मोदी के इंडिया में पूंजीपति मालामाल, जनता बेहाल क्यों खामोश हैं प्रतिरोध की ताकतें ?

7:05 pm or November 24, 2014
Modi at inauguration of HN Reliance Foundation Hospital

– सुभाष गाताड़े –

कई बार एक अदद तस्वीर जबरदस्त हंगामे का सबब बन जाती है और विश्लेषकों की पूरी जमात उसकी व्याख्या करने में जुट जाती है। पिछले दिनों जी 20 की बैठक में वैसा ही नज़ारा नमूदार हुआ जब रूस के राष्ट्रपति पुतिन के चीन के राष्ट्रपति की पत्नी को शाल ओढा दी। हाल यह हुआ कि चीन के अन्दर इस तस्वीर पर बैन लग गया और इसी बहाने असहज करनेवाले ऐसी कई तस्वीरें फिर एक बार चर्चा में आयी।

पिछले दिनों एक अन्य तस्वीर भारत के कई अख़बारों में प्रकाशित हुई। यह अलग बात है कि न उसे लेकर कोई हंगामा खड़ा हुआ और न कोई शोरगुल। चन्द कलमघिस्सुओं के आगे वह बढ़ नहीं सकी। अम्बानी समूह के एक अस्पताल के उद्घाटन के अवसर पर प्रकाशित इस तस्वीर में मोदी की पीठ पर मुकेश अम्बानी का हाथ नज़र आ रहा था। यूं तो इस तस्वीर को निर्विकार भाव से भी देखा जा सकता था, मगर इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि मुकेश अम्बानी उन शख्सियतों में अग्रणी रहे हैं जिन्होंने 2009 के ‘वायब्रन्ट गुजरात’ सम्मेलन में जनाब मोदी को प्रधानमंत्राी बनने लायक घोषित किया था और उनकी पार्टी की तरफ से पी एम प्रत्याशी घोषित किए जाने के बाद अम्बानी समूह से जुड़े मीडिया संस्थानों  ने इस मुहिम में अपना स्वर भी जोड़ा था, कुछ लोगों के कान खड़े होना स्वाभाविक था।

बहरहाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक प्रचारक से राजनीति की पारी शुरू करनेवाले मोदी के प्रधानमंत्राी पद पहुंचने की यात्रा का विश्लेषण, उसके लिए कारक तत्व इन पर अभी चर्चा जारी रहेगी, मगर एक बात तो स्पष्ट है कि उनके सत्तारोहण के बाद प्रस्तुत हुकूमत की नीतियां कार्पोरेट क्षेत्रा की जबरदस्त हिमायत के तौर पर उजागर होती जा रही हैं। यह अकारण नहीं कि ‘सरकार का काम बिजनेस करना नहीं है’ जैसी बातों से उद्योगपतियों को खुश करनेवाले जनाब मोदी -जिन्होंने 12 साल तक गुजरात की हुकूमत एक बिजनेस सीईओ की तरह सम्भाली बतायी जाती है, उनके आने से कार्पोरेट सम्राट भी प्रसन्न हैं। कभी उनके आलोचक रहे पूंजीपति भी अब अचानक ‘इंडिया राइजिंग’ की बात करने लगे हैं।

फिलवक्त सूर्खियों में है मोदी की आस्टेªलिया की यात्रा के दौरान वहां क्वीन्सलैण्ड में कारमाइकेल कोयला खदान विकसित करने के लिए  अदानी समूह को स्टेट बैंक आफ इंडिया द्वारा दिया गया एक बिलियन डाॅलर का एडवांस है। निःष्पक्ष विश्लेषकों ने इतने बड़े एडवांस पर सवाल उठाया है क्योंकि यही वह समय है जब तमाम सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्रा के बैंक नान परफार्मिंग एसेटस के बढ़ते अनुपात से परेशान बताये जाते हैं, जिनका बहुतांश ऐसी ही कार्पोरेट समूहों द्वारा लिए गए तथा न लौटाए गए कर्जे से सम्बधित है।

गौरतलब है कि दुनिया भर में कोयले की कीमतों में तेजी से गिरावट देखी गयी हैं। अगर 2010 में एक टन कोयला 145 डाॅलर में मिल रहा था तो आज उसकी कीमत 72 डॉलर तक पहुंची है। इतनाही नहीं दुनिया के बड़े बड़े बैंकों ने – सिटीग्रुप, मार्गन स्टेनले, जेपी मार्गन चेज, गोल्डमान सैक्स, डॉयश बैंक – आदि ने पर्यावरणीय सरोकारों के चलते इस परियोजना से दूरी पहले से बना रखी है। टाईम्स आफ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक विषय के जानकारों के मुताबिक ‘‘यह परियोजना व्यावसायिक तौर पर व्यावहारिक नहीं है। दुनिया के सबसे बड़े आठ वित्तीय प्रदाताओं ने इसी वजह से इसमें अपनी पूंजी का निवेश करना मुनासिब नहीं समझा है।’ (टाईम्स आफ इंडिया, 18 नवम्बर 2014)

कहने का तात्पर्य यही है कि मोदी की करीबी के चलते ही अदानी समूह को 1 बिलियन डॉलर अर्थात 6,100 करोड़ रूपयों का कर्जा मिल सका है। इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता है कि मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में ही प्रस्तुत अदानी समूह – जो इन्फ्रास्ट्रक्चर और टेªडिंग में सक्रिय रहा है – ने जबरदस्त तरक्की की है।

पिछले दिनों ‘काफिला डाट आर्ग’ पर लिखे अपने आलेख ‘‘मेक इन इंडिया – मोदीज वार आन पूअर’ में राजनीतिविज्ञानी आदित्य निगम ने प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के इस छह माहा कालखण्ड पर नज़र डाली थी और पर्यावरण से लेकर भूमि अधिग्रहण, मनरेगा से लेकर श्रमिक कानूनों को ढीला करने के सिलसिले पर गौर किया था। उनके मुताबिक सत्ता में आने के 50 दिनों के अन्दर ही – जबकि नीतियों में औपचारिक बदलावों की घोषणा तक नहीं हुई थी – सरकार ने पांच इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को पर्यावरण सम्बन्धी मंजूरी दे दी, जो लम्बे समय से लटकी हुई थी क्योंकि यही देखने में आ रहा था कि उनके संचालन से पर्यावरण को जबरदस्त नुकसान पहुंच सकता है। बिजनेस स्टैण्डर्ड में प्रकाशित रिपोर्ट के हिसाब से इनमें शामिल थे अदानी पोर्टस का गुजरात में मुन्द्रा स्पेशल इकोनोमिक जोन, दो कोयला खदान परियोजनाएं जिसमें कोल इंडिया लिमिटेड की असम की टिकाक ब्लाॅक परियोजना तथा रिलायन्स पावर का मध्यप्रदेश स्थित छत्रसाल ब्लाॅक परियोजना आदि। ’ ध्यान देनेलायक बात है बीती जनवरी में गुजरात की उच्च अदालत ने अदानी पोर्टस एण्ड स्पेशल इकोनोमिक जोन की 21 में 12 आपरेशनल यूनिटस को बन्द करने का आदेश दिया था क्योंकि उन्हें पर्यावरणसम्बन्धी क्लीयरेन्स नहीं मिला था। यूपीए हुकूमत के दौरान ही कन्ट्रोलर एण्ड आडिटर जनरल ने कोयला ब्लाॅक आवंटन में रिलायन्स पावर को बेजा फायदा पहुंचाने के लिए सरकार की खिंचाई की थी।

ऐसी परियोजनाओं के अपने यहां स्थापित करने के खिलाफ आदिवासी इलाकों में गांव सभाओं के अपने अधिकार को भी उनसे छीनने, कोयला खदान परियोजनाओं को शुरू करने के पहले जनसुनवाइयों का आयोजन कर लोगों की राय लेने के सिलसिले को समाप्त करने, जबरदस्त प्रदूषित क्षेत्रों में नये उद्योगों की स्थापना पर लगे प्रतिबन्ध को खतम करने आदि को लेकर भी तेजी से कदम बढ़ाए गए थे।

भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चले जनआन्दोलनों के दबाव में यू पी ए सरकार ने वर्ष 2013 में एक नया कानून बनाया था ‘राइट टू फेयर काम्पेनसेशन एण्ड ट्रान्सपरन्सी इन लैण्ड एक्विजिशन’ जिसके तहत जमीन अधिग्रहण के लिए इलाके की अस्सी फीसदी आबादी की सहमति अनिवार्य बना दी गयी थी। इस कानून के बनने के बाद से ही कार्पोरेट क्षेत्र ने हंगामा मचाना शुरू किया था। उनका कहना था कि इससे नए उद्योगों का खुलना नामुमकिन हो जाएगा। दरअसल प्रस्तुत कानून और पर्यावरण सुरक्षा को लेकर पिछली सरकार द्वारा अपनायी गयी सख्ती, यही दो कारक थे जिनके चलते पूंजीशाहों ने विगत सरकार के कथित ‘पालिसी पैरेलिसिस’ को लेकर हंगामा खड़ा किया था।

15 अगस्त की लाल किले की प्राचीर से अपने सम्बोधन में मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दिया था, जिसका मकसद़ था भारत को दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग केन्द्र बना देना। एक तरह से यह विश्व पूंजी के लिए आवाहन था कि वह यहां सस्ते श्रम और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने के लिए आए। इसमें उन्हें यह प्रलोभन भी था क्योंकि बढ़ती श्रम की कीमतों और पर्यावरण की हानि के चलते उन्हें अपने अपने गृहमुल्कों में उत्पादन करना मुश्किल साबित हो रहा है।

मोदी सरकार द्वारा श्रम कानूनों में सुधारों की रूपरेखा भी प्रस्तुत की गयी है, जिसका एक तरह का नमूना भी हमें राजस्थान सरकार द्वारा आननफानन में लागू किए श्रम कानूनों के सुधारों में दिखता है। बिजनेस स्टेण्डर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक ‘ औद्योगिक विवाद अधिनियम में जिन संशोधनों को प्रस्तावित किया जा रहा है उसके अन्तर्गत मालिक अब 300 कर्मचारियों तक को सरकार की बिना अनुमति के छांट सकते हैं, अभी तक यह सीमा 100 कर्मचारियों तक सीमित है। अगर किसी श्रमिक को इस छंटनी पर एतराज है तो उसे तीन माह के अन्दर इसे चुनौती देनी होगी, पहले ऐसी कोई सीमा नहीं थी। टेªड यूनियन बनाने के लिए भी कामगारों की तीस प्रतिशत संख्या की सहमति अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव है, फिलवक्त यह सीमा 15 प्रतिशत तक है।’

गौरतलब है कि पूंजी के मालिकानों के पक्ष में मोदी सरकार के कदम महज पर्यावरण कानूनों को ढीला करना, भूमि अधिग्रहण कानूनों में नरमी, श्रमिक कानूनों में बिजनेस के हक में सुधारों या कार्पोरेट क्षेत्रा को सस्ता कर्जा उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं हैं, वह बड़ी दवा कम्पनियों के सामने दंडवत के रूप में भी सामने आए हैं। अपनी अमेरिका यात्रा के कुछ वक्त़ पहले सरकार ने एक परिपत्र/सक्र्युलर जारी कर नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग आथारिटी – जो दवाइयों की कीमतें निर्धारित करती है – को यह निर्देश दिया कि वह 108 महत्वपूर्ण दवाओं के दाम सीमित रखनेवाले उसके पहले के दिशानिर्देश को निरस्त कर दे। टीबी, कैन्सर, डाइबेटिस, एचआईवी/एडस और दिल के रोग आदि के इलाज में कारगर रहनेवाली इन दवाइयों के दामों में इसके चलते प्रचण्ड बढ़ोत्तरी हुई। उदाहरण के तौर पर गिलवेक नामक दवाई, जो कैन्सररोधी है, उसका दाम 8,500 रूपयों से बढ़ कर एक लाख आठ हजार तक पहुंच गया तो प्लाविक्स नामक दवा जो रक्तचाप एवं दिल के रोग में काम आती है उसका दाम 147 रूपयों से 1,615 तक पहुंच गया। वही हाल बाकी दवाओं का भी था। महाराष्ट्र में सत्तासीन फडणवीस सरकार ने भी सत्ता सम्भालने के दो दिन के भीतर मुत दवाओं की योजना को समाप्त करने का निर्देश दिया।

विडम्बना यही है कि जनता के हकों एवं अधिकारों पर एक के बाद एक हो रहे इन कुठाराघातों के बावजूद,अभी भी लोगों के बड़ेे हिस्से का ‘अच्छे दिनों का सम्मोहन’ दूर क्यों नहीं हो रहा है ? बुद्धिजीवियों के बड़े हिस्से के सम्मोहन को समझ सकते हैं क्योंकि उनके लिए मोदी के इंडिया में अभी नए नए अवसर दिख रहे हैं, मगर आम जनता और वे तमाम ताकतें जो प्रतिरोध एवं परिवर्तन की सियासत में मुब्तिला हैं, उनकी तरफ से कोई नया मोर्चा खुलता क्यों नहीं दिख रहा है ?

इसमें कोई दोराय नहीं कि भारतीय लोकतंत्र का इतिहास बार बार इसी बात को दोहराता है कि चुनावों में भारी बहुमत से जीत कर आने और लोगों का विश्वास अर्जित करना कोई हमेशा की गारंटी नहीं होता, कब वही जनता आप के खिलाफ खड़ी हो जाए, कब आप के पैरों के नीचे से जमीन खिसकती नज़र आए यह अन्दाज़ा भी नहीं लगता। फिर चाहे बांगलादेश की मुक्ति के बाद भारी बहुमत से जीती इंदिरा गांधी की अगुआईवाली कांग्रेस हो – जिसे भ्रष्टाचार के खिलाफ दो साल के बाद ही जबरदस्त जनान्दोलन झेलना पड़ा था, आपातकाल के बाद कांग्रेस को शिकस्त देकर सत्ता में आयी जनता पार्टी हो या इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर पर सवार होकर बनी राजीव गांधी की सरकार हो, जिसकी वैधता को प्रश्नांकित करने में अकेले बोफोर्स का मुद्दा ही काफी रहा। आज की तारीख में मोदी के तिलिस्म में सम्मोहित वही जनता कब उनके खिलाफ खड़ी होगी, कब उनकी पूंजीपतिपरस्त नीतियों की मुखालिफत करने लगेगी इसकी फिलवक्त भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।

हमें यह सोचना होगा कि फिलवक्त़ अजेय लगनेवाले इस चक्रव्यूह को भेदने के लिए क्या रणनीति बनायी जाए, पंूजीशाहों को मालामाल करने की मोदी सरकार की नीतियों का किस तरह पर्दाफाश किया जाए और अभी मद्धिम आवाजों में ही सही ऐसे कदमों की मुखालिफत जारी रखी जाए।

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