तान की सहायता के लिये सातवां बेड़ा भेजा था। परंतु इंदिरा जी ने अद्भुत साहस और रणनीति अपनाकर अमरीकी सहायता के बावजूद पाकिस्तान को शिकस्त दी थी और उसके बाद संसद में घोषणा की थी कि ढाका शीघ्र ही एक नये मुल्क की राजधानी बनने वाला है। इंदिरा जी की इस सफलता की प्रसंशा करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें दुर्गा माता की पदवी दी थी।

इसके बाद देश को सिक्ख आतंकवाद का सामना करना पड़ा था। कुछ दिन पहले सिक्खों के एक भाग ने आनंदपुर में एक प्रस्ताव पारित कर स्वतंत्र खलिस्तान की मांग की थी। भिंडारवाले ने इस मांग के समर्थन में एक बड़ी ताकत का निर्माण कर लिया था। अमृतसर के स्वर्णमंदिर पर भिंडरवाले का कब्जा था। उस समय इस बात की शंका व्यक्त की जा रही थी कि भिंडरवाले विधिवत रूप से स्वतंत्र खलिस्तान की घोषणा कर सकता था। वह ज्योंही खलिस्तान की घोषणा करता पाकिस्तान और अमरीका उसे कूटनीतिक मान्यता दे देते। इस तरह के इरादे को असफल करने के लिये इंदिरा जी ने स्वर्णमंदिर में फौजें भेजीं। यदि फौज भेजने में देरी होती तो भारत का एक और विभाजन हो जाता।

इस तरह देश की एकता बनाए रखने में सरदार पटेल और इंदिरा गांधी की भूमिका समान रूप से महत्वपूर्ण है। इस बात के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सरदार पटेल और इंदिरा जी को समान रूप से सम्मान देना था। परंपरा के अनुसार नरेन्द्र मोदी को इंदिरा जी की समाधि पर जाकर उन्हें याद करना था। ऐसा न करके मोदी ने यह प्रदर्शित किया है कि उनका सीना भले ही 56 इंच का हो उनका दिल संकुचित है।

यहां इस बात का उल्लेख भी प्रासंगिक होगा कि नरेन्द्र मोदी मुक्त भारत का सपना देखते हैं परंतु वे इस बात को भूल जाते हैं कि पटेल भी कांग्रेस के ही नेता थे। इस तरह यदि नरेन्द्र मोदी पटेल को अमृत्य प्रदान करने में लगे हैं तो ऐसा करते हुए कांग्रेस को भी अमर कर रहे हैं।

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