कौन बचा रहा है दोषी सुरक्षा-खुफिया अधिकारियों को

6:51 pm or November 17, 2014
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– राजीव यादव –

यूपी में आतंकवाद के आरोपी खालिद जिसकी 18 मई 2013 को हिरासत में हत्या कर दी गई थी की पुलिस विवेचना को बाराबंकी न्यायालय ने खारिज कर दिया। आतंकवाद के इस आरोपी की गिरफ्तारी की सत्यता की जांच के लिए गठित आरडी निमेष जांच आयोग ने भी गिरफ्तारी को संदिग्ध कहते हुए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है। ऐसे में इस हत्या पर विवेचनाधिकारी द्वारा लगाई गई फाइनल रिपोर्ट का खारिज होना बहुतेरे सवाल खड़ा करता है? क्योंकि खालिद की हत्या में यूपी के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह, तत्कालीन एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल समेत आईबी पर नामजद मुकदमा दर्ज है।

वैसे तो आतंकवाद के आरोपियों का विशेष पुलिस दस्तों द्वारा अगवा करने और भारी मात्रा में विस्फोटकों के साथ बरामदगी और फिर सालों बाद उनका बेगुनाह रिहा हो जाना अमूनन एक सामान्य सी प्रक्रिया हो गई है। जिसपर पुलिस किसी विरोध-प्रतिरोध के न होने को लेकर बहुत आश्वस्त होती है वहीं परिवार वाले भी इसे नियति मान लेते हैं। पर ऐसी किसी नियति को न मानने के भी बहुतेरे नाम हैं, जिस कड़ी में मोदी राज के गुजरात में आतंकवाद के नाम पर फर्जी मुठभेड़ में मारी गई इशरत जहां थीं उसी कड़ी में खालिद भी है। ऐसे में 2007 में उसके अपहरण, गिरफ्तारी, हत्या और उसके न होने पर भी उसे इंसाफ दिलाने की जो जद्दोजहद चल रही है, उसकी तफ्तीश से हम देश में आतंक की राजनीति को समझ सकते हैं। वह राजनीति जिसकी पटकथा खुफिया विभाग लिखता है और फिर जब जागरुक नागरिक समाज अपने खिलाफ हो रहे षडयंत्र के खिलाफ आवाज उठाता है तो राज्य और उसकी पूरी मशीनरी अपने ही नागरिक के खिलाफ खड़ी हो जाती है।

12 दिसंबर 2007 को आजमगढ़ से तारिक और 16 दिसंबर को मडि़याहूं,, जौनपुर जिले से खालिद को अगवा करने के बाद एसटीएफ द्वारा 22 दिसंबर को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तारी के दावे के बाद उठने वाले सवालों पर तत्कालीन यूपी सरकार ने मार्च 2008 में आरडी निमेष जांच आयोग गठित कर दिया था। जिसने अगस्त 2012 में अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सौंप दी। राजनीतिक व मानवाधिकार संगठनों ने रिपोर्ट को सार्वजनिक करते हुए, कार्रवाई की मांग की। यूपी सरकार द्वारा रिपोर्ट के न सार्वजनिक करने पर आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों के सवाल उठाने वाले संगठन रिहाई मंच ने निमेष कमीशन की रिपोर्ट को लीक कर मीडिया में जनहित में जारी कर दिया। इस रिपोर्ट ने यूपी एसटीएफ के उस दावे पर सवालिया निशान लगा दिया कि उसने यूपी के कचहरी धमाकों के आरोपियों को बाराबंकी में उस वक्त पकड़ा जब वह विस्फोटकों के साथ बाराबंकी रेलवे स्टेशन पहुंचे थे। ऐसे में यूपी एसटीएफ पर यह भी सवाल खड़े हो गए कि अगर गिरफ्तारी फर्जी थी तो उनके पास से जिन विस्फोटकों और असलहों के बरामद होने का दावा उसने किया, वह उसको कहां से मिले?

यूपी के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह, तत्कालीन एडीजी कानून व्यवस्था बृजलाल समेत उन लोगों ने जिन्होंने इस गिरफ्तारी पर बड़े-बड़े दावे किए थे, जब आरोपों के घेरे में आ गए उसी दरम्यान 18 मई 2013 को खालिद की बाराबंकी के करीब उस वक्त हत्या कर दी गई थी जब उसे पेशी के बाद फैजाबाद न्यायालय से लखनऊ जेल लाया जा रहा था। परिजनों का आरोप था कि चूंकि आरडी निमेष जांच आयोग ने उसकी गिरफ्तारी संदिग्ध करार दे दी थी, ऐसे में इस मामले में खालिद चश्मदीद गवाह था, इसलिए उसकी हत्या करवा दी गई। परिजनों के इस आरोप और हाल में उनके द्वारा इस हत्याकांड में आरोपियों को बचाने के खिलाफ किए गए वाद जिस पर उनके पक्ष को न्यायालय ने माना है को देखें तो पुलिस-प्रशासन की इस बचने-बचाने की राजनीति को साफ देखा जा सकता है। यही वह वजह थी कि यूपी सरकार ने वादे के बावजूद इस पूरे मामले की जांच सीबीआई से नहीं कराई। बहरहाल, विवेचना अधिकारी ने पूरे मामले में बिना आरोपियों से पूछताछ किए ही 12 जून 2014 को फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी। इतना ही नही नामजद एफआईआर होने के बावजूद विवेचनाधिकारी ने उन्हें अज्ञात लिखा। इससे यह समझा जा सकता है कि विवेचनाधिकारी पर बड़ा दबाव था या फिर वह अपने आरोपी पुलिस अधिकारियों के मातहत ही पूरी विवेचना कर रहा था। यह विवेचना की प्रक्रिया इस बात को भी साफ करती है कि विवेचनाधिकारी जो पुलिस कर्मचारी होता है उसमें एक प्रकार का दुष्साहस आ जाता है कि वह जो भी कर देगा वह सही होगा उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। इसके साथ ही कथित तौर पर गिरफ्तारी के समय, खालिद के अपहरण, अवैध हिरासत के आरोप की जांच नहीं की गई, जिससे बाद में उसकी हत्या का उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है। वहीं विसरा की जांच भी उचित तरीके से नहीं की गई क्योंकि प्रभावशाली आरोपियों विक्रम सिंह और बृजलाल के प्रभावक्षेत्र में ही विधि विज्ञान प्रयोगशाला भी आती है। विवेचनाधिकारी ने अपने उच्च अधिकारियों को बचाने के लिए साक्ष्य एकत्र करने के बजाए उन्हें नष्ट करने का कार्य किया और हत्या के उद्देश्य के संबन्ध में कोई जांच करने की कोशिश ही नहीं की।

इस पूरे प्रकरण को देखा जाए तो राज्य मशीनरी का हर तंत्र एक दूसरे से जुड़ा और दोषी है। जिसके चलते उसे खुद को बचाने के लिए दूसरे को बचाना महत्वपूर्ण हो जाता है। यह वह आतंक की राजनीति है जो हमारे लोकतांत्रिक ढांचे का अंग बन चुकी है। यह महज संयोग नहीं है कि मोदी सरकार की टीम के आईबी अधिकारी अजित डोभाल इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ में जब आईबी अधिकारी राजेन्द्र कुमार के खिलाफ चार्जशीट दायर करने बात आती है तो न सिर्फ उनके पक्ष में खड़े होते हैं बल्कि इशरत को आरोपित भी करने का हर संभव प्रयास करते हैं। इसी तरह प्रकाश सिंह जैसे पुलिस अधिकारी भी भाजपा के नेताओं में सुर-सुर मिलाते हुए कहते हैं कि यहां की सरकार आतंकियों के विरुद्ध मुकदमें वापस लेना चाहती है। जबकि, यूपी सरकार ने आतंक के उन आरोपियों को छोड़ने की बात कही है जो बेगुनाह हैं। आखिर इस देश ही नहीं दुनिया का कौन सा कानून है जो बेगुनाह को सजा देने के पक्ष में है? दूसरा कि यूपी सरकार ने किसी भी आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह को अब तक नहीं छोड़ा है बल्कि आरडी निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट जो आतंकवाद के नाम पर पकड़े गए बेगुनाह तारिक-खालिद की बेगुनाही का सबूत है उसके आधार पर न बेगुनाहों को छोड़ा और न ही उस रिपोर्ट पर ऐक्शन टेकन रिपोर्ट लाते हुए दोषी पुलिस व आईबी अधिकारियों के खिलाफ ही कार्रवाई की है।

दरअसल, देश में सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों की एक बड़ी जमात पिछले दशक में टीवी स्क्रीनों के सहारे कभी ‘आतंरिक’ तो कभी ‘वाह्य’ सुरक्षा विशेषज्ञों के रुप में हमारे सामने आई। यह उसी 9/11 की आतंक की राजनीति की आयातित खेप है जिसका अमेरिका प्रायोजित आतंकवाद के तर्कों को देश की जमीन पर रोपना एजेण्डा है। अगर ऐसा नहीं होता तो जो सुरक्षा विशेषज्ञों की खेप उग आई है उसे जरुर निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट पर बोलना चाहिए था, जो उसने नहीं किया। क्योंकि यह वह रिपोर्ट है जो साफ करती है कि हमारी खुफिया और सुरक्षा एजेंसियां एक नीति के तहत मुस्लिम युवकों को अगवा कर हफ्तों और महीनों गायब रखती हैं और जरुरत पड़ने पर फर्जी बरामदगी का दावा करते हुए आतंक के झूठे आरोपों के चक्रव्यूह में उन्हें फंसा देती हैं।

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