बर्द्धवान धमाके का सच क्या है श्रीमान?

5:38 pm or December 8, 2014
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– हरे राम मिश्र –

अक्टूबर 2014 में पश्चिम बंगाल के बर्द्धवान जिले में हुए कथित आतंकी धमाके, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई थी, के बारे में जिस तरह से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी सरकार पर धमाके करवाने का आरोप लगाया है वह गंभीर है। ममता बनर्जी का यह कहना कि पश्चिम बंगाल में दंगे करवाने के लिए केंद्र ने ही बर्द्धवान धमाका करवाया, से साफ हो चुका है कि देश में आतंकवाद की पूरी समस्या वोटों की राजनैतिक गोलबंदी का एक हथियार मात्र है और इसे राजनैतिक वजहों से ही जिंदा रखा जा रहा है। बहरहाल, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बर्द्धवान विस्फोटों को लेकर राॅ और बीजेपी की संलिप्तता पर जो सवाल उठाया है उससे आतंकवाद की इस प्रायोजित राजनीति पर नए सवाल पैदा होने लाजिमी हैं। हाल ही में एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्रिका द्वारा जो खुलासे किए गए उसके आलोक में इन धमाकों पर बहस होना लोकतंत्र के हित में होगा। गौरतलब है कि खुफिया एजेंसियों की सांप्रदायिक और लोकतंत्र विरोधी भूमिका पर पहली बार सवाल नही उठे हैं। जब भी देश में कहीं कोई बड़ी आतंकी साजिश हुई है, विस्फोट हुआ है, हमेशा ही खुफिया एजेंसियों का कार्य और चरित्र सवालों के घेरे में आया है। बर्द्धवान धमाकों को लेकर जिस तरह से चैंकाने वाले खुलासे हुए हैं उससे यह शक गहरा जाता है कि इन धमाकों के पीछे की असलियत कुछ अलग है और खुफिया एजेंसियां इस असलियत को छुपा रही हैं।

दरअसल इस धमाके की जांच के नाम पर एनआईए पूरे प्रकरण को एक खास दिशा देना चाहती है। एनआईए इस जांच को किस तरह से भटका रही है, उसका अंदाजा इससे लग जाता है कि विस्फोट में मारे गए जिस व्यक्ति को एनआईए करीम शेख बता रही है, उसके पिता जमशेद शेख दावा कर रहे हैं कि वह शव उनके बेटे का है ही नहीं। उनका कहना है कि उन पर एनआईए ने जबरन दबाव डालकर शव को अपना बेटा स्वीकार करने को कहा। उनके मुताबिक विस्फोट में मारे गए व्यक्ति के शव की सिर्फ एक तस्वीर, जो कथित तौर पर उनके बेटे की बताई गई, को मोबाइल में दिखाया गया। अब सवाल उठता है कि आखिर शव की तस्वीर हार्ड काॅपी में जो कि निश्चित तौर पर नियमतः पुलिस ने खींची होगी, उन्हें क्यों नहीं दिखाई?

वहीं मोबाइल में उन्हें जो तस्वीर दिखाई गई उसमें चेहरे और छाती पर घाव के निशान नहीं थे। जबकि जो शव उनको दिया गया उसकी छाती और चेहरे के चीथड़े उड़े हुए थे। आखिर यह कैसे सम्भव है? वहीं यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जब तस्वीर और शव में इतने अंतर्विरोध हैं तो फिर शव का डीएनए टेस्ट क्यों नहीं करवाया गया? इससे यह साबित हो जाता कि वह शव जमशेद शेख के बेटे का नही था। एनआईए अब तक इस नौजवान का दूसरा नाम बता रही थी लेकिन 1 माह 10 दिन बाद उसका नाम करीम शेख बताया जाना पूरी कहानी को संदिग्ध बना देता है। करीम बर्दवान से 60 किलोमीटर दूर किरनहार का रहने वाला है जबकि पुलिस मुखबिर के मुताबिक मरने से पहले घायल ने उसे अपना गांव नैरोडिगी बताया था।

वहीं, इस घटना में मारे गए दूसरे व्यक्ति, जिसे एनआईए शकील अहमद बता रही है की पहचान के लिए घर के मकान मालिक से शिनाख्त क्यों नही करवाई गई? इसी तरह इस घटना में घायल और अब गिरफ्तार अब्दुल हकीम के पिता शाह जमाल तक से उसकी शिनाख्त नहीं करवाई गई कि वास्तव मे वह कौन है? वहीं एनआईए की जांच पर सबसे बड़ा सवाल तो पुलिस के मुखबिर परवेज खान का सार्वजनिक हुआ यह बयान लगा देता है जिसमें उसने कहा है कि विस्फोट में घायल व्यक्ति को, जिसे पुलिस करीम शेख बता रही है, ने  उसे अपना नाम स्वपन मंडल बताया था। यह नाम अखबारों में भी छपा था। जिसके तत्काल बाद पुलिस ने यह प्रचारित किया कि मरने से पहले उसने अपना नाम सुभान मंडल बताया था। परवेज का यह बयान भी महत्वपूर्ण है कि घायल व्यक्ति जो बाद में मर गया और जिसे करीम बताया जा रहा है, का खतना नहीं हुआ था। जबकि करीम के घर वालों के मुताबिक बचपन में ही उसका खतना हो चुका था। इन तथ्यों के आने के बाद और परवेज के इन बयानों के मुताबिक कि पुलिस ने उसे चुप रहने की हिदायत दी थी, यह आशंका और प्रबल हो जाती है कि इस घटना को राष्ट्रीय खुफिया-सुरक्षा एजेंसियों और संघ परिवार ने मिल कर करवाया है।

यही नहीं, खुफिया एजेंसियों ने रणनीतिक तौर पर इसमें बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की हत्या का झूठा प्रचार करके बांग्लादेश से भी अपनी जांच के पक्ष में बयान ले लेने की रणनीति बनाई ताकि उसकी भूमिका पर कोई सवाल ही न उठे। जिस अमजद शेख उर्फ काजल को इस घटना से जोड़ कर गिरफ्तार करने का दावा किया जा रहा है उसे स्वयं उनके पिता एनआईए के पास ले कर गए थे क्योंकि पुलिस ने उनसे कहा था कि वह उनके बेटे से कुछ पूछताछ करना चाहती हैं।

कुल मिलाकर, बर्द्धवान विस्फोट के बाद लगातार घटना और उसकी जांच पर उठते सवालों के बावजूद, तथ्यात्मक न होकर भावावेश में एक समुदाय के खिलाफ जो माहौल बनाया गया वह खतरनाक है। आतंकी गतिविधियां कराने, आतंकवाद के नाम पर फर्जी मुठभेड़ करने वालों को बचाने में संघ परिवार के करीबी अजीत डोभाल पहले से सक्रिय रहे हैं और उन्होंने इशरतजहां फर्जी मुठभेड़ के मास्टरमाइंड राजेन्द्र कुमार को भी बचाने का काम किया है। इससे साबित हो जाता है कि खुफिया एजेंसियां एक खास रणनीति के तहत बेगुनाहों को फंसाने में लगी हैं।

बात यहीं तक सीमित नही है। राॅ की हिन्दुत्ववादी मानसिकता जो कि मुसलमानों को आतंकी साबित करने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने में माहिर मानी जाती है, पर इससे पहले भी गंभीर सवाल उठे हैं। हिन्दुत्ववादी संगठनों पर उत्तर प्रदेश की कचहरियों में हुए धमाकों, समझौता एक्सप्रेस, मालेगांव समेत कई जगहों पर आरोप लगे हैं। बर्द्धवान में हुए विस्फोटों के बाद केन्द्र की राजग सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार में आरोप प्रत्यारोप के बीच जिस तरह से एनआईए की कार्यशैली पर भी सवाल उठे हैं, उसने साफ कर दिया है कि अब आतंकवाद की घटना की जांच नहीं बल्कि उस पर राजनीति हो रही है। इस राजनीति की शिकार आम जनता हो रही है। जब एनआईए की जांच पर गंभीर सवाल हीं नही बल्कि फर्जी घटना बनाने और उसे अंजाम देने का आरोप सामने आया है, वह इस मामले की जांच कैसे कर सकती है? अब समय आ गया है कि खुफिया, सुरक्षा एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। इसके साथ ही इस मामले की निष्पक्ष न्यायिक जांच हो। यही लोकतंत्र के हित में होगा। क्या नरेन्द्र मोदी इसका साहस करेंगे?

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