भारत के प्रधान मंत्री का दिल बड़ा होना चाहिए

5:25 pm or November 10, 2014
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– भवानी शंकर –

यह तो सारा देश जानता है के भारतीय जनता पार्टी के नेता और भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी बहुत अच्छे वक्ता  हैं. उनके भाषणो से ही प्रभावित हो कर  देश के मतदाताओं ने उन्हें चुना है . उनकी भाषा ऐसी  है के लोगों को उनपर भरोसा  हो जाता है. यह कोई साधारण बात नहीं है और इसके साथ बहुत ही गंभीर ज़िम्मेदारियाँ भी जुड़ जाती हैं. चुनाव अभियान के दौरान तो यह बात समझ में आती थी के वो कांग्रेस और आज़ादी के बाद से चली आ रही कांग्रेस सरकारों की जम  कर आलोचना करें. उन्हें नाकारा और नाकाम कहें . आखिर कार इसी आलोचना के बल पर वो चुनाव जीतना चाहते थे.  क्योंकि  चुनाव भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच एक जंग का रूप धारण कर चूका था तथा  चुनाव और जंग में सब कुछ जायज़ है इस लिए इस कड़वी आलोचना का किसी ने बुरा नहीं माना.

पर अब स्थितियां बदल गयी हैं।  नरेंद्र मोदी अब केवल भारतीय जनता पार्टी के नेता ही नहीं हैं जो अपने लिए वोट मांग रहे हैं. वो अब भारत देश के प्रधान मंत्री भी हैं और उनकी जिम्मेदारी उन लोगों के प्रति भी है जिन्हों ने उन्हें वोट नहीं दिया. प्रधान मंत्री होना उनकी पहली ज़िम्मेदारी है और भाजपा का या आरएसएस का सदस्य होना बाद में आता है . आंकड़े दर्शाते हैं के देश में तीस प्रतिशत अर्थात १० में से तीन मत दाताओं ने ही उन्हें वोट दिया है. यह हमारे लोक तंत्र की विडम्बना है की सीटों और वोटों का ताल माल ज़रा अजीब  सा है.  यहाँ पर तीस प्रतिशत वोट हासिल करनेवाली भारतीय जनता पार्टी को तो २८२ सीटें  मिलती हैं और २० प्रतिशत वोट पानेवाली कांग्रेस को ४४ सीटें मिलती हैं. पर यह विषय आज के वातावरण के लिए उपयुक्त नहीं है. इसकी चर्चा फिर कभी कर सकते हैं.

इस  परिपेक्ष्य में यह प्रश्न उठता है के क्या नरेंद्र मोदी आज कल जो भाषण करते हैं वो एक भारत के प्रधान मंत्री के वक्तव्य हैं या  केवल किसी भारतीय जनता पार्टी   के नेता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक के भाषण हैं? बहुत लम्बी चौड़ी बहस की ज़रूरत नहीं है केवल उनके एक ही आचरण पर नज़र डाली जाई तो मामला साफ़ हो जाता है.

यह मात्र एक संयोग है के देश के पहले गृह मंत्री सरदार  वल्लभ भाई   पटेल  की सालाना वर्ष गांठ  और  पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि  एक ही तारीख को पड़ती हैं. संघ, नरेंद्र मोदी और वल्लभ भाई का रिश्ता कुछ पेचीदा है. एक तरफ तो वल्लभ भाई ने संघ पर महात्मा गांधी की हत्या के बाद पाबन्दी इस लिए लगायी थी क्योंकि उनकी यह मान्यता थी  के संघ के  नेताओं के भड़कीले भाषणो से ही ऐसा माहौल पैदा हुआ की कोई व्यक्ति महात्मा गांधी की हत्या करने की हिम्मत कर सके   और दूसरी तरफ  पंडित जवाहरलाल नेहरू की गैर मौजूदगी में कांग्रेस कार्यसमिति में यह प्रस्ताव पारित कराया था के संघ को कांग्रेस का सेवा दाल बना दिया जाये। यह बात और है की इस प्रस्ताव की आयु बहुत ही अल्प थी -केवल १५ दिन. कार्यसमिति की अगली बैठक में पंडितजी के हस्तक्षेप के बाद यह प्रस्ताव ख़ारिज हो गया।  उस समय तो संघ को लगा के एक मौका हाथ से निकल गया।तब से यह संघ को लगा के पटेल तो हमारे हैं और नेहरू पराये हैं. आगे आने वाले  वर्षों में नेहरू लगभग दुश्मन हो गये. पर यह सब ६० साल पुरानी बातें हैं.  देश में  संघ का  राज है और एक स्वयंसेवक प्रधान मंत्री है. क्या यह संभव होता यदि पटेल की बात रह जाती और संघ कांग्रेस का सेवा दल  बन गया होता?

खैर इस बात को जाने दीजिये और मोदीजी की इस बात पर गौर करें के सरदार पटेल के साथ बहुत अन्याय हुआ वर्ना वो जवाहरलाल नेहरु के बजाय   देश के पहले प्रधान मंत्री होते। तो प्रश्न यह खड़ा होता है के यह अन्याय क्सिने किया.  और इसका उत्तर भी सरदार पटेल ने अपने जीवन कल में ही दे दिया था. २ अक्टूबर १९५० को इंदौर में उन्होंने कहा:” मुझे यहाँ उप प्रधान मंत्री कह कर सम्बोधित किया गया  पर मैं स्वयं को कभी इस रूप में नहीं देखता. जवाहरलाल हमारे नेता हैं.  बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया है और इस बात की घोषणा भी की है.  इस के बाद हम सब बापू के सिपाहियों का फ़र्ज़ है की उनकी वसीयत को पूरा करें. ” अब इस के बाद कौन सा विवाद रह जाता है जिसके लिए मोदीजी नेहरू को दोषी मानते हैं. और सच तो यह है की इस मामले में  अगर कोई दोषी है तो वो महात्मा गांधी हैं क्योंकि उन्होंने ही जवाहरलाल को अपना उत्तराधिकारी और देश का पहला प्रधान मंत्री चुना था. पर मोदीजी इस का दोष कभी गांधीजी को नहीं देते  वो हमेशा नेहरू की ही आलोचना करते हैं. इसी लिए यह प्रश्न खड़ा होता है की क्या देश के वर्त्तमान प्रधान मंत्री को देश के पहले प्रधान मंत्री जिन्हे महात्मा गांधी ने चुना था इस प्रकार की आलोचना करनी चाहिए?

जहाँ तक इंदिरा गांधी का प्रश्न है तो यह बात स्पष्ट है कि देश के विकास में उनका जो योगदान है वो किसी सरकारी आयोजन का मोहताज नहीं है. जिन बातों के लिए उन्हें याद किया जायेगा उसकी फेहरिस्त बड़ी लम्बी है।  पर प्रश्न यह खड़ा होता है की जब वर्त्तमान सरकार एकता दौड़ का आयोजन करती है और इंदिरा गांधी के योगदान को नज़रअंदाज़ करती है तो प्रधान मंत्री क्या सन्देश देना चाहते हैं?

मोदीजी कांग्रेस के नेताओं की बात को तो भुला सकते हैं पर क्या वो अपने ह दल  के पूर्व  प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों को भी नज़रअंदाज़ करना चाहते हैं. ? जब पाकिस्तान का विभाजन हुआ और बांग्लादेश ने जन्म लिया तो अटलजी ने इंदिरा गांधी की तुलना ‘माँ दुर्गा से की थी और अपने ६ वर्षों  के कार्यकाल में उन्होंने कभी इस तरह की संकीर्णता का परिचय नहीं दिया. वो हमेशा यह कहा करते हैं की भारत के प्रधान मंत्री का दिल बड़ा होना चाहिए. यही बात मोदीजी के चहेते सरदार पटेल ने  भी अपने जीवन में लागु की थी .

यह बात सभी जानते हैं के  नेहरू जी और सरदार पटेल के बीच काफी गहरे मतभेद थे और यह उस समय के आपसी पत्र व्यवहार में स्पष्ट भी हो जाता है. ऐसा भी हुआ है के दोनों ने गुस्से में इस्तीफे की पेशकश की और मंत्री मंडल की बैठक से भी बाहर  निकल आये।  पर यह सब होने के बाद भी एक दूसरे के लिए सम्मान में कोई कमी नहीं आई और देश के लिए साथ साथ काम किया. यह सब तभी हो सकता है जब दिल बडा हो.

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