10 दिसम्बर: विश्व मानवाधिकार दिवस पर विशेष; मुद्दा: मानव अधिकारों के हनन का

3:31 pm or December 8, 2014
World-Human-Rights-Day

– डा. गीता गुप्त –

आज मानव अधिकार सम्पूर्ण विश्व की एक आधारभूत आवश्यकता है। मानव अधिकारों के अभाव में समूची मानव जाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 10 दिसम्बर 1948 को जिन मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा की गई, उन्हें समस्त विश्व के नागरिकों के अधिकारों एवं स्वतंत्रता की दिशा में प्रभावी माना गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने घोषणा पत्र में जो मानव अधिकार घोषित किए, वे ही भारतीय संविधान में मूल अधिकारों के रूप में नागरिकों को प्रदान किए गए हैं। अतः इनका संरक्षण हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। परन्तु आज विश्व के अधिकतर देशों में मानव अधिकारों का व्यापक स्तर पर खुले आम हनन हो रहा है और मानव अधिकार आयोग केवल प्रतिवेदन या पक्षपातपूर्ण कुछ रपट प्रस्तुत करने के अलावा इस संदर्भ में कोई ठोस प्रभावी कदम नहीं उठा पाया है।

मानव अधिकारों की रक्षा और उनकी गरिमा को बनाए रखने हेतु संकल्पित अन्तर राष्ट्रीय संगठन ‘एमनेस्टी इण्टरनेशनल’ पश्चिमी देशों का ही समर्थक है। अतः पश्चिमी देशों तथा उनके समर्थक विश्व के अन्य देशों में हो रहे मानव अधिकारों के हनन और अमानवीय अत्याचारों की ओर इस संगठन की दृष्टि तक नहीं जाती। जबकि भारत या अफ्रीका के किसी भी देश में होने वाली घटनाओं पर तुरन्त प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उसका ढिंढोरा पीट दिया जाता है। इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ के ‘मानव अधिकार आयोग’ और ‘एमनेस्टी इण्टरनेशनल’ का संकुचित दृष्टिकोण पक्षपातपूर्ण कार्य एवं व्यवहार तथा दुर्बलता मानव  अधिकारों की विश्वव्यापी घोषणा के क्रियान्वयन में बाधक सिद्ध हो रही है। इसी कारण मानव अधिकारों की सार्थकता और व्यावहारिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है और उनका हनन विश्व भर में गम्भीर रूप लेता जा रहा है।

आधुनिक विश्व के माथे पर मानव अधिकारों के हनन का कलंक लज्जास्पद है। वस्तुतः विश्व के कुछ ही भागों में मानव अधिकार तथा आधारभूत स्वतंत्रता सुरक्षित है। अधिकतर देशों को इनकी समझ तक नहीं है। अज्ञान या अशिक्षा के कारण वहां अभी इनका कोई अर्थ ही नहीं है। हालांकि मानवाधिकारों को प्रोत्साहित करने तथा उनके संरक्षण हेतु उपयुक्त अन्तराष्ट्रीय कानून का अभाव नहीं है परन्तु आवश्यकता इस बात की है कि सम्बन्धित राज्य या पक्षकार उनका पालन करें। निर्धनता, बाल श्रम, बाल अपराध, बाल विवाह, भ्रूण हत्या, दहेज अपराध, वेश्यावृत्ति, मानव तस्करी, रंग-भेद, श्रमिकों का शोषण, आतंकवाद आदि अनगिनत ऐसे मुद्दे हैं, जहां मानवाधिकारों का हनन स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। विश्व के अग्रणी राष्ट्र अमेरिका में भी अश्वेत लोगों पर हो रहे अत्याचार की घटनाएं आएदिन अखबार की सुर्खियों में होती है। अनेक देशों में राजनीतिक बन्दियों पर मुकदमा चलाए बिना ही उन्हें वर्षों तक कारागार में रखा जाता है, तो कहीं ऐसे बन्दियों को बिजली के झटके देकर अमानवीय यातना दी जाती है। कई देशों के शासक तो अब भी कोड़े लगाने और हाथ कटवा देने जैसे अमानवीय दण्ड देने से भी नहीं कतराते। गत जून महीने में ही तालिबान आतंकवादियों ने अफगानिस्तान में राष्ट्रपति के चुनाव में मतदान करने वाले ग्यारह अफगान नागरिकों को फरमान न मानने की सजा दी। उन अफगान मतदाताओं की स्याही लगी उंगलियां काट दी गई। पर सरकार ने क्या किया ? मई 2014 में लाहौर हाई कोर्ट के सामने पच्चीस वर्षीया एक गर्भवती महिला फरजाना इकबाल की उसके परिजनों ने पत्थर मार-मारकर इसलिए हत्या कर दी कि उसने मोहम्मद इकबाल से प्रेम विवाह किया था। लगभग 15 मिनट तक उसके परिजन उस पर पत्थरों से प्रहार करते रहे। इकबाल उसके प्राणों की भीख मांगता रहा, पर कोई न पसीजा। पुलिस भी मूकदर्शक बनी रही। इस बर्बर हत्या की विश्व भर में निंदा हुई। मगर पाकिस्तान सरकार और वहां के मानव अधिकार आयोग ने क्या किया ? तदनुसार ही गत वर्ष वहां 869 महिलाओं को सम्मान के लिए मारे जाने की खबरें आई जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है। यह नृशंसता मानव अधिकारों का हनन नहीं तो क्या है ?

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार जांचकर्ताओं ने एक रपट प्रस्तुत की है। तीन सौ से अधिक प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के साथ ही इस्लामिक स्टेट (आई.एस.) आतंकवादियों द्वारा वितरित वीडियो और फोटो के आधार पर तैयार इस रपट में बताया गया है कि सिगरेट पीते पकड़े जाने वाले आदमियों की अंगुलियां काटी जा रही हैं और अनुचित कपड़े पहनने पर महिलाओं को कोड़े मारे जा रहे हैं या पत्थर मार कर हत्या की जा रही है। ईरान में एक ब्रिटिश ईरानी महिला गोनचेह गवामी को 20 जून को हिरासत में लिया गया था और अब एक साल कैद की सजा दी गई है क्योंकि वह ईरान-इटली के बीच पुरुष वालीबाल मैच देखने की कोशिश कर रही थी। ईरान में महिलाओं के लिए पुरुषों का वालीबाल मैच देखना प्रतिबंधित है। ईरान का ही एक दूसरा प्रकरण भी यहां उल्लेखनीय है। वहां की 26 वर्षीया युवती रेहाना जब्बारी को 25 अक्तूबर 2014 को फांसी दे दी गई। उसने वर्ष 2007 में अपने साथ ज्यादती की कोशिश करने वाले खुफिया एजेण्ट मुर्तजा अब्दोआली सरबन्दी पर चाकू से वार किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी। रेहाना को वर्ष 2009 में कत्ल का कसूरवार पाया गया था। पेशे से इण्टीरियर डेकोरेटर रेहाना को फांसी से बचाने के लिए अन्तराष्ट्रीय मुहिम चलाई गई, फिर भी उसकी जान नहीं बचायी जा सकी।

ऐसा प्रतीत होता है कि जिन देशों के धार्मिक कानून बड़े कठोर हैं, वहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रगतिशील विचारों के लिए बिल्कुल स्थान नहीं है। तभी तो पैगम्बर मुहम्मद साहब के विरुद्ध टिप्पणी करने पर तीस वर्षीय ईरानी युवक सोहेल अरबी को मौत की सजा सुनाई गई है। ईरान की इस्लामी दण्ड संहिता की धारा 262 में पैगम्बर मुहम्मद साहब का अपमान करने की सजा मौत है। यदि यह सिद्ध हो जाए कि किसी ने क्रोधावेश में या गलती से ऐसा किया है, तो उसे मौत की बजाय 74 कोड़ों की सजा दी जा सकती है। ऐसे ही ईश निन्दा का मामला पाकिस्तान में भी सामने आया है। अभिनेत्री वीना मलिक, उनके पति और मीडिया समूह जियो टी.वी. के मालिक शकील उर रहमान पर ईश निन्दा का दोष सिद्ध होने पर एण्टी टेररिज्म कोर्टने 26 साल की कैद की सजा और 13 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। गिलगित बाल्टिस्तान की एक कोर्ट ने वीना और उसके पति को दूरदर्शन पर ईश निन्दा से जुड़ा कार्यक्रम पेश करने का दोषी माना है। आरोपियों में दूरदर्शन की मेजबान शाइस्ता वाहिदा भी हैं। जुर्माना न देने पर इनकी सम्पत्ति जब्त करने का आदेश भी दिया गया है।

भारत सहित अधिकतर देशों में विभिन्न क्षेत्रों के अलावा प्रायः महिलाओ के मानव अधिकार हनन के मामले प्रमुखता से सामने आते हैं। कैटलिस्ट ग्लोबल रिसर्च के एक कॅरिअर में रहने के बाद अपने पुरुष सहयोगी से वेतन पैकेज में वे करीब 3.8 लाख रुपए तक पीछे रह जाती हैं। अमेरिकन एसोसिएशन आफ यूनीवर्सिटी वीमेन की रपट के अनुसार अमेरिका में गत वर्ष समान काम पर महिलाओं को 78 प्रतिशत कम वेतन मिला। भारत में लिंग-भेद इतना जबरदस्त है कि अभी भी परिवारों में लड़कों को वरीयता दी जाती है और सरकार को ‘बेटी बचाओ अभियान’ छेड़ना पड़ा है। यहां हर स्तर पर महिलाओं का जीवन कठिनाइयों से भरा है और वे मानवाधिकारों के लिए अपने घर, बाहर, हर कहीं संघर्षरत हैं। क्या कामकाजी और क्या गृहिणी-किसी भी महिला को पूर्णतः समानता एवं स्वतंत्रता का

अधिकार अब तक प्राप्त नहीं है। सरकार सभी नागरिकों को शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन आदि का अधिकार देने हेतु कटिबद्ध है। लेकिन जब तक व्यक्ति के मानवाधिकार का संरक्षण नहीं होगा, तब तक उसका जीवन उन्नत कैसे होगा ? स्त्रियों के संदर्भ में तो यह और भी आवश्यक है।

इण्डोनेशिया के एक मानवाधिकार संगठन ने आरोप लगाया है कि पुलिस में शामिल होने की इच्छुक युवतियों का कौमार्य परीक्षण कराया जा रहा है। इस वर्ष वहां सात हजार महिलाओं को पुलिस में शामिल करने के बाद प्रशिक्षण दिया जा रहा है। शर्मनाक यह है कि इन सभी प्रशिक्षणार्थियों को भर्ती से पूर्व इस अमानवीय परीक्षण से गुजरना पड़ा। हयूमन राइट्स वाच की इस रपट की पुष्टि इण्डोनेशियाई पुलिस की वेबसाइट भी करती है। मगर पुलिस प्रवक्ता इसे सामान्य चिकित्सकीय परीक्षण मानते हैं। यहां मानवाधिकार हनन के संदर्भ में नाइजीरिया की घटना का उल्लेख भी प्रासंगिक होगा। अप्रैल 2014 में 220 अपहृत नाइजीरियाई छात्राओं का अब तक कुछ पता नहीं चला है। आतंकवादी संगठन बोकोहराम का दावा है कि सभी लड़कियों ने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया है और उनका निकाह हो गया है। यदि यह दावा सही हो, तब भी मामला बहुत गम्भीर और चिंताजनक है क्योंकि छात्राएं अब तक लापता हैं। आज लाखों की संख्या में जो अत्याचार हो रहे हैं, उन्हें रोकना मानव अधिकार के बिना सम्भव नहीं। विश्व समाज में शांति तभी स्थापित हो सकती है, जब मानवाधिकार का समुचित संरक्षण हो।

निस्संदेह, विश्व को युद्ध, हिंसा तथा विनाश से बचाने हेतु सभी देशों को अपने स्तर पर मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करनी होगी। यद्यपि इस संदर्भ में आज विश्व जनमत तैयार हो रहा है। विश्व भर के बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनेताओं और अशासकीय संगठनों ने मानव अधिकारों की रक्षा हेतु सामान्य जन-मानस में चेतना का संचार करते हुए आवाज बुलन्द की है। परन्तु अभी तक विश्व का कोई भी मानव समाज व्यापक रूप में मानवाधिकारों के लिए यह नितान्त आवश्यक है। अतएव संयुक्त राष्ट्र संघ को समूचे विश्व में ऐसी राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियां निर्मित करनी चाहिए जिनमें मानव अधिकारों की वैधानिक मान्यता और उनके सुरक्षित उपयोग की व्यवस्था सुनिश्चित हो सके।

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