श्राद्ध के लिए ढूंढ़ते रह जाओगे कागा

2:53 am or September 8, 2014
Crow

नरेन्द्र देवांगन

ऊंची-ऊंची इमारतों की छत पर लगे टी.वी.एंटीना के कोने पर अब कौए नहीं बैठते। उनकी कांव-कांव का शोर अब कानों को नहीं बेधता। एक समय था जब कौए सभी जगह आसानी से दिखाई दे जाते थे, किंतु आज इनकी तेजी से घटती संख्या के कारण ही अब इनकी गणना एक दुर्लभ पक्षी के रूप में की जा रही है। इसे प्रकृति की मार कहें या पर्यावरण में आया बदलाव कि आज कौए की आधी से अधिक प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। शेष बची प्रजातियों में से करीब 20 प्रतिशत कौए जंगलों में जाकर बस गए हैं। आज शहरी वातावरण में कौए बहुत कम पाए जाते हैं। कौओं की लगातार कम होती संख्या के पीछे हमारी उपेक्षा ही जवाबदार है। हमने कभी कौओं के प्रति अपनी प्रीति दिखाई ही नहीं। कौआ एक घरेलू पक्षी है, उसके बाद भी हम हमेशा उसकी उपेक्षा ही करते हैं।

घरेलू कौआ सामान्यतः झुंड में रहता है और रात्रि झुंड के साथ ही पेड़ों पर व्यतीत करता है। मानव के बहुत अधिक निकट रहने के कारण यह काफी चालाक तथा धूर्त हो गया है। यह सब कुछ खाता है। इसके भोजन में मरे हुए चूहे, सड़ा-गला मांस, टिड्डी, दीमक, छोटे-छोट अंडे तथा चिडि़यां, कूड़ा-करकट, चैके की जूठन, अनाज आदि को सम्मिलित किया जा सकता है। घरेलू कौए का प्रजनन काल सामान्यतया अप्रैल से जून तक होता है। सभी प्रकार के कौओं में कुछ सामान्य विशेषताएं होती हैं। उदाहरण के लिए इनमें नर और मादा का रूप-रंग और आकार एक जैसा होता है। पहाड़ी कौए को छोड़कर सभी कौए पेड़ों पर लगभग एक जैसे घोंसले बनाते हैं। इनकी सभी प्रजातियों में प्रजनन काल तो अलग-अलग होता है, किंतु प्रत्येक प्रजाति की मादा एक बार में चार से छह तक अंडे देती हैं।

कौआ बड़ा ही उपेक्षित पक्षी है। गहराई से उसका जीवन अध्ययन करने पर हमें पता लगता है कि वह तो बड़ा बुद्धिमान, धीर गंभीर और संवेदनशील पक्षी है। रोटी का एक टुकड़ा मिलने पर भी कौआ उसे अपने साथियों को बुलाकर उनके साथ मिलकर बांट खाता है। किसी कौए की मौत होने पर सैकड़ों कौए इकट्ठे होकर उसका मातम मनाते हैं। कहते हैं कि सभी कौए मिलकर, मृत कौए का अंतिम संस्कार तक करते हैं। इनकी अपनी एक पंचायत होती है, जो दोषी कौओं को दंड भी देती है।

विज्ञान की दृष्टि से भी इसे एक अत्यंत विकसित पक्षी माना गया है। कौए के स्वभाव में भोलापन भी मिलता है। न जाने कब से यह भोला पंछी धूर्त कोयल के हाथों उल्लू बनता आ रहा है। यह बेचारा न सिर्फ कोयल के अंडे सेता है बल्कि उसके बच्चों को भी स्वयं की संतान समझकर बड़ा करता है। आंगन में फुदकती चिडि़या तो दाना चुगकर अपने घोंसले में चली जाती है, पर कौआ छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़ों को अपना भोजन बनाकर घर के आसपास की गंदगी को भी साफ करते हैं ओर हमें कई संक्रामक रोगों से भी बचाते हैं।

चिंता का विषय है कि कौओं की संख्या दिन पर दिन कम होती जा रही है। आज हम विकास की इस अंधी दौड़ में कौओं की महत्ता को भले ही न समझ पा रहे हों लेकिन लगातार कम होती उनकी संख्या से पर्यावरण प्रेमी जहां इसे पर्यावरण के लिए एक खतरनाक संकेत मान रहे हैं, वहीं वैज्ञानिक इस बात से चिंतित हैं कि कौओं की स्थिति भी कहीं गिद्धों की तरह ही न हो जाए। कौओं की लगातार कम होती संख्या के दो कारण है। पहला कारण तो यह है कि वातावरण में अचानक जो परिवर्तन हो रहा है और खाद्य पदार्थों में जो जहरीली चीजें आ रही हैं, इनकी वजह से कौओं की प्रजनन क्षमता में कमी आने लगी है।

दूसरी वजह यह है कि अंधाधुंध वृक्षों की हो रही कटाई से इनके लिए आवास की समस्या उत्पन्न हो गई है, क्योंकि कौओं का स्वभाव है कि वे एकांत में अपना घोंसला बनाते हैं जो आजकल उन्हें कम मिल पा रहा है। गौरतलब है कि यहां कौओं की मुख्यतः दो प्रजातियां आमतौर पर देखी जाती हैं। एक जो पूरे काले होते हैं और दूसरे जिनके गले में सफेद धारी होती है। सफेद धारी वाले कौए तो अभी दिखाई पड़ जाते हैं, क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता काले कौओं से कुछ ज्यादा होती है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सफेद धारी वाले कौओं पर बदलते पर्यावरण का असर नहीं पड़ेगा। कहना न होगा कि इनकी लगातार कम होती संख्या गिद्धों के खत्म होने से कम खतरनाक नहीं है। इनके नहीं रहने से पृथ्वी की पूरी खाद्य श्रृंखला ही असंतुलित हो जाएगी।

इंसानी जिंदगी में कौओं के महत्व को हमारे पुरखों ने बहुत पहले ही समझ लिया था। यही वजह थी कि आम आदमी की जिंदगी में तमाम किस्से कौओं से जोड़कर देखे जाते रहे। लेकिन अब इनकी कम होती संख्या चिंता का सबब बन रही है। जानकार कहते हैं कि इसके जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि हम खुद ही हैं जो पर्यावरण को प्रदूषित करके कौओं को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कौआ द्वारा मनुष्य के सिर पर चोंच मारना किसी इंसान के लिए अपशकुन होता है या नहीं, यह तो नहीं पता, लेकिन आज जाने-अनजाने मशीनीकरण के इस युग में हम जिस तरह प्रकृति से छेड़छाड़ कर रहे हैं, उससे इन कौओं के लिए अपशकुन जरूर साबित होने जा रहा है। अगर इस पर शीघ्र ध्यान नहीं दिया गया और यही हालत रही तो वह दिन दूर नहीं जब कौए भी गिद्धों की तरह कहीं नजर न आएं।

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