यह ’डील’ लोकतंत्र के खिलाफ है

4:40 pm or December 8, 2014
Modi adani

– रीना मिश्रा –

इसे देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए अशुभ ही कहा जाएगा कि महज 31 प्रतिशत मतदाताओं का वोट पाकर सत्ता में आने वाली मोदी सरकार, पूरे भारतीय लोकतंत्र को विदेशी काॅरपोरेट कंपनियों के हवाले करने में तेजी से जुटी हुई है। मोदी सरकार में सत्ता संतुलन पूरी तरह से श्रमिक और जन विरोधी शक्तियों यानी ’बाजार’ और वैश्विक ’आवारा’ पूंजी के पक्ष में जा चुका है। देश के कानूनी ढांचे मे जो भी बातें पूँजी , काॅरपोरेट घरानों और बाजार की निरंकुशता की राह में रुकावट बनती थीं, अब उन्हें एक-एक करके हटवाया जा रहा है। बहुसंख्यक आबादी की इच्छाओं-आकांक्षाओं से बेपरवाह नरेन्द्र मोदी किसी भी कीमत पर देश-दुनिया के निवेशकों तथा काले धन के मालिकों के हित में, भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को नष्ट कर देने पर आमादा हैं । श्रम कानूनों में किया जाने वाला बदलाव उसी प्रकृया का एक छोटा सा हिस्सा भर था। यह कहना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मोदी सरकार ने अपने छह महीने पूरे कर लिए हैं और अब तक के काम काज के दौरान उसका कोई भी कदम गरीबों और श्रमिकों के हित में नहीं उठा है। छह महीने में ही इस सरकार का लोकतंत्र विरोधी चरित्र सबके सामने आ चुका है।

वास्तव में श्रम कानूनों में श्रमिक जनता के खिलाफ बदलाव, दवा मूल्य नियंत्रण नीति में मरीजों के खिलाफ बदलाव, एफडीआई नीति में पूरे देश के खिलाफ बदलाव, राष्ट्रीयकरण कानून में सामाजिक मालिकाने के खिलाफ निजी हित के लिए बदलाव, दोहरे कराधान से बचने के नाम पर काॅरपोरेट्स को भारी छूट, सामाजिक, सांस्कृतिक नीति में बदलाव, विदेश नीति में अमेरिका की ओर झुकाव, सब्सिडी नीति में बड़े पूंजीपतियों के पक्ष में बदलाव आदि को मिलाकर एक पूरा ’पैकेज’ भगवा पार्टी ने चुनाव के पहले तैयार किया था। मोदी सरकार देश में इसी पैकेज को अब लागू कर रही है। इस ’डील’ में आम आदमी के सवाल कहीं भी नही थे। यदि मोदी इस लोकतंत्र विरोधी ’डील’ को लागू करने में कामयाब हो जाते हैं, तो देश काले धन वालों के हितों की रखवाली करने वाला, गैर लोकतांत्रिक और फासिस्ट मुल्क में तब्दील हो जाएगा।

इधर, निराशाजनक यह है कि मोदी सरकार की इन घोर श्रमिक तथा जन विरोधी आर्थिक और सामाजिक नीतियों की इस ’डील’ के खिलाफ कोई जनमत नही बन पा रहा है। देश के उत्पादन क्षेत्र में तो कतई नहीं। इस त्रासदी के लिए हमारे देश का ट्रेड यूनियन ढांचा जिम्मेदार है। वास्तव में देश का ट्रेड यूनियन आंदोलन कभी भी देश की पूरी श्रमिक जनता का आंदोलन ही नहीं बन सका। यह मुख्यतः संगठित क्षेत्र के श्रमिकों की सुख सुविधाओं तक सीमित रहा। इसीलिए श्रमिकों के पक्ष में जो भी कानून बने, उसका फायदा सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों को ही मिला। बाकी 90 प्रतिशत के हिस्से में सिर्फ राहत योजनाओं का दान आया। लाभ पाने वालों में भी, जो सरकारी क्षेत्र में कार्यरत थे उन्हें बेहतर सुविधाएं मिलीं, और जो निजी क्षेत्र में थे वे कानूनी जटिलता के कारण इन लाभों से वंचित रहे। इस तरह श्रमिक जनता के भीतर ही कई स्तर बन गए, जिसमें सबसे ऊपरी स्तर को कुछ लाभ देकर पूरी श्रमिक आबादी के अधिकारों डाका डाला गया। कुल मिलाकर, एक खाईं सी बन गई और यह खाईं आज इतनी चैड़ी हो गई है कि श्रमिक आबादी का सुविधा प्राप्त हिस्सा खुद को श्रमिक कहलाने में संकोच करता है।

बात यहीं तक सीमित नही है। श्रमिक तथा जन विरोधी कानूनों की यह पूरी प्रकृया काफी पहले से ही ’सेज’ के रूप में चल रही थी। उदारीकरण के दौरान देश में ’सेज’ कानून बनाकर ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों के गठन का काम शुरू किया गया, जहां पर श्रम कानून लागू ही नही होते थे। नई तकनीक से जुड़ी औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े क्षेत्रों-आईटी, पर्यटन, निर्यात, उत्पादन आदि में ट्रेड यूनियनों के गठन पर रोक लगाकर श्रम शक्ति की कीमत को पैकेज के रूप में देना शुरू किया गया था। मजदूरी वेतन की जगह पैकेज का अर्थ है-कोई श्रम कानून नही। अधिक शिक्षित वर्ग के लोग ’पैकेज’ पाकर कुछ समय तक यह समझे कि वे श्रमिकों से ऊपर उठ गए जबकि यह केवल एक भ्रम था। मोदी सरकार इस नीति को और निर्मम तरीके से आगे बढ़ा रही है और सामाजिक सुरक्षा के आधार स्तंभ इन श्रम कानूनों को किताबों से मिटाया जा रहा है। इन कानूनी बदलावों के बाद देश चीन की तरह एक सेज (स्पेशल इकोनाॅमिक जोन) बना दिया जाएगा, जहां मजदूरों की कोई हैसियत ही नही होगी। यह प्रकृया लंबे समय से चल रही है लेकिन इसके विरोध में कहीं कोई आवाज नही उठी। इसके लिए ट्रेड यूनियनें ही जिम्मेदार हैं।

वास्तव वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी के संकट से निकलने के नाम पर मोदी सरकार द्वारा जो कुछ भी एक तय ’डील’ के तहत किया जा रहा है वह संकट को खत्म करने की जगह और बढ़ा देगा। आज वैश्विक पूंजीवादी तंत्र का भविष्य दांव पर लग चुका है। उसके विकास का हर कदम नई मंदी के रूप में लौट कर उस पर ही चोट कर रहा है। जैसे-जैसे दुनिया की धन दौलत मुट्ठी भर लोगों के हाथों में सिमटती जा रही है, वैसे-वैसे बाजार पर मंदी की मार भी बढ़ रही है। बाजार के अपने सिद्धांत हैं और यदि वह आम आदमी के साथ कोई रियायत नही करता तो पूंजीपतियों के साथ भी कोई स्नेह नही करता। यदि माल नही बिका तो पूंजीपति वर्ग लुटा-पिटा और दिवालिया होगा। इन पूंजीपतियों को बचाने की कवायद में मोदी सरकार देश की आमजनता के हितों के खिलाफ खड़ी हो चुकी है। मोदी सरकार की नीति है कि देश के श्रमिक वर्ग को पूरी तरह अधिकार विहीन करके श्रम शक्ति को इतना सस्ता बना दिया जाए कि यदि कम माल भी बिके तो भी मुनाफा हो जाए। बाकी कमी सट्टेबाजी, टैक्स चोरी और अनुदान लेकर पूंजीपति वर्ग पूरी कर लेगा। इसीलिए यह सरकार ’पाॅलिसी पैरलिसिस’ और ’इंस्पेक्टर राज’ खत्म करने के नाम पर मजदूर-श्रमिक जनता पर लगातार हमले का एक पूरा पैकेज लेकर आई है, जो इस व्यवस्था को निश्चित तौर पर एक नई और भयावह मंदी के गड्ढ़े की ओर ले जाएगी। जाहिर है संकटग्रस्त वैश्विक पूंजीवाद को मंदी से उभारने के लिए मोदी कोई चमत्कार नही कर सकते क्योंकि यह समस्या वैश्विक और पाॅलिसीगत निर्णयों की वजह से उपजी और पूंजीवाद की आवश्यक सच्चाई है। मोदी चाहे जितने जतन कर लें, जाहे जिन कानूनों का खात्मा कर लें, चाहे जैसी ’डील’ कर लें वैश्विक पूंजीवाद को मंदी से उभारना उनके वश मे नही है।

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