यह संकट तो एक शुरुआत है

2:50 am or September 8, 2014
Maruti

– रीना मिश्रा

हरियाणा के मानेसर स्थित मारूती कारखाने में सवा दो साल पहले हुए हिंसक संघर्ष में जहां एक मैनेजर की मौत हो गई थी वहीं बड़े पैमाने पर कंपनी के अंदर तोड़-फोड़ और आगजनी भी हुई थी। इस पूरे मामले में जेल में बंद 148 मजदूरों को आज तक जमानत भी नही मिल पाई है। इन मजदूरों पर हत्या, हत्या के प्रयास तथा आपराधिक षड़यंत्र जैसे मामले दर्ज हैं। इस हिंसा के दो साल बाद जहां आज कई मजदूरों का परिवार वापस अपने गांव लौट गया है, वहीं कई मजदूरों की पत्नियों ने गुड़गांव में ही छोटी मोटी नौकरी करके अपने बच्चों और परिवार वालों का पेट भरने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। मानेसर के मारूती कारखाने के इन मजदूरों को, उनके परिवारों को, आज जिस तरह से बेहिसाब त्रासदी का समना करना पड़ रहा है वह इस देश की लोकतांत्रिक सरकारों और उनके बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उनके मुनाफे के प्रति अगाध प्रेम को सवालों के घेरे में खड़ा करता है। सवाल यह है कि क्या हमें किसी भी कीमत पर विदेशी निवेश ही चाहिए? आखिर सभी राजनैतिक दल इस गंभीर मसले पर चुप्पी क्यों अख्तियार किए हुए हैं?

गौरतलब है कि जब यह घटना घटी थी और प्रशासन द्वारा इस घटना की मूल वजहों को दरकिनार कर मजदूरों पर हत्या, हत्या के प्रयास समेत कई संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था, कई मजदूर संगठनों द्वारा उदारीकरण की उस त्रासदी, जिसमें मजदूरों का अधिकतम शोषण किया जाता है, के संदर्भ को लेकर इस पूरे मामले में विशाल प्रदर्शन किया गया था। सड़क से लेकर अदालत तक चल रही इस लड़ाई में मुख्यधारा के राजनैतिक दलों द्वारा जहां चुप्पी साधे रखी गई है, वहीं अदालतों की वफादारी देश की आवाम के साथ न होकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ खड़ी दिखाई दे रही थी। मजदूरों को जमानत देने से इनकार करते हुए मानेसर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा यह कहा गया कि यदि मजदूरों को जमानत दे दी गई तो इससे विदेशी पूंजी निवेश प्रभावित होगा। यहां सवाल यही पैदा होता है कि आखिर हम किस मुल्क में रहते हैं? जहां इंसाफ का सवाल विदेशी पूंजी निवेश के आगे गौण हो जाता है। क्या इस मुल्क में इंसाफ भी विदेशी पूंजी निवेश को घ्यान में रखकर दिया जाएगा? अगर ऐसा ही आदेश दिया जाता रहा तो महज एक व्यक्ति की हत्या के आरोप में इन 148 मजदूरों को सजा सुना दी जाएगी। भले यह व्यवहारिक रूप से अटपटा लगे। अदालतों का विदेशी पूंजी की सुरक्षा और उसके आगमन का चिंतन करना क्या न्यायेतर नही है? आखिर विदेशी पूंजी निवेश के लिए न्यायपालिका इतनी चिंतित क्यों है?

आखिर क्या वजह है कि इस टकराव पर राजनैतिक दल मौन हैं। मजदूरों और मारूती के प्रबंधन के बीच इस टकराव की असल वजह मुनाफाखोर वैश्विक आवारा पूंजी द्वारा किसी भी कीमत पर अधिकतम लाभ और शोषण की संस्कृति है। एक ऐसी संस्कृति, जो मजदूर को उसके न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकार, उसकी सामाजिक सुरक्षा, जिंदा रहने के न्यनतम अधिकार से भी वंचित करती है। यह वह संस्कृति है जो कदम कदम पर मजदूरों को अपमानित करती है। उनके बीच ही खाईं पैदा करती है। दरअसल यह पूरा टकराव अधिकतम शोषण आधारित अमानवीय मुनाफाखोर प्रबंधन तंत्र के खिलाफ था जिसका हल वैश्विक आवारा पूंजी द्वारा मजदूरों को उनके न्यनतम सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन को रोकते हुए निकाला जा सकता था। यह सब दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति से बिल्कुल संभव था। लेकिन, इस मसले का एक राजनैतिक हल निकालने की इच्छाशक्ति किसी के पास नही थी। यह सब उनके वर्ग चरित्र को दर्शाता है।

बात यहीं तक सीमित नही है। गुजरात में 74 मजदूर यूएपीए के मामलों में सिर्फ इसलिए जेल में बंद हैं क्योंकि उन्होंने न्यूनतम मजदूरी मांगने की जुर्रत की थी। यही नहीं, हाल ही में नरेन्द्र मोदी सरकार ने ज्यादा विदेशी पूंजी निवेश आकर्षित करने के उद्देश्य से श्रम कानूनों में व्यापक बदलाव की प्रक्रिया का मैराथन शुरू किया है। ऐसी कोई कोशिश मजदूरों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को ज्यादा ही डांवाडोल करेगी। मजदूरों का शोषण और भी तेज हो जाएगा जो कि समूचे सिस्टम के लिए खतरनाक होगा। उदारीकरण से उपजे शोषण के खिलाफ जब दो साल पहले मजदूरों में इतना जबरजस्त गुस्सा था तब इन कानूनों के खात्मे के बाद मजदूरों के शोषण का स्तर क्या होगा, इसकी कलपना ही नही की जा सकती। ऐसे फैसले विनिर्माण क्षेत्र में जबरजस्त असंतोष की वृद्धि करेंगे। यह असंतोष कानून व्यवस्था के लिए जहां संकट पैदा करेगा वहीं मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा का खात्मा भी हो जाएगा। यह स्थिति काुी खतरनाक होगी। पहले से ही भीषण बेरोजगारी का सामना कर रही अर्थव्यवस्था इन फैसलों के बाद मजदूरों की छंटनी और शोषण का भीषण अध्याय अवश्य देखेगी। यह लोकतंत्र के लिए भी खतरनाक होगा।

कुल मिलाकर मारूती के मजदूरों को जिस प्रकार से शातिर तरीका अपनाकर जमानत तक नही दी जा रही है, वह यह साबित करता है कि पूरा तंत्र और समूची राजनीति मजदूरों के खिलाफ खड़ी है। आखिर किसी दल में यह हिम्मत क्यों नही है कि वह उस समूची व्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद करे, जो इस टकराव की मूल वजह थी। यह चुप्पी साफ जाहिर करती है कि उन्हें इन मजदूरों से उनके किसी दुःख से कुछ भी लेना देना नही हैं। मजदूरों को हाशिए पर डालने की एक मुहिम चल रही है। इस मुहिम में सब शामिल हंै। सवाल यह है कि आखिर यह सब कितने दिन चलेगा। ऐसी घटनाएं कानून बनाकर नही रोकी जा सकती। इन मजदूरों को जेल में रखने से कोई फायदा नही होगा। इस पूरी घटना की बुनियाद उदारीकरण के ढांचे में हैं। जब तक आर्थिक शोषण की बुनियाद पर हमला नही किया जाता, ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। क्या इस घटना की बुनियाद पर बहस करने की हिम्मत देश के किस भी राजनैतिक दल में है?

 

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