केंद्रीय मंत्रियों पर मोदी के जासूसों की पैनी नजर

7:22 pm or November 17, 2014
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– एल.एस.हरदेनिया –

पिछले दिनों कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनके कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नेतृत्व की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह लग सकता है। प्रधानमंत्री ने पिछले रविवार को मंत्रिपरिषद में 21 नये चेहरों को शामिल किया है। इन मंत्रियों में से बहुसंख्यक बिहार और उत्तरप्रदेश के हैं। स्पष्ट है कि इन दोनों राज्यों में होने वाले चुनाव को मद्देनजर मंत्रियों को चुना गया है। शामिल किए हुए मंत्रियों में कुछ ऐसे भी हैं जो न तो लोकसभा और ना ही राज्यसभा के सदस्य हैं। जानकार सूत्रों का कहना है कि इस तरह के लोगों को मंत्रिपरिषद में शामिल करना जो संसद के सदस्य नहीं हैं एक तरह से उन लोगों का अपमान है जो काफी परिश्रम और पैसा खर्च करके चुनाव जीतते हैं। इस समय केंद्र में भाजपा का स्पष्ट बहुमत है। उसके सदस्यों की संख्या 282 है। क्या इतने सदस्यों में से प्रधानमंत्री को योग्य उम्मीदवार नहीं मिले और जिसके कारण उन्हें गैर-संसद सदस्यों को शामिल करना पड़ा?

जिन नेताओं को शामिल किया गया है उनमें गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पारिकर भी शामिल हैं। पारिकर को रक्षा मंत्री बनाया गया है। क्या 282 लोकसभा सदस्यों में एक भी ऐसा सांसद नहीं था जिसे रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी जा सके? एक और गैर-सांसद हैं सुरेश प्रभु, जिन्हें मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया है। सुरेश प्रभु, शिवसेना के नेता हैं। एक तरफ शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के बीच में गंभीर विवाद और अविश्वास की स्थिति बनी हुई है। उसके बावजूद शिवसेना के प्रतिनिधि को मंत्रिपरिषद में शामिल करना और वह भी ऐसे व्यक्ति को जो सांसद नहीं है कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों को जन्म देता है।

लोकसभा के चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने बार-बार कहा था कि वे संसद में एक भी ऐसे सदस्य को नहीं रहने देंगे जिसकी आपराधिक पृष्ठभूमि होगी। परंतु मंत्रिपरिषद के विस्तार के समय प्रधानमंत्री ने अपने इस वायदे के ठीक विपरीत काम किया है। मंत्रिपरिषद के विस्तार के बाद कांग्रेस और आप पार्टी ने तीखी आलोचना करते हुए बयान जारी किया। इन दोनों पार्टियों का कहना है कि मंत्रिपरिषद में शामिल कुछ सांसद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हैं। इस संदर्भ में रामशंकर कठेरिया, गिरिराज सिंह आदि का नाम लिया है और कहा है कि इनका कैरियर अपराधों से भरा हुआ है। आगरा सुरक्षित सीट से चुने गये कठेरिया पर हत्या की कोशिश और धोकाधड़ी समेत 23 आपराधिक मामले दर्ज हैं। बिहार के गिरिराज सिंह ने न सिर्फ अनेक भड़काऊ बयान दिए थे वरन् उनके निवास से भारीभरकम रकम बरामद हुई थी जिसके बारे में वे स्पष्टीकरण नहीं दे पाए थे। आज तक यह मामला उनके खिलाफ चल रहा है।

मोदी के नेतृत्व की क्षमता पर दूसरा प्रश्न शिवसेना के साथ उनका रवैया है। जबसे मोदी ने नेतृत्व संभाला है तब से शिवसेना और अकालीदल के साथ भाजपा के संबंधों में कड़वाहट आ गई है। शिवसेना ने महाराष्ट्र में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ा। इस तरह वर्षों पुराने भाजपा और शिवसेना के राजनैतिक संबंध टूट गए। न सिर्फ राजनैतिक संबंध टूटे बल्कि दोनों के बीच में जबरदस्त कड़वाहट पैदा हो गई। इसी तरह हरियाणा के चुनाव में अकालीदल और भाजपा ने एक दूसरे का विरोध किया। अभी फिलहाल पंजाब में भारतीय जनता पार्टी और अकालीदल सत्ता में साथ हैं। परंतु किसी भी दिन दोनों का विच्छेद हो सकता है। जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तो उन्हें 24 राजनैतिक दलों का समर्थन प्राप्त था। वे जब तक प्रधानमंत्री रहे सभी दलों को अपने साथ लेकर चले और अंत तक भारतीय जनता पार्टी और अन्य दलों के बीच में कोई प्रमुख मतभेद नहीं हुआ। यह स्पष्ट है कि मोदी में सबको साथ लेने की क्षमता का अभाव है।

एक और मामला है जिसमें प्रधानमंत्री की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। उन्होंने कुछ मंत्रियों के विभाग बदल दिए। जिनमें विशेष रूप से डाॅ. हर्षवर्धन शामिल हैं। डाॅ. हर्षवर्धन को स्वास्थ्य विभाग दिया गया है। परंतु 5 महीनों के अंतराल में ही उनसे स्वास्थ्य मंत्रालय ले लिया गया। इसी तरह रेल मंत्री के विभाग में भी परिवर्तन हुआ। इतने शीघ्र विभागों में परिवर्तन भी प्रधानमंत्री द्वारा मंत्रियों की क्षमता का मूल्यांकन करने की शक्ति पर संदेह हो सकता है।

इससे भी ज्यादा खतरनाक मुद्दा जो उभरकर आया है वह है प्रधानमंत्री का अपने मंत्रियों के साथ संबंध। एक ऐसा अखबार जो भाजपा के नजदीक माना जाता है ने एक सनसनीखेज समाचार छापा है। इस समाचारपत्र (दैनिक जागरण) ने प्रथम पृष्ठ पर ‘‘मंत्रियों की जासूसी: प्रधान, जेटली पर पैनी नजर’’, ‘‘सभी मंत्रियों की निगहबानी, लेकिन घपले घोटालों की संभावनाओं वाले विभागों के मंत्रियों पर मोदी की खास निगाह’’, ‘‘सबसे भरोसेमंद जेटली पर पैनी निगाह’’, इन शीर्षकों से छपे समाचार में कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी कैबिनेट के 44 मंत्रियों के कामकाज पर पैनी नजर रख रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक इस काम के लिए उन्होंने अपने सबसे भरोसेमंद और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को जिम्मेदारी सौंपी है। हालत यह है कि कंेद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के कार्यालय के बाहर दो गार्ड इस काम के लिए लगाए गए हैं।

पीयूष गोयल के कामकाज पर भी नजर रखी जा रही है। यही नहीं, अरूण जेटली पर भी नजर रख रहे हैं। इस बीच, केंद्रीय मंत्री भी चैकस हो गए हैं। बताया जा रहा है कि मंत्री अपनी कार में बैठने से पहले उसकी जांच करवा लेते हैं कि ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कार में बातचीत टेप करने के उपकरण तो नहीं लगे हैं। इस काम में कई मंत्री निजी प्रोफेशनल्स की भी मदद ले रहे हैं। मीडिया में आई खबर के मुताबिक मोदी ने अपने मंत्रियों को भी कह रखा है कि वह किसी भी तथ्यात्मक और तकनीकी मार्गदर्शन के लिए सीधे डोभाल से संपर्क करें। दरअसल, इसके पीछे मंत्रालय के हर कामकाज और फैसले पर नजर रखने का मकसद है और इस तरह वह मंत्रियों के कामकाज को डोभाल की मदद से सीधे मानिटर कर रहे हैं।

महत्वपूर्ण मंत्रालयों में किसी तरह की चूक या घोटाले ने हो, इसके लिए उन्होंने अपने खास और विश्वस्त नौकरशाहों को भी नियुक्त किया है। प्रधानमंत्री ने महत्वपूर्ण मंत्रालयों में अपने भरोसेमंद नौकरशाहों (इसमें ज्यादातर गुजरात से) के जरिए ही सीधी पहुंच बनाई है। पिछले दिनों नौकरशाहों की एक बैठक लेकर मोदी ने उनसे कहा भी था कि वे उनसे सीधे संपर्क कर सकते हैं। अगर उनके वरिष्ठ अधिकारी या मंत्री उन पर कुछ भी ऐसा करने के लिए दबाव डालते हैं जो गैरकानूनी है तो वे किसी भी हालत में उनके आदेशों का पालन न करें।

जूनियर मंत्रियों के साथ-साथ प्रधानमंत्री ने अपने सबसे विश्वस्त और करीबी मंत्री अरूण जेटली को भी नहीं बख्शा है। जेटली वित्त, रक्षा और कंपनी मामलों जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल रहे हैं। इसे देखते हुए हाल में मोदी ने यहां भी गुजरात कैडर के अफसर हंसमुख अधिया को वित्त मंत्रालय में नियुक्त किया है। 1981 बैच के आईएएस अफसर अधिया को वित्त मंत्रालय में वित्त सेवा विभाग में सचिव बनाया है। अधिया के बारे में कहा जाता है कि वे जेटली के मंत्रालय में मोदी की आंख और कान हैं।

प्रधान के अलावा मोदी मंत्रिमंडल में अहम मंत्रालय संभाल रहे पीयूष गोयल पर भी मोदी की खास नजर है। गोयल के पास कोयला, ऊर्जा जैसे अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी है। ऊर्जा मंत्रालय में भी घोटाले होने की संभावना ज्यादा है। इसके लिए मोदी ने अपने भरोसेमंद गुजरात कैडर के सीनियर नौकरशाह को ऊर्जा मंत्रालय में नियुक्त किया है, जिससे वह हर फैसले पर पैनी नजर रख सकें। सूत्रों के मुताबिक, इन नौकरशाहों की मदद से मोदी मंत्रालय की हर महत्वपूर्ण फाइल के मूवमेंट पर नजर रखते हैं।

सूत्रों के मुताबिक, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के दतर के ठीक बाहर दो सिक्योरिटी गार्ड खासतौर से तैनात किए गए हैं। ये दोनों मंत्री से मिलने आने वालों पर पैनी नजर रखते हैं। दरअसल, प्रधान का मंत्रालय खासा महत्वपूर्ण है और यहां घपले-घोटाले होने की गुंजाइश भी ज्यादा है, क्योंकि मंत्री के महत एक हस्ताक्षर से सरकार का पैसा सैंकड़ों से हजार और हजार से करोड़ों में तब्दील हो जाता है। संयोग से प्रधान कुछ उन मंत्रियों में शुमार हैं, जिन्होंने सरकार के 100 दिन पूरे होने पर प्रेस कान्फ्रेंस नहीं ली थी। कारण साफ है-उन्हें मोदी की अनुमति नहीं मिली। बताया जा रहा है कि प्रधान अपने 100 दिन के कामकाज में अर्जित उपलब्धियों की लिस्ट के साथ पूरी तरह तैयार थे और विस्तृत प्रेस रिलीज भी तैयार थी, लेकिन मोदी ने उन्हें अनुमति नहीं दी। इस तरह मोदी ने पूरी मंत्रिपरिषद पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण हासिल कर लिया है। मोदी के इस रवैये की क्या प्रतिक्रिया होती है, भविष्य ही बताएगा।

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