उ. प्र.: किसानों पर सूखा और सरकार का कोप

2:50 am or September 8, 2014
Farmer

सुनील अमर

उत्तर प्रदेश सूखे की चपेट में है। सदियों से बरसात का मुहावरा बन चुके दो महीने- सावन और भादों भी बिना बरसे निकल गए! अब अगर बरसात होती भी है तो उसका कोई बहुत सार्थक असर धान की फसल पर नहीं आएगा क्योंकि अधिकांश फसल प्रारम्भिक स्तर पर ही सूख चुकी है। आसमान की तरफ टकटकी लगाए किसानों की आंखे पथरा गई हैं लेकिन बरसात का कोई भी लक्षण नहीं। वैसे तो मौसम विभाग ने आगाह कर दिया था कि इस साल बरसात कम होगी लेकिन इतनी कम होगी, इसका अनुमान शायद मौसम विभाग को भी न रहा हो। उसने तो 90 प्रतिशत बरसात होने की भविष्यवाणी की थी। किसानों ने इस उम्मीद में धान की फसल लगा दी थी कि शत प्रतिशत बरसात अब होती ही कहां है। अब जैसा कि तमाम सरकारी विभाग आकलन कर रहे हैं उससे पता चल रहा है कि प्रदेश में अभी तक 33 प्रतिशत से लेकर 70 प्रतिशत तक ही बरसात हुई है और यह भी प्रदेश के हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं है। धान की फसल तैयार होने की निर्धारित अवधि में से मात्र एक महीना और बचा है फिर भी सरकार ने अभी तक प्रदेश को सूखाग्रस्त घोषित नहीं किया है। प्रदेश अभूतपूर्व बिजली संकट से जूझ रहा है तथा नहरों में भी पर्याप्त पानी नहीं आ रहा है। इससे किसानों के उपर दोहरा संकट है और वे प्रकृति तथा सरकार की संयुक्त उपेक्षा के शिकार हैं।

                उत्तर प्रदेश में ऐसा बिजली संकट शायद ही इससे पहले कभी देखा गया हो। बीते सप्ताह तो प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में 21 घंटे से भी अधिक की कटौती की गई! इसका नतीजा यह हुआ कि जगह-जगह जनता सड़कों पर उतर आई। मार-पीट और तोड़-फोड़ की भी घटनाऐं हो रही हैं। गर्मी का आलम यह है कि अगस्त के महीने में मई-जून जैसी लू चल रही है! इस बार सत्ता संभालने पर सूबे की समाजवादी सरकार ने किसानों को खुश करने के लिए नहर और सरकारी नलकूप से सिंचाई को पूरी तरह मुत घोषित कर दिया। किसान खुश हुआ कि चलो इस तरह खेती पर उसकी लागत जरा कम हो जाएगी लेकिन हुआ यह कि बिजली संकट के कारण सरकारी नलकूप किसी काम के नहीं और नहरों में पानी बराबर आ ही नहीं रहा है। मुत कर दिए जाने के कारण इन दोनों साधनों की पहले से ही बदतर अनुरक्षण व्यवस्था और भी खस्ताहाल होकर समाप्तप्राय हो गई है। नहर और सरकारी नलकूप दोनों की नालियां न के बराबर हैं, इसलिए इनका लाभ इसके इर्दगिर्द के थोडे़ से काश्तकारों को ही मिल पाता है। दशकों से यही हाल है और लगता है कि सरकार ने इस दिशा में सुधार के लिए सोचना ही छोड़ दिया है। इन दोनों साधनों के फेल होने का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि इनके इर्दगिर्द भी किसानों ने निजी नलकूप लगवा रखे हैं! हर साल गर्मियों की शुरुआत में सरकारी आदेश पर गाॅवों के तालाब नहर या नलकूप से भरे जाते हैं ताकि पशुओं-पक्षियों को पीने को पानी मिल सके लेकिन इस साल यह सब भी नहीं हो सका है। तालाब सूखे पड़े हैं। सिंचाई का साधन रखने वाले किसान भी बिजली की अनुपलब्धता और मॅहगे डीजल-मोबिल आयल से हतोत्साहित हैं। किसानों का कहना है कि बरसात न होने से मौसम इतना गर्म है कि खेतों में पानी लगाने के बाद दिन में वह पानी गर्म हो जाता है जिससे धान की फसल पीली पड़ रही है। प्राकृतिक बरसात न होने से पौधों में स्वाभाविक वृद्धि भी नहीं हो रही है।

जून में कमजोर मानसून की आवक और बरसात की बेहद खराब शुरुआत को देखते हुए प्रदेश को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग उठने लगी थी लेकिन अगस्त बीत जाने पर भी सरकार ऐसा कोई निर्णय नहीं कर सकी है। प्रदेश के कई विभागों के प्रमुख सचिव जिलों का कथित दौरा कर अभी हालचाल ले रहे हैं। समय से सूखा घोषित हो जाता तो एक तो किसानों को राजस्व वसूली से राहत मिल जाती, दूसरे वे अल्प सिंचाई वाली फसलों की बुवाई कर लेते। सूखा पड़ने की स्थिति में किसानों को कम पानी वाली फसल जैसे- मक्का, लाही या राई, उड़द अरहर और बाजरा आदि बोने को प्रेरित किया जाता है तथा सरकार लघु व सीमान्त किसानों को इन पर बीज व उर्वरक का अनुदान भी देती है। यह सारा काम अभी शुरु ही नहीं किया गया। ऐसे में जो साधन सम्पन्न किसान हैं वे तो अपनी व्यवस्था बना रहे हैं लेकिन छोटे और गरीब किसानों का हाल बुरा है। तकनीक और नई खोजों का एक दुष्परिणाम यह भी है कि हमारे किसान अब परम्परागत खेती और बीजों को भूलते जा रहे हैं। हाइब्रिड बीजों के आने के पहले तक रबी और खरीफ की फसलों के लिए बहुत से ऐसे बीज थे जिन्हें पानी की बहुत कम आवश्यकता होती थी और उन पर कीटों का प्रकोप भी न के ही बराबर था लेकिन अधिक उत्पादन के झांसे में आकर किसान अपने देसी बीजों को मिटा बैठे। धान की कई प्रजातिया तो ऐसी थीं कि वे कितनी भी कम बरसात में हो जाती थीं। बस वे जरा मोट धान की प्रजातिया थीं।

प्रदेश में सूखे की विषम परिस्थिति और भयावह बिजली संकट को देखते हुए भी केन्द्र सरकार ने महज 32 करोड़ रुपये की ही मदद दी है। इसमें से भी एक बड़ा हिस्सा सदा सूखाग्रस्त रहने वाले बुन्देलखन्ड के लिए है। इतनी कम धनराशि से किसानों की कोई भी सार्थक मदद नहीं की जा सकती। पूर्ववर्ती बसपा सरकार के समय में ऐसे किसानों की मदद एक हास्यास्पद उदाहरण बनकर रह गई थी जब तमाम किसानों को 50 रुपये से लेकर 80-90 रुपये तक के एकाउन्टपेयी चेक दिए गए थे! जिन किसानों के बैंक खाते नहीं थे उनके सामने समस्या यह थी कि वे बैंक खाता खोलने के लिए 1000 रुपया कहा से लाएं! ऐसे बहुत से किसान थे जिन्होंने आजिज आकर ऐसे चेकों को फाड़कर फेंक दिया था। किसानों के सामने चुनौतिया बहुआयामी हैं। उन्हें धान की फसल में लगाए गए पैसे को वापस करना है तो गेंहॅू की बुवाई के लिए भी व्यवस्था करनी है। इसके साथ सबसे बड़ा प्रश्न उनके सामने यह है कि वे अपने परिवार का भरण पोषण कैसे करें। इसलिए यह जरुरी है सरकार स्थिति का सही और सम्यक आकलन करके प्रभावित किसानों को राशन की सरकारी दुकानों से सस्ता खाद्यान्न दिलाए और क्षेत्रीय सहकारी समितियों की मार्फत उन्हें अन्य गृहोपयोगी वस्तुऐं सस्ती दर पर दिलाई जाय। इसके अलावा सरकार जिस तरह बाढ़ पीडि़त क्षेत्रों में अतिरिक्त तौर पर दवाओं का वितरण सुनिश्चित कराती है उसी तरह सूखा प्रभावित क्षेत्रों के मनुष्यों और मवेशियों के लिए भी दवाऐं उपलब्ध कराई जाय। ऐसे क्षेत्रों में एक विकट समस्या शिशुओं तथा गर्भवती और धात्री माताओं के पोषण और स्वास्थ्य रक्षण की होती है। इसे सम्बन्धित गाव के आगनबाड़ी केन्द्र की मार्फत साधा जा सकता है। प्रदेश की सरकार को अभी से ऐसे एहतियाती कदम उठा लेने चाहिए क्योंकि आने वाले एकाध महीने में ही सूखा अपना असर दिखाना शुरु कर देगा। एक फौरी जरुरत बेकार हो चुके इंडिया मार्क-2 हैन्ड पम्पों की दुबारा बोरिंग की है। तमाम नलकूप और हैन्डपम्प जलस्तर नीचे चले जाने के कारण पानी छोड़ चुके हैं और वहा पेयजल संकट भी मंडरा रहा है। इन संकटों के समाधान के लिए सरकार को अब अपनी तन्द्रा त्याग देनी चाहिए।

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