गांधी की हत्या के बाद सत्ता पलटने का षड़यंत्र भी था – नेहरू

6:24 pm or November 24, 2014
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– एल.एस.हरदेनिया –

महात्मा गांधी की हत्या के बाद दिनांक 5 फरवरी 1948 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर सूचित किया था कि देश में विद्रोह कर सत्ता पलटने का षड़यंत्र किया गया था। इस षड़यंत्र के अनुसार देश के अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों की हत्या की जानी थी और देश में लगभग अराजकता का वातावरण पैदा करना था। यह षड़यंत्र बहुत व्यापक था और अनेक राज्यों में एक साथ किया गया था। यहां उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नेहरू, मुख्यमंत्रियों को लगभग प्रत्येक माह में एक पत्र लिखा करते थे। उस पत्र के माध्यम से वे पिछले माह में हुई घटनाओं का लेखाजोखा पेश करते थे और साथ ही अगले दिनों के लिए कुछ विशेष कार्यक्रम सुझाते थे।

दिनांक 5 फरवरी 1948 के पत्र में वे कहते हैं कि जब पिछले माह मैंने जो पत्र लिखा था उस समय गांधी जी हमारे बीच थे। उस समय वे एक अनशन पर बैठे हुए थे परंतु उसके बाद जो हुआ उसे आप जानते हैं। वह घटनाक्रम इतना अभूतपूर्व और इतना यकायक हुआ कि जिससे ऐसा लगा जैसा कि हमें सांप सूंघ गया हो। कुछ समय तक तो हमें यह महसूस हुआ कि जैसे हमें लकवा मार गया हो। परंतु थोड़े समय के बाद हम संभल गए और हमने समस्या की गहराई को अनुभव करते हुए उससे निपटने का फैसला कर लिया। आपको ज्ञात है कि हमने क्या फैसला किया है। भारत सरकार ने एक प्रस्ताव पारित किया है और इस प्रस्ताव के अनुसार हमने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस समय घटनाक्रम की पृष्ठभूमि और उसमें शामिल लोगों की जांच जारी है। फिलहाल हम यह महसूस कर रहे हैं और ऐसा महसूस करने के प्रमाण भी हैं कि गांधी जी की हत्या किसी एक व्यक्ति द्वारा किया गया अपराध नहीं था। वह किसी एक छोटे समूह द्वारा भी किया गया अपराध नहीं था। इस घटना के पीछे एक राष्ट्रव्यापी संगठन है जिसने पिछले कई दिनों से दूषित प्रचार कर देश में एक घृणा का वातावरण पैदा किया। इस प्रचार के चलते हिंसक गतिविधियां करने की तैयारी भी थी। पिछले अनेक वर्षों के बाद हमारे देश में राजनीतिक हत्या हुई है और वह भी अत्यधिक ऊँचे स्तर पर।

इस समय जो सबसे चिंता की बात है वह यह है कि देश में कुछ लोग ऐसे हैं जो हत्या के समान अपराधों का सहारा लेकर अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करना चाहते हैं। इस तरह की प्रवृत्ति बहुत ही खतरनाक है। शायद हमने इस तरह के तत्वों के विरूद्ध जितनी सावधानी बरतना थीं नहीं बरतीं। हमारी यही उपेक्षा के कारण हमें यह दिन देखना पड़ा। अब समय आ गया है कि हमें इस समस्या की तह में जाना चाहिए और फिर उसका मुकाबला करना चाहिए। जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है कि देश में सत्ता पलटने की तैयारी थी। इस समय मैं इस घटनाक्रम के बारे में इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहूंगा क्योंकि जांच जारी है।

मैं नागरिक स्वतंत्रता और प्रजातांत्रिक प्रक्रियाओं में पूरी आस्था रखता हूं। परंतु ऐसी स्थिति में प्रजातंत्र की बात करना बेईमानी है जब हमारे देश में ऐसे लोग हैं जो आतंकवादी गतिविधियों का सहारा लेते हैं। मेरी मान्यता है कि इस तरह के लोगों को नागरिक स्वतंत्रता कैसे दी जा सकती है जो हत्या और हिंसा के सहारे सत्ता हथियाना चाहते हैं। इसलिए हमें बड़े दुःख के साथ इस तरह के लोगों की नागरिक आजादी पर प्रतिबंध लगाना पड़ा जो हिंसा की राजनीति में विश्वास रखते हैं। यदि हम इस तरह के ध्वंसात्मक तत्वों पर नियंत्रण नहीं करंेगे तो अन्ततः इससे आम नागरिकों के अधिकारों पर भी असर पड़ेगा।

इसलिए मेरा आपसे अनुरोध है कि इस तरह के खतरनाक तत्वों के ऊपर न सिर्फ नियंत्रण रखें बल्कि उन्हें जड़ से उखाड़ फेंके। यहां स्मरण रखना चाहिए कि जो हमारे विरोधी हैं वे अत्यधिक दुष्ट मिजाज के हैं। वे कहते एक बात हैं और करते कुछ और ही हैं। मुझे कुछ ऐसे लोगों से भी शोक संदेश प्राप्त हुए हैं जो इस षड़यंत्र के हिस्से थे। इसलिए मैं किसी भी व्यक्ति पर उसके द्वारा कहे गए हर शब्द पर विश्वास नहीं करूंगा।

यहां मैं यह भी बताना चाहूंगा कि इस तरह के खतरनाक तत्वों ने सरकार और सरकार के विभिन्न अंगों में घुसपैठ कर ली है। यह भी इस स्थिति का सबसे भयानक और चिंताजनक पहलू है। हमें इस तरह के खतरनाक तत्वों को सरकार से बाहर करना है ताकि प्रशासन और विभिन्न सेवाएं इनके खतरनाक प्रभाव से दूर रह सकें।

नेहरू के इस पत्र से स्पष्ट है कि हिंदुवादी संगठन इस देश की प्रजातांत्रिक सरकार पर कब्जा करना चाहते थे। इसमें संदेह नहीं कि उन दिनों देश में लगभग अराजकता की स्थितियां थीं। देश के विभाजन के बाद अनेक स्थानों पर भीषण हिंसक घटनाएं हुईं हैं। इस तरह की घटनाओं पर नियंत्रण पाने में काफी कठिनाई हो रही थी। ऐसी ही विषम परिस्थितियों का लाभ लेकर ये तत्व देश को छिन्न-भिन्न करना चाहते थे। यदि हमारे यहां सजगता नहीं दिखाई गई होती और सरकार पटेल के समान दृढ़ इच्छा शक्ति वाले गृहमंत्री नहीं होते तो शायद हमारा भी वही हाल होता तो पाकिस्तान का हुआ है। यहां पर यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना की मृत्यु के बाद पाकिस्तान में भी विषम परिस्थितियां पैदा हो गई थीं। लियाकत अली खान ने जिन्ना के उत्तराधिकारी के रूप में पाकिस्तान का शासन संभाला था। परंतु कुछ दिनों बाद उनकी हत्या कर दी गई थी, जिससे पाकिस्तान में ऐसी परिस्थितियां निर्मित हुईं कि वहां की सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर तानाशाह बैठ गए और इन तानाशाहों ने पाकिस्तान की जो हालत कर दी वह हमसे छिपी नहीं है। इसी तरह के एक तानाशाह के शासन के दौरान पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए। पाकिस्तान के विपरीत हमारे देश में अनेक योग्य शासक थे जिनकी प्रशासन पर पूरी पकड़ थी। इसके अतिरिक्त हमारी प्रशासनिक मिशनरी में भी ऐसे अनुभवी और योग्य प्रशासक थे जिनके चलते देश की विषम परिस्थितियों के बावजूद हिंसक और अराजक तत्वों को अपने मनसूबे पूरे करने का अवसर नहीं मिला।

सरदार पटेल की इस निर्णायक भूमिका को स्वयं जवाहरलाल नेहरू ने उनकी (सरदार पटेल) मृत्यु के बाद याद किया था। पटेल की मृत्यु 15 दिसंबर 1950 को हुई। उसके ठीक तीन दिन बाद प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों को एक पत्र भेजा था। इस पत्र में वे कहते हैं कि तीन दिन पहले हमें एक वृजपाद का सामना करना पड़ा। 15 दिसंबर 1950 को पटेल हमारे बीच नहीं रहे। हम इस झटके से अभी तक नहीं उभर पाए हैं और शायद अनेक कई वर्षों तक इससे उभर पाना मुश्किल होगा। कम से कम ऐसा उन लोगों के लिए तो संभव नहीं है जिन्होंने सरदार पटेल के साथ काम किया है। वे एक ऐसे महान योद्धा थे जिनने आजादी के आंदोलन में भाग लिया। एक के बाद एक ऐसे योद्धा हमारे बीच से चले जा रहे हैं। इस तरह के योद्धाओं के जाने के बाद हमारी जिम्मेदारियां और बड़ जाती हैं। सरदार पटेल एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे पूरी मुश्तैदी से काम करते थे और जिन गतिविधियों में उनका हाथ होता था वहां वे अपनी अटूट छाप छोड़ते थे। और यह छाप एक ऐसे व्यक्ति की होती थी जो अत्यधिक शक्तिशाली व्यक्तित्व के धनी थे। उनका मार्गदर्शन हमें सदैव प्राप्त होता रहा था, अब वह नहीं होगा। हमें और आपको बिना उनके मार्गदर्शन के ही काम करना पड़ेगा। सरदार पटेल की मृत्यु हमारे लिए गंभीर आघात है। उनकी मृत्यु से हमारे राष्ट्र को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। परंतु इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है कि हम सरदार पटेल के बिना ही देश की नाव को अनेक झंझावतों के बीच आगे बढ़ाते रहें।

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