’लोकतंत्र का स्याह पक्ष हैं ये आंकड़े’

4:43 pm or December 1, 2014
Prisoner

– हरे राम मिश्र –

अभी कुछ दिन पहले ही नेशलन क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की ओर से देश की जेलों मे बंद कैदियों की संख्या तथा उनके धर्म एवं समुदाय आधारित आंकड़ों वाली एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की गई। रिपोर्ट में सन् 2013 तक के आंकड़े दिए गए हैं जिसमें कहा गया है कि देश की जेलों में बंद कुल कैदियों की संख्या का 53 प्रतिशत मुस्लिम, दलित और आदिवासी वर्ग से आते हैं। सन् 2013 तक देश की जेलों में 4 लाख 20 हजार लोग बंद थे जिनमें 68 प्रतिशत संख्या उन कैदियों की थी जिनके मामलों का अदालती ट्रायल चल रहा था। जेल में बंद इन 4 लाख 20 हजार कैदियों में जहां 20 प्रतिशत मुसलमान हैं वहीं दलितों की संख्या 22 प्रतिशत है। रिपोर्ट के मुताबिक इन कैदियों में 11 प्रतिशत आदिवासी भी हैं। इस आधार पर अगर देखा जाए तो देश का हर चैथा कैदी दलित है। देश के मुसलमान और आदिवासी अपनी कुल आबादी प्रतिशत से ज्यादा जेलों में बंद हैं। गौरतलब है कि सन् 2011 की जनगणना के मुताबिक देश की आबादी का 39 प्रतिशत हिस्सा इन्ही वर्गों से आता है। वर्तमान में देश की 17 प्रतिशत जनसंख्या जहां दलित है वहीं मुसलमान लगभग 13 प्रतिशत हैं। देश में आदिवासियों की जनसंख्या कुल आबादी  का लगभग 9 प्रतिशत है।

मजबूत होते लोकतंत्र के दावों के बीच, देश के वंचित और गरीब तबके की इस बदरंग स्थिति के पीछे कुछ लोगों की यह राय भले ही है कि यह तबका आपराधिक प्रवित्ति का होता है, लेकिन केवल इस राय की आड़ में इन तथ्यों की गंभीरता को आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह तबका देश का सबसे गरीब, अशिक्षित और उपेक्षित होता है, लिहाजा व्यवस्थागत अन्याय की मार सबसे ज्यादा इसी वर्ग पर पड़त़ी है। यह तबका इसलिए भी बड़ी संख्या में जेलों में बंद है क्योंकि वह देश के खर्चीले ’न्यायिक तंत्र’ में इंसाफ ’खरीद’ नहीं सकता। विशेषज्ञ इस स्थिति के लिए सत्ता तंत्र की एक खास ’वर्गीय’ मानसिकता को जिम्मेदार मानते हैं जो झूठे तथा आधारहीन केस बनाकर इन तबकों के नौजवानों को ’फर्जी’ मुकदमों में फंसाता है। उनके उदाहरण में झारखंड और छत्तीसगढ़ का वह आदिवासी युवक होता है जिसे ’माओवादी’ बताकर कई सालों तक जेल में बंद रखा जाता है।

यही नहीं, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि देश में मुस्लिम नौजवान बड़ी संख्या में ’आतंकवादी’ होने के फर्जी आरोप में जेलों में बंद हैं। यह व्यवस्थागत अन्याय का क्रूरतम उदाहरण है। इन पीडि़त वर्गों के पास जमानत तक के लिए पैसा नहीं होता। उनके पास जमानत तक का कोई आधार ही नहीं होता, इसीलिए वह जेलो में सड़ता है। विशेषज्ञ कहते हैं कि इसके पीछे दरअसल हमारी पूरी प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था जो कि सांप्रदायिक, जातिवादी और आर्थिक आधार पर बंटी हुई है, जिम्मेदार है। जातिवादी मानसिकता और सिस्टम के दोहरे चरित्र के कारण भी समाज के इन वंचित तबकों को इंसाफ मिलना मुश्किल होता है।

कुल मिलाकर यह रिपोर्ट देश की समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्याह पक्ष उजागर करते हुए साफ कर देती है कि व्यवस्था की मार इन गरीबों पर पड़ती है। इनकी गरीबी ही इनका सबसे बड़ा गुनाह है। असल सवाल यह है कि इस शर्मनाक स्थिति से निकला कैसे जाए? यह सवाल तब और भी गंभीर हो जाता है जब देश के समूचे राजनैतिक तंत्र के पास आम आदमी, उसके सवालों और समस्याओं पर सोचने के लिए कोई वक्त नहीं है। आखिर इस शर्मनाक स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है और राजनीति तथा समाज के पास इसे दूर करने का क्या कोई खाका भी है? क्या मौजूदा मोदी सरकार में इस दिशा में कोई पहल होने की गुंजाइश है?

जहां तक मौजूदा सरकार में हालात सुधरने की किसी गुंजाईश का सवाल है, बेहद निराशा ही हाथ लगती है। केन्द्र की नरेन्द्र मोदी की सरकार के कार्यकलापों को देखकर कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि वह देश के दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों को ’इंसाफ’ देने की कोई पहल करने जा रही है। देश का दलित तबका  जिस सामाजिक व्यवस्था के कारण लंबे समय तक हाशिए पर पड़ा रहा, उसका समर्थन करने वाले पुराने ’मनुस्मिृतिवादी’ तंत्र का पोषण मोदी सरकार द्वारा खुलकर किया जा रहा है। उसे जायज ठहराने के ’हास्यास्पद’ तर्क दिए रहे हैं। संघ की पूरी राजनीति ही मुस्लिम विरोधी है। आदिवासी समाज को मोदी सरकार प्रायोजित काॅरपोरेट लूट के विरोध का खामियाजा उठाना पड़ रहा है। कुल मिलाकर मोदी सरकार के पास इन तबकों के लिए कोई इंसाफ ही नहीं है।

वास्तव में भारतीय लोकतंत्र आज जिस मुहाने पर खड़ा हो गया है वहां आम आदमी के लिए राजनीति में कोई ’स्पेस’ ही नहीं है। यह स्थिति तब और भी गंभीर हो जाती है जब देश के मुख्यधारा के राजनैतिक दल आम आदमी की आवाज बनने, उसके सवालों पर संघर्ष करने की जगह ’कुछ खास’ किस्म के राजनैतिक और आर्थिक सवालों पर ही दिखावटी हल्ला काटते दिखाई देते हैं। चाहे सत्तारूढ़ राजनैतिक दल हो या फिर विपक्ष में बैठी मुख्यधारा की राजनैतिक पार्टियां, किसी के पास आम आदमी के सवालों, उनकी समस्याओं पर बात करने के लिए कोई और प्रतिबद्धता नहीं रह गई है। इन दलों के पास इन शर्मनाक आंकड़ों को देखने और स्थिति में सुधार के लिए किसी बड़े बदलाव के लिए संघर्ष की कोई आहट तक नही देखी जा रही है। कुल मिलाकर यह व्यवस्था कदम दर कदम गरीब विरोधी होती जा रही है। आज समूची राजनीति का ’वर्ग चरित्र’ देश की आम जनता के ’खिलाफ’ केवल देशी विदेशी पूंजी के पक्ष में खड़ा हो चुका है। राजनीति ने अपने लिए एक सीमा रेखा तय कर ली है जिसमें इन सवालों के लिए जगह नही है। उसकी राजनीति के मुद्दे एक ’खास’ जगह से आते हैं और उसकी सारी जवाबदेही भी उसी सीमा रेखा के अंदर कुछ ’खास’ वर्गों तक सिमट चुकी है।

कुल मिलाकर, आज यह लोकतंत्र इस मुकाम पर खड़ा हो चुका है जहां राजनीति और निर्दयी प्रशासनिक तंत्र बेबस जनता को खाने के लिए तैयार खड़ा है। कोई जेल में सड़े तो अपनी बला से। प्रशासन और राजनीति के लिए यह कोई समस्या नही है। अब सरकारों की जिम्मेदारी केवल देश के खनिज और मानव संसाधनों की काॅरपोरेट लूट का माकूल इंतजाम देखना भर रह गया है। ऐसे स्याह आंकड़ों के लिए इस मुल्क की राजनीति ही जिम्मेदार है जो पक्ष और विपक्ष को भूलकर वैश्विक पूंजीवाद की मुनाफा आधारित व्यवस्था की अखंड सेवा में तल्लीन है। क्या लोकतंत्र के इस स्याह आंकड़ों पर समूची राजनीति कोई सार्थक पहल करने का साहस कर सकती है। क्या उसमें ऐसा कर पाने का साहस भी है?

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