काले धन के अनसुलझे रहस्य

12:00 am or December 22, 2014
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– मनोरमा शर्मा डोबिरियाल, राज्यसभा सांसद –

काला धन पिछले कुछ सालों से एक रहस्य बना हुआ है। यह वही अनसुलझा रहस्य है जिसने भारतीय राजनीतिक क्षेत्र में एक भूचाल ला दिया है। इसी के बलबूते ही वर्तमान सरकार अपनी सत्ताधारी स्थिति तक पहुंची है। इस समय प्रधानमंत्री पदधारी मोदी ने 16वें आमचुनाव की रैलियों में अपने कार्यकाल के 100 दिन के अन्दर ही काले धन की वापसी और इसी के सहारे भारत एवं भारतीयों के अच्छे दिन लाने का वायदा किया था। आमचुनाव में जीत के बाद मोदी सरकार ने जीत के जश्न और जनता से किये गये चुनावी वादे के दबाव में आकर काले धन को लेकर जल्द से जल्द वाहवाही लूटने के लिए एसआईटी का गठन तो कर दिया लेकिन यह भारत एवं भारतीयों का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि मोदी कार्यकाल के 6 माह गुजर जाने के बाद भी काला धन नहीं आ सका। काला धन लाने की बात तो दूर की रही यहां तो यह भी नहीं पता लगाया जा सका कि हमारे देश की कितनी धनराशि विदेशी बैंकों में काले धन के रूप में जमा है। विभिन्न संगठनों एवं एजेन्सियों द्वारा अटकलबाजी और संभावनाओं के आधार पर समय समय पर काले धन से सम्बन्धित अलग-अलग तथ्य एवं आंकड़े पेश किये जाते रहे हैं, पर कोई भी पुख्ता सबूत अभी तक सामने नहीं आ पाया। अभी ग्लोबल फाइनेंस इंटीग्रिटी ( जीएफआई) नामक एक अन्तर्राष्ट्रीय अमेरिकी शोध एजेन्सी ने दुनिया के कई प्रमुख देशों के विदेशों में काले धन के प्रवाह पर केन्द्रित एक सूची जारी की है जिसमें भारत को चीन और रूस के बाद तीसरे पायदान पर रखा गया है। यानी की विदेशों में काला धन जमा करने की होड में भारतीय विश्व में तीसरे नंबर पर शामिल हैं। जीएफई के ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2003 से 2012 के दशक में भारत से 429.59 अरब डॉलर यानी 28 लाख करोड़ रुपए का काला धन देश से बाहर गमन किया गया है। यही नहीं केवल 2012 में ही 94.76 अरब डॉलर यानी छह लाख करोड़ रुपए का गमन हुआ है। अभी कुछ महीने पहले ही स्विट्जरलैंड के सेंट्रल बैंक ने खुलासा किया था कि वहां के बैंकों में जमा भारतीयों के धन में गत एक वर्ष के दौरान ही 40 फीसदी का इजाफा हो गया है। इसके पहले 2013 में पेश की गई विकासशील देशों की अवैध वित्तीय प्रवाह की रिपोर्ट के मुताबिक अवैध धन के मामले में भारत साल 2002-2011 के बीच पांचवे स्थान पर रहा । इस दौरान ये रकम 343.04 बिलियन अमेरिकी डाॅलर रही वहीं साल 2011 में 84.93 बिलियन डाॅलर काला धन देश से बाहर भेजने के बाद भारत तीसरे नंबर पर आ गया। ये वे आंकडे हैं जो अपने बलबूते भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत को सुधारने की क्षमता रखते हैं। दरअसल 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था को हष्टपुष्ट करने की जिस मंशा के साथ उदारीकरण को अपनाया गया था उस पर काले धन के अबाध प्रवाह ने पूरी तरह से पानी फेर दिया। उदारीकरण के 2 दशक बाद भी भारत में गरीबी, भुखमरी, कुपोषण जैसी गम्भीर समस्याओं के लिए निश्चय ही काफी हद तक काला धन उत्तरदायी है। आज यदि काले धन को भीषण आर्थिक समस्या की संज्ञा दी जाती है तो वह जायज है लेकिन इस समस्या से निपटने के उपाय भी ढूढना जरूरी है। यदि यह समस्या केवल आर्थिक होती तो शायद सुलझ भी सकती है पर यह राजनीति से भी तालुकात रखती है। ऐसा लगता है कि राजनीतिक लोग इसे केवल चुनावी मुद्दे तक ही सीमित रखना चाहते हैं। यदि ऐसा न होता तो काले धन के मसले पर पूर्ववर्ती सरकार और उसकी नीतियों को पानी पी पीकर कोसने वाली मोदी सरकार आखिर इस दिशा में कठोर कदम क्यों न उठाती। आपको याद होगा कि कुछ दिन पूर्व वित्तमंत्री महोदय ने यह कहकर भारत की जनता को बरगलाने की कोशिश की थी कि यदि काले धन का काला चिट्ठा खोल दिया तो कांग्रेस शर्म के मारे मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेगी। लेकिन मेरा उनसे सबसे बडा सवाल यह है कि प्रत्येक मसले पर कांग्रेस से कटुता रखने वाली भाजपा की सहानुभूति इस मसले पर कांग्रेस के साथ क्यूं? कहीं ऐसा तो नहीं कि काले धन के चिट्ठा खुलने पर भाजपा को ही काले कपडे में मुंह छिपाना पडे और वह इसी डर से अपने उजूल फिजूल बयानों के द्वारा जनता का ध्यान इस मसले से भटकाना चाहती हो। सत्तासीन होने से लेकर अब तक इस दिशा में मोदी सरकार द्वारा की गई गतिविधियों पर यदि नजर डाले तो उनकी कथनी और करनी में साफ अन्तर नजर आता है। वह तो अभी भी इस क्षेत्र में अपनी नकामयाबी के लिए पूर्ववर्ती सरकार को ही जिम्मेदार ठहरा रही है। जब यूपीए सरकार काले धन की वापसी में अन्तर्राष्ट्रीय कानूनी दांवपेचों को बाधक बताती थी तो विपक्ष में बैठी भाजपा उस पर जमकर प्रहार करती थी लेकिन आज भाजपा उन्हीं कानूनी दांवपेंचों की आड में बचना चाह रही है। जब भाजपा के अन्दर काला धन वापस लाने का सामर्थ नहीं था तो उसने जनता से झूठा वादा क्यों किया? ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि स्विटजरलैण्ड की सरकार से नामों को सार्वजनिक न करने की शर्त पर काले खाताधारकों की सूची भारत को सौंपी थी। यदि ऐसा होगा तो काले धन की वापसी कभी भी सम्भव नहीं हो सकेगी। क्योंकि इसके बाद स्विटजरलैण्ड की सरकार इससे सम्बन्धित कोई भी जानकारी भारत के साथ साझा नहीं करेगा और न ही वहां जमा भारतीयों का काला धन वापस भेजेगा। अभी काले धन के लिए गठित विशेष जांच समित ने भी यह बताया कि उसे जिन 627 खाताधारकों के नाम सौंपे हैं उनमें से 289 के खाते में एक भी रूपया जमा राशि के रूप में नहीं है। इन सब के बावजूद शीतकालीन सत्र के प्रारम्भिक दिनों में जब विपक्ष ने सरकार से शीतकालीन सत्र में इससे सम्बन्धित सवालों के जवाब मांगे तो उसने जवाब देने के बजाय विपक्ष पर संसदीय सत्र को बाधित करने का आरोप मढ दिया और वित मंत्री ने फिर से आश्वासन का झुनझुना थमा दिया। अब जनता मोदी से सीधे जबाव चाहती है कि मोदी जी आखिर काला धन भारत कब वापस आयेगा क्योंकि अब सिर्फ आश्वासनों से काम चलने वाला नहीं है।

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