मोदी, उमा बनाम जवाहरलाल नेहरू: वैज्ञानिक चिन्तन का सवाल

5:05 pm or November 10, 2014
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– सुभाष गाताड़े –

क्या मिथकों में वर्णित किस्से-कहानियों को खास समाजों, समुदायों में वैज्ञानिक प्रगति का प्रमाण माना जा सकता है ? क्या विभिन्न धर्मग्रंथों में दिए चमत्कारों के विवरण हमें उन विशिष्ट धर्म के माननेवालों के अधिक ‘विज्ञाननिष्ठ’ होने का सबूत मान सकते हैं ?

विज्ञान की सामान्य समझदारी रखनेवाला साधारण शख्स भी बता सकता है कि ऐसी बातें बेबुनियाद होती हैं, उन्हें आप मानवीय कल्पना की अदभुत उड़ान कह सकते हैं, पुराने समयों में विपरीत भौतिक परिस्थितियों का सामना करती मानव की मेधा/जीजीविषा का प्रतीक मान सकते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं !

अब यह अलग बात है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लम्बे समय प्रचारक रहे जनाब नरेन्द्र मोदी-जो पिछले लगभग छह माह से मुल्क के वजीरे आज़म बने हैं-इस मामले में अलग सोचते हैं। यह अकारण नहीं कि मुंबई में अम्बानी खानदान से जुड़े एक अस्पताल के उदघाटन के अवसर पर उन्होंने बाकायदा महाभारत नामक मिथक के बहाने भारत में जेनेटिक साइंस होने या गणेश के होने के नाते प्लास्टिक सर्जरी के प्राचीनकाल में उपस्थित होने की बात रखी। उनके लब्ज थे ‘महाभारत का कहना है कि कर्ण मां के गोद से पैदा नहीं ंहुआ था। इसका मतलब ये है कि उस समय जेनेटिक साइंस मौजूद था … हम गणेशजी की पूजा किया करते हैं, कोई तो प्लास्टिक सर्जन होगा उस जमाने  में, जिसने मनुष्य के शरीर पर हाथी का सर रख कर के प्लास्टिक सर्जरी प्रारम्भ किया होगा।’

इसमें कोई दोराय नहीं कि वैज्ञानिक शब्दावली और धार्मिक-मिथकीय पाठों का यह विचित्रा घालमेल टीवी तथा आम सभाओं में उपस्थित होनेवाले धर्मप्रचारकों एवं उपदेशकों की तरफ से दिए जानेवालें प्रवचनों जैसा सुनाई देता है जो अपने अज्ञानी अनुयायियों को अपने देश के ‘प्राचीन गौरव’ का बखान करते हैं।

प्रधानमंत्री की इस तकरीर पर गौर करते हुए वरिष्ठ पत्रकार करण थापर ने अपने आलेख / टू फेसेस आफ मोदी, द हिन्दू/ में दो बातें कहीं: एक, संविधान की धारा 51/ए/एच का हवाला देते हुए जिसमें संविधान के अन्तर्गत हर व्यक्ति कोे वैज्ञानिक चिन्तन विकसित करने की जिम्मेदारी मिली है, उन्होंने पूछा कि ‘ऐसे अपुष्ट मिथकों के आधार पर चिकित्सा के क्षेत्रा में प्रगति’ के प्रधानमंत्री के दावे किस तरह संविधान का पालन कर रहे हैं।  उनकी दूसरी महत्वपूर्ण बात थी कि ‘मै इस बात से निराश हू कि इस मसले पर मीडिया ने अधिक ध्यान नही दिया और मुझे आश्चर्य जान पड़ता है कि किसी भारतीय वैज्ञानिक ने प्रधानमंत्री के दावों का खंडन नही किया है।’

निश्चित ही जनाब मोदी के उपरोल्लेखित वक्तव्य में  हमं संघ परिवार से सम्बद्ध दीनानाथ बात्रा की किताबों में लिखी बातों की झलक मिल सकती है, जो इन दिनों गुजरात के 42,000 सरकारी स्कूलों में पढ़ायी जा रही हैं। एक उदाहरण देखा जा सकता है बात्रा की किताब ‘तेजोमय भारत’ का जिसमें भारत की ‘महानता’ के किस्से बयान किए गए है:

अमेरिका स्टेम सेल रिसर्च का श्रेय लेना चाहता है, मगर सच्चाई यही है कि भारत के बालकृष्ण गणपत मातापुरकर ने शरीर के हिस्सों को पुनर्जीवित करने के लिए पेटेण्ट पहले ही हासिल किया है .. आप को यह जान कर आश्चर्य होगा कि इस रिसर्च में नया कुछ नहीं है और डा मातापुरकर महाभारत से प्रेरित हुए थे। कुंती के एक बच्चा था जो सूर्य से भी तेज था। जब गांधारी को यह पता चला तो उसका गर्भपात हुआ और उसकी कोख से मांस का लम्बा टुकड़ा बाहर निकला। द्वैपायन व्यास को बुलाया गया जिन्होंने उसे कुछ दवाइयों के साथ पानी की टंकी में रखा। बाद में उन्होंने मांस के उस टुकड़े को 100 भागों में बांट दिया और उन्हें घी से भरपूर टैंकों में दो साल के लिए रख दिया।दो साल बाद उसमें से 100 कौरव निकले। उसे पढ़ने के बाद मातापुरकर ने एहसास किया कि स्टेम सेल की खोज उनकी अपनी नहीं है बल्कि वह महाभारत में भी दिखती है। (पेज 92-93)

हम अन्दाज़ा ही लगा सकते हैं कि सरकार का प्रमुख अगर संविधान की धाराओं पर गौर किए बिना अपने निहायत निजी विचारों को लोगों के साथ साझा कर रहा हो तो उसके मंत्रियों का आचरण कैसे अलग हो सकता है। पिछले दिनों उत्तराखण्ड की यात्रा पर गयी जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती ने ‘हिमालयन इन्स्टिटयूट आफ ग्लेशियोलोजी एण्ड फारेस्ट रिसर्च इन्स्टिटयूट’ के विशेषज्ञों से बात करते हुए वर्ष 2013 में वहां आयी आपदा का सरल समाधान ‘ढूंढ लिया।’ उनके मुताबिक चूंकि केदारनाथ धाम के आसपास अनास्थावान या नास्तिक लोग खुले में शौच करते हैं इसी वजह से यह हुआ। उनके मुताबिक मंदाकिनी और सरस्वती नदियों से बनी प्राकृतिक सीमारेखा के अन्दर पहले धाम के आसपास शौच जैसी गतिविधियों पर पाबन्दी थी। मगर जैसे जैसे टाइम बीतता गया, मुख्यतः व्यवसाय के लिए नास्तिक यहां पहुंचे, जिसने 2013 की आपदा को जनम दिया।’

21 वीं सदी की दूसरी दहाई में सत्ता की बागडोर सम्भाले लोगों द्वारा ऐसी आधारहीन, अतार्किक बातों की प्रस्तुति और उसे लेकर प्रबुद्ध कहलानेवाले समाज का मौन बरबस हमें भारत के प्रथम प्रधानमंत्राी जवाहरलाल नेहरू, जो तर्कशीलता एवं वैज्ञानिक चिन्तन पर सर्वाधिक जोर देते थे और बाकियों से भी यह उम्मीद करते थे, की याद ताजा करता है। 1934 में जब बिहार भूकम्प को लेकर गांधीजी ने प्रतिक्रिया व्यक्त की कि यह ‘अस्पृश्यता के पाप का फल’ है, तब नेहरू ने रविन्द्रनाथ ठाकुर की बात का समर्थन करते हुए दोहराया कि ‘इससे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रतिकूल किसी बात की कल्पना नहीं की जा सकती।’

नवस्वाधीन भारत में वैज्ञानिकों एवं इंजिनीयरों की मजबूत जमात खड़ी करने के लिए – आई आई टी का निर्माण हो, कौन्सिल आफ साइंटिफिक एण्ड इंडस्ट्रियल रिसर्च, आणविक उर्जा प्रतिष्ठानों और डिफेन्स रिसर्च डेवलपमेण्ट आर्गनायजेशन आदि से जुड़ी रिसर्च प्रयोगशालाओं के लम्बे चैडे़ नेटवर्क का निर्माण हो, या भारत को इलेक्ट्रानिक्स एवं स्पेस युग में प्रवेश दिलाने के लिए जिन्दगी के आखरी दो सालों में चली उनकी कोशिशें हो, इसके लिए उनके योगदान को हमेशा ही रेखांकित किया जाता रहेगा, मगर महज ईंटा गारे की बात नहीं बल्कि वैज्ञानिक पद्धति, वैज्ञानिक चिन्तन, वैज्ञानिक रूख पर उनके जोर ने राष्ट्र के विकास में महति भूमिका निभायी थी।

भारतीय विज्ञान कांग्रेस के कोलकाता सम्मेलन (1938) के उद्घाटन के अवसर पर ही उन्होंने अपने इस चिन्तन को साझा किया था:

‘ हालांकि मैं लम्बे समय से भारतीय राजनीति के रथ से अधीन होकर चल रहा हूं और मुझे अन्य विचारों के लिए फुरसत नहीं मिलती है, मगर मेरा मन हमेशा ही उन दिनों कीे ओर लौटता रहा है जब एक विद्यार्थी होने के नाते मैं विज्ञान के उस घर केम्ब्रिज की प्रयोगशालाओं का अवलोकन करता था.. बाद के दिनों में अलग अलग रास्तों से फिर विज्ञान तक पहुंचा जब मैंने एहसास किया कि विज्ञान न केवल एक सुखद अमूर्तन और डाइवर्जन है बल्कि वह जीवन का तानाबाना है, जिसके बिना आधुनिक दुनिया विलुप्त हो जाएगी। …यह विज्ञान ही हो सकता है जो भूखमरी का शिकार हमारे सम्पन्न मुल्क में भूख और गरीबी की समस्या को, अज्ञान और निरक्षरता की समस्या को, अंधश्रद्धा और जड़ हो चुकी परम्पराओं को और बरबाद हो रहे सम्पन्न संसाधानों की समस्या को समाप्त कर सकता है।’ (साइंस एण्ड कल्चर, जुलाई-अगस्त 2011)

हम देख सकते हैं कि इस मामले में निजी दृष्टिकोण और सार्वजनिक रूख/पोजिशन के बीच स्पष्ट विभाजन पर उनके जोर ने अपने सहयोगियों से साथ भी सोमनाथ मंदिर के निर्माण के मसले पर उनके मतभेद हुए। यहां इस बात को भी रेखांकित करना जरूरी है कि महात्मा गांधी की भी इस मसले पर पोजिशन अलग नहीं थी। मिसाल के तौर पर, जब सरदार पटेल और कन्हैयालाल मुंशी महात्मा गांधी से इस मसले पर मिलने गए तो उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर का निर्माण लोगों की सहायता से होना चाहिए न कि राज्य के। जवाहरलाल नेहरू ने भी इस प्रोजेक्ट से अपनी दूरी जाहिर की। और जब मंदिर निर्माण पूरा हुआ और तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने मंदिर के उद्घाटन समारोह में जाना चाहा, तब नेहरू ने इसका साफ विरोध किया। उनका कहना था कि एक धर्मनिरपेक्ष मुल्क के राष्ट्रपति को ऐसे कार्यक्रम में भाग नहीं लेना चाहिए। अन्ततः राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद कार्यक्रम में शामिल हुए, मगर एक साधारण नागरिक के तौर पर। आई आई टी गुवाहाटी के कान्वोकेशन समारोह को (2011) सम्बोधित करते हुए ‘नेहरू और वैज्ञानिक चिन्तन’ विषय पर बोलते हुए तत्कालीन काबिना मंत्री जयराम रमेश ने बताया था कि जब मंदिर के निर्माण के सम्बन्ध में जब कन्हैयालाल मुंशी ने बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास को पत्रा लिखा कि वह ‘होआंग हो, यांगत्से और पर्ल नदियों का पानी और तिन शान पर्वतों पर स्थित पेड़ की चन्द शाखाएं’ भेजने का प्रबन्ध करें तो इस मसले पर नेहरू ने उनको झाड़ा। अपने कैबिनेट सहयोगी कन्हैयालाल मुंशी से नेहरू ने कहा, ‘‘ इस पत्र ने हमारे दूतावास और मुझे भी विचलित किया है। इस बात का विशेष फरक नहीं पड़ता (निश्चित ही वह भी उतना वांछनीय नहीं होता) कि एक निजी नागरिक ने ऐसी गुजारिश की होती, मगर जब पत्रा सरकार से सम्बधित व्यक्ति भेजे और जिसमें राष्ट्रपति के नाम का भी उल्लेख हो तो यह हम सभी के लिए शर्मिन्दगी वाली बात होती है।

यह सभी के सामने है कि नेहरू जिस पद पर विराजमान थे, उसी पद पर नरेन्द्र मोदी का स्थानापन्न होना, महज कांग्रेसनीत सरकार के बजाय भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आगमन के तौर पर नहीं देखा जा सकता, एक तरह से इसे भारतीय राजनीति के अब तक चले आ रहे व्याकरण में लाए जा रहे नए बदलाव के तौर पर, सियासत के प्रतिमान में बदलाव के तौर पर देखा और समझा जाना चाहिए। अपने एक आलेख में वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण ने ठीक लिखा था कि ‘ऊपरी तौर पर अहानिकर लगनेवाली घटनाएं बताती हैं कि भाजपा और उसका मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय होने के मायने बदलना चाहता है।’ (बिजनेस स्टेण्डर्ड 15 अगस्त 2014, पीएम एज पिलिग्रिम आर इंडियननेस रिडिफाइन्ड) हम काठमांडू की पशुपतिनाथ मंदिर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किए गए रूद्राभिषेक – जो शिव को प्रसन्न करने के नाम पर किया जाता है – को याद कर सकते हैं, जब वह नेपाल की यात्रा पर गए थे। केसरिया कुर्ता पहने और केसरिया शाल ओढे मोदी ने पवित्र कहलानेवाले रूद्राक्षों की माला भी पहनी थी और उन्होंने मंदिर संचालकों को 2,500 किलोग्राम चन्दन की लकड़ी और 2,400 किलोग्राम घी भी इस अवसर पर भेंट किया। भक्तगणों का मानना होता है कि इस अभिषेक से उनकी कामना पूरी होती है और मन एवं शरीर पर नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं।

भारत भूषण ने उपरोक्त लेख में यह सवाल उठाया था कि ‘प्रश्न यह है कि क्या इसे धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र के प्रतिनिधि के तौर पर किया जाना चाहिए’। उन्होंने रिडिफ डाट काम के पत्रकार के हवाले से बताया था कि इस रस्म और पशुपतिनाथ मंदिर को दी गयी भेंट से सरकार के जेब से 4 करोड़ और लगभग दस लाख रूपए गए। बाज़ार में चन्दन के लकड़ी की कीमत सोलह हजार रूपए प्रति किलो है और घी लगभग 400 रूपए प्रति किलोग्राम मिलता है।

‘एक सरकारी अधिकारी ने रिपोर्टर को बताया कि यह भारत सरकार द्वारा ‘भक्तिभाव से अर्पण’ किया गया है और विदेश जानेवाले प्रधानमंत्री वहां के राज्यप्रमुखों के नाम महंगी भेंट की चीजें ले जाते हैं। हालांकि, भगवान शिव न नेपाली राज्य के प्रमुख हैं। और अगर भारत सरकार नेपाल को चन्दन भेंट करना चाह रही थी तो उसे मन्दिर में मोदी की निजी यात्रा से जोड़ना कहां तक उचित था?’ (बिजनेस स्टेण्डर्ड 15 अगस्त 2014, पीएम एज पिलिग्रिम आर इंडियननेस रिडिफाइन्ड) पिछले दिनों अपनी विदेश यात्राओं में जजमान राष्ट्रप्रमुखों को गीता की प्रति मोदी ने भंेट की थीं। जापान में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने इस मामले में सेक्युलर लोगों पर तंज कसा था।

नेहरू की जीवनी बताती है कि जब वह टर्की जाने को हुए तब मौलाना आज़ाद ने उन्हें कुराण की एक प्रति सौंपी और कहा कि वह उसे टर्की के राष्ट्रप्रमुख को भेंट करें। नेहरू ने आज़ाद का शुक्रिया अदा किया और कहा कि एक सेक्युलर मुल्क के राष्ट्रप्रमुख होने के नाते मेरे लिए यह मुनासिब नहीं होगा कि हम खास धर्म की किताब किसी को भेंट करें। धर्मनिरपेक्षता का मतलब है राज्य और धर्म का पूर्ण अलगाव, मेरी निजी मान्यताएं हो सकती हैं मगर पद की जिम्मेदारी का तकाज़ा है कि मैं उन्हें अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों को प्रभावित न करने दूं।

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