क्या बीजेपी के मुस्लिम नेताओं की होगी घर वापसी ?

3:13 pm or December 29, 2014
ghar wapsi

– विवेकानंद –

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू जागरण मंच और इस तरह के वे तमाम संगठन जो धर्म परिवर्तन के खिलाफ सख्त कानून की मांग कर रहे हैं, उनका समर्थन किया जाना चाहिए। बशर्ते इसका इस्तेमाल अल्पसंख्यकों को प्रताडि़त करने के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल न किया जाए। दूसरी बात, इन तमाम संस्थाओं, संगठनों का कहना है कि भारत में 90 फीसदी लोग हिंदू हैं, अधिकतर जो आज मुसलमान हैं उनके पुरखों को कालांतर में डरा धमका कर मुसलमान बनाया गया था, इसलिए उनकी घर वापसी में कोई बुराई नहीं है। इनके इस इतिहास ज्ञान का भी समर्थन किया जाना चाहिए बशर्तें बीजेपी में शामिल मुस्लिम नेताओं की जांच पड़ताल करके उनकी भी घर वापसी कराई जाए। लेकिन….यह कतई संभव नहीं है इसलिए जो धर्मांधता पैदा करने वाले बयान आ रहे हैं उनको गहराई से समझने और उनकी आड़ में धर्म परिवर्तन को लेकर कड़े कानून की मांग के मर्म को समझने की जरूरत है।

पिछले दिनों संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि जवानों की जवानी जाने से पहले देश को हिंदू राष्ट्र बना दिया जाएगा। मोहन भागवत ने कहा कि लोगों के देखते-देखते हिंदू राष्ट्र बनाने का सपना पूरा हो जाएगा, अब इसमें ज्यादा देर नहीं है। मोहन भागवत ने यह भी कहा कि हिंदू समाज अब जाग गया है और किसी को डरने की जरूरत नहीं है। इस बयान से साफ है कि सरकार हमारी है जो जी में आए करो आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। दूसरे शब्दों में देश के कानून को सीधे-सीधे चुनौती। उन्होंने यह भी कहा, हम किसी का परिवर्तन नहीं करते, भूले भटकों को वापस लाते हैं। हमारे ऐसे ही गए थे। लोभ-लालच से लूट लिए गए। हमारा माल लूट लिया गया है, हम अपना माल वापस ले रहे हैं। किसी को क्या दिक्कत है? आपको पसंद नहीं है तो कानून लाओ।

मान लेते हैं कि हिंदुओं को लूटा गया, डरा धमका का हिंदू भी बनाया गया, लेकिन सवाल यह है कि यह साबित कैसे होगा कि जो लोग मुसलमान हैं कालांतर में उनकी पीढिय़ां हिंदू ही थीं, दूसरी बात उन्हें डरा धमकाकर ही मुसलमान बनाया गया था और तीसरी बात कि आप जिसे घर वापसी कह रहे हैं वह पूरी ईमानदारी से उन्हीं लोगों की करा रहे हैं जो घर वापस आना चाहते हैं या फिर उन्हें लालच दिया जा रहा है धमकाया जा रहा है। इन सवालों के जवाब मिलना बेहद जरूरी है। लेकिन महज सात महीने हुए प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी जी विपक्ष के सवालों के जवाब तक नहीं देना चाहते। ईमानदारी और बेईमानी तो दूर की बात है। ऐसा लगता है कि चुनाव प्रचार में भ्रामक बातें कर करके सत्ता पाई और अब सत्ता में रहकर भी झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। कभी आरएसएस कहा करता था कि हमारा बीजेपी से कोई लेना देना नहीं है, जबकि पार्टी के हर काम में उसका दखल रहता था। अंतत: कलई खुल गई। बीजेपी के सत्ता में आते ही स्वयं सेवक सत्ता की मलाई खाने सत्ता सकेत में पहुंच गए। आज धर्म परिवर्तन पर बीजेपी कह रही है कि संघ और उसके सहयोगी संगठन क्या कर रहे हैं उससे पार्टी का कोई लेना देना नहीं है।

पिछले दिनों एक खबर आई थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धर्मांतरण के कार्यक्रमों से दुखी होकर पीएम पद तक छोडऩे की धमकी दे डाली। चलिए यह मान लेते हैं कि प्रधानमंत्री जी विकास के एजेंडे की जगह धर्मांतरण को आगे लाने पर नाराज हैं। तो फिर इस्तीफा दे क्यों नहीं देते, क्योंकि उनकी धमकी के बाद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, विश्व हिंदू परिषद और हिंदू जागरण समिति सभी संगठनों के नेताओं के बयान तो रुक नहीं रहे हैं। यदि पीएम इस्तीफा नहीं देते हैं तो यही माना जाएगा कि या तो उनकी धमकी खोखली थी या फिर यह खबर जानबूझ कर मोदी को महान बनाने के लिए बीजेपी ने फैलाई थी। आरएसएस और बीजेपी लगातार कह रहे हैं कि धर्मांतरण रोकना है तो इसके खिलाफ कानून बनाया जाना चाहिए। मान लिया कि कानून बनाना चाहिए लेकिन सवाल यह है कि यह सब सत्ता में आने के बाद क्यों? चुनाव प्रचार के दौरान तो कभी यह नहीं कहा गया कि सत्ता में आने पर हम घर वापसी के कार्यक्रम बड़े पैमाने पर चलाएंगे और यदि इसका विरोध किया गया तो धर्मांतरण के विरुद्ध कानून की मांग करेंगे। या फिर सत्ता में आने के बाद हम धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून बनाएंगे। वास्तव में धर्मांतरण के विरुद्ध नए कानून की कोई जरूरत ही नहीं है। देश के संविधान के जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ पहले से ही प्रावधान हैं, बस उन्हें लागू करने की आवश्यकता है। मोदी जिन सरदार पटेल को लेकर चुनाव से पहले राजनीति करते रहे हैं उनकी कसमें खाते रहे हैं, उन्हीं पटेल ने 22 अप्रैल 1947 को संविधान सभा में मौलिक अधिकारों और अल्पसंख्यकों के मुद्दों से जुड़ी सलाहकार समिति के चेयरमैन की हैसियत से कहा था कि मौजूदा कानूनों के मुताबिक भी धर्मांतरण एक कानूनी अपराध है। पटेल का साफ मत था कि कल कानून बनाने वाले लोग ये कह सकते हैं कि तुम्हारे पास कोई अधिकार नहीं है।

बहरहाल हिंदुत्व के गुब्बारे में भरी जा रही हवा का रहस्य अगर अभी नहीं तो जल्दी ही खुल जाएगा। किसी न किसी रूप में मोदी सरकार को इसकी सफाई देनी ही होगी। अगर यह सब उनकी मौन स्वीकृति से हो रहा है, तो यह भी स्पष्ट हो जाएगा। क्योंकि केंद्र सरकार का अहंकार मनमानी के रूप में भी सामने आने लगा है। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने जब यह कहा था कि वे प्रधानमंत्री नहीं बल्कि प्रधान सेवक हैं तो सारा देश गद्गद हो गया था। लेकिन चंद रोज में ही नकाब उतर चुका है और असलियत सामने आ चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने सामने विपक्ष को इतना बोना समझते हैं कि वे धर्मांतरण पर उसके सवालों के जवाब देने राज्यसभा में नहीं आते और आते ही हैं तो जवाब नहीं देते। यह जनता के प्रधान सेवक होने का नहीं अहंकार तानाशाही का प्रमाण है। प्रधानमंत्री देश में घटने वाली हर घटना जो जन समुदाय को प्रभावित करती हो, उसके प्रति उत्तरदायी होते हैं और उन्हें विपक्ष के माध्यम से ही इसका जवाब जनता को देना ही चाहिए। ऐसा न करना ही तानाशाही का प्रमाण है।

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