मोदी पीएम हैं या शो मैन

7:25 pm or November 24, 2014
PM_Modi_namaste_Sydney_650

– विवेकानंद –

पिछले दिनों मोदी की विदेश यात्रा के दौरान भारतीय मीडिया में इस बात पर बहस चल रही थी कि क्या विदेश गए भारतीय पीएम को लेकर भारत में इस तरह की कोई प्रतिक्रिया होनी चाहिए जिससे भारत की प्रतिष्ठा गिरे। यह चर्चा इसलिए हुई क्योंकि कांग्रेस के नेता सलमान खुर्शीद ने कहा था कि मोदी ने पैसे देकर ताली बजाने वालों की भीड़ जुटाई है। बेशक खुर्शीद के आरोप पर आपत्ति उठाई जा सकती है, लेकिन मुश्किल यह है कि यह परंपरा बन गई है और इसमें विपक्ष के साथ खुद प्रधानमंत्री भी शामिल हैं।

क्या भारतीय प्रधानमंत्री को यह शोभा देता है कि जब वे विदेश यात्रा पर हों तो पिछली सरकारों को लेकर कोई टिप्पणी करें?  उनकी आलोचना करें? वे विदेश में भारत के प्रतिनिधि बनकर जाते हैं या फिर बीजेपी के नेता बनकर जाते हैं। पिछला अमेरिका दौरा हो या वर्तमान की तीन देशों की यात्रा मोदी प्रधानमंत्री कम और बीजेपी के नेता अधिक दिखाई दिए। यहां तक की मीडिया ने उन्हें पीएम की जगह शो मैन करार दिया। प्रधानमंत्री ने विदेशों में बसे भारतीयों के सामने कहा पिछली सरकार कानून बनाने में विश्वास रखती थी, चुनाव के दौरान आपने सुना होगा हमने यह कानून बनाया वह कानून बनाया, लेकिन मैं कानून हटाने में विश्वास रखता हूं। इन शब्दों में मोदी आखिर क्या कहना चाहते हैं और यह क्यों नहीं बताते कि कौन से कानून की चुनावों के दौरान चर्चा रही, क्या वे कानून देश के लिए गलत थे या देश का गौरव बढ़ाने वाले थे। निश्चित रूप से मोदी यह कभी नहीं बताएंगे कि चुनाव के दौरान कौन से कानूनों की चर्चा होती थी क्योंकि पिछली सरकार द्वारा बनाया गया यह वो कानून था जो दुनिया भर में देश की धाक जमाने वाला है। यह कानून था खाद्य सुरक्षा कानून। मोदी की इन बातों से साफ हो जाता है कि मोदी अब तक अपने भीतर प्रधानमंत्री वाला भाव नहीं ला पाए हैं, वे अभी भी बीजेपी के नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री की तरह व्यवहार करते दिखाई देते हैं। यही कारण है कि वे विदेशों में अपनी झांकी बनाने में जुटे रहते हैं और दूसरे राष्ट्रों के प्रतिनिधि अपने देश के लिए महत्वपूर्ण समझौते करने में व्यस्त रहते हैं।

प्रधानमंत्री के हालिया तीन देशों के दौरे पर यही हुआ। आस्ट्रेलिया पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी कोई महत्वपूर्ण समझौता नहीं कर सके। मोदी अपने स्वागत समारोहों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में व्यस्त थे और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग बिना शोरगुल के सबसे अहम व्यापार समझौते करने में व्यस्त थे। ऑस्ट्रेलिया में चीनी मूल के लोगों की संख्या भारतीय मूल के लोगों से बहुत अधिक है। ऑस्ट्रेलिया की कुल दो करोड़ 35 लाख लोगों की आबादी में चीनी मूल के लोगों की संख्या 1.8 प्रतिशत, जबकि भारतीय मूल के लोगों की संख्या 1.6 प्रतिशत है। जाहिर है जिनपिंग यदि चाहते तो मोदी के कार्यक्रम से बड़ा कार्यक्रम कर सकते थे, लेकिन उनकी नजर में देश महत्वपूर्ण था। चीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए सबसे अहम मुक्त व्यापार समझौते के तहत ऑस्ट्रेलियाई किसानों, वाइन उत्पादकों और डेयरी उत्पादों के उत्पादकों को चीन के बाजार तक पहुंच बनाना आसान हो जाएगा। अगले चार से 11 वर्ष में इन क्षेत्रों में टैक्स पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे। ऑस्ट्रेलियाई वाइन उत्पादक 30 प्रतिशत तक टैक्स देने के बावजूद हर वर्ष 20 करोड़ डॉलर की वाइन चीन को निर्यात करते हैं, टैक्स छूट के बाद इसमें भारी वृद्धि होने की संभावना है। इसके बदले चीन को ऑस्ट्रेलिया में निवेश रुकावटों से निजात मिलेगी। इसके उलट मोदी के दौरे पर उम्मीद थी कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम आपूर्ति को लेकर अहम समझौता होगा, लेकिन यह टल गया। ऑस्ट्रेलियाई अधिकारियों के अनुसार, अब इस पर 2015 के मध्य तक कोई समझौता होने की उम्मीद है। हां आतंकवाद को लेकर पीएम मोदी और आस्ट्रेलियर पीएम टोनी एबॉट के बीच जरूर बात हुई, जिसका उल्लेख बेमानी है क्योंकि भारत में जब भी आतंकी गतिविधियां होती है विदेशी सरकारें सिर्फ आलोचना करके चुप हो जाती हैं। अब तक ऐसा एक भी मौका नहीं है जब विदेशी सरकारों ने आतंकवाद के मुद्दे पर भारत को कोई उल्लेखनीय सहयोग मिला हो।

इसी तरह मोदी अपनी पहली विदेश यात्रा में भी फेल साबित हुए थे। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने गए मोदी ने कई मोर्चों पर देश की किरकिरी करवाई। जबकि उनके पास अंतराष्ट्रीय मंच पर खुद को साबित करने का बेहतर मौका था। सभी को उम्मीद थी कि बहुपक्षीय कूटनीति के क्षेत्र में पीएम मोदी कुछ खास जरूर करेंगे। लेकिन मोदी एकतरफा मिले जनादेश में ऐसे मंत्रगुग्ध थे कि उन्हें उसके सिवाए और कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा था। इस दौरे में विश्व मंच पर पीएम मोदी की जिस तरह से किरकिरी हुई उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। लेकिन मीडिया की सकारात्म रिपोर्टिंग में यह बात दब गई। इस यात्रा के एक चरण में नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिंग की मुलाकात मोदी-पुतिन बैठक के बाद होनी थी। लेकिन पुतिन उस बैठक के लिए आए ही नहीं क्योंकि वह 1600 किलोमीटर दूर ब्रासीलिया में ब्राजील की राष्ट्रपति डिल्मा रूसेफ के साथ बैठक कर रहे थे जो तय समय से दो घंटे ज्यादा चली। दूसरी ओर पीएम मोदी इंतजार ही करते रह गए। इस बीच मोदी और पुतिन के बीच बैठक का समय बदलने की भी कोशिश की गई, लेकिन उसमें भी भारतीय अधिकारियों को कामयाबी नहीं मिली। हालांकि, किसी तरह से दोनों नेताओं के बीच 40 मिनट की मुलाकात हो सकी। द टेलिग्राफ  ने उस वक्त कुछ भारतीय जानकारों के हवाले से एक रिपोर्ट छापी थी जिसके मुताबिक पुतिन जानबूझ कर मुलाकात के लिए नहीं पहुंचे। जबकि उन्हें पता था कि भारतीय प्रधानमंत्री उनका इंतजार कर रहे हैं। इसके अलावा शिखर वार्ता के दौरान ब्रिक्स बैंक बनाने के ऐलान में भी भारत को कोई खास कामयाबी हाथ नहीं लगी थी। मोदी का गुणगान सिर्फ इसलिए किया जा रहा था कि बैंक का पहला अध्यक्ष भारतीय होगा लेकिन बैंक का मुख्यालय चीन अपने यहां ले जाने में कामयाब रहा था।

इन तथ्यों से यह साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिनकी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का जबरन लोहा मनवाया जा रहा है, वास्तव में वे शो मैन हैं। वे लोगों को मनोरंजन कर सकते हैं और हर जगह भीड़ जोड़कर वे यह साबित भी कर रहे हैं। गहराई से देखें तो प्रधानमंत्री की यात्रा को मीडिया में भी कुछ इसी अंदाज में दिखाया जाता है जैसे किसी कार्यक्रम का प्रमोशन किया जाता है। मीडिया देशहित के मुद्दों के इतर उन कार्यक्रमों पर फोकस करता है जिनमें मोदी की बातों पर ताली बजाने वाली भीड़ जुड़ती है। अब यह बीजेपी और मोदी सरकार को खुद तय करना है कि वे विदेश यात्रा पर प्रवासियों का मनोरंजन करने जाते हैं या फिर कूटनीतिक तौर पर भारत और भारतीयों के हितों के लिए। फिर यदि कोई सवाल उठाता है तो इसमें गलत क्या है?

Tagged with:     , ,

About the author /


Related Articles

Leave a Reply

Humsamvet Features Service

News Feature Service based in Central India

E 183/4 Professors Colony Bhopal 462002

0755-4220064

editor@humsamvet.org.in