धार्मिक कट्टरता पर दृष्टिपात का समय

3:40 pm or December 29, 2014
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– वीरेन्द्र जैन –

कट्टरता किसी भी तरह की हो, लोकतंत्र विरोधी होती है। वह दूसरों के विचारों को सुनना भी पसन्द नहीं करती। हमारे देश में जन्मे दो एक दर्शनों को छोड़ कर धार्मिक कट्टरता बहुत प्राचीन, संगठित और हिंसक रही है। दुनिया का इतिहास और पुराण इसी कट्टरता से जन्मी हिंसा की कहानियों से भरे पड़े हैं। यह हिंसा, जन्मजात प्रवृत्ति नहीं होती है इसलिए धार्मिक संगठन धर्म रक्षा के नाम पर इसे सिखाते रहे हैं। खेद की बात है कि इस लोकतांत्रिक समय में भी कुछ लोग इसमें भरोसा रख रहे हैं और सूचनाओं के विस्फोट वाले इस युग में अलग से पहचाने भी जाने लगे हैं।

पिछले दिनों इराक और सीरिया में आईएसआईएस द्वारा इस्लाम के ही दूसरे पंथ के लोगों की नृशंश हत्याओं के बाद पूरी दुनिया में इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग एकदम से असमंजस की स्थिति में आ गये हैं। यही हाल अभी पाकिस्तान के पेशावर में तालिबानों द्वारा फौज़ियों के मासूम मुस्लिम स्कूली बच्चों की हत्या के बाद भी हुआ। सोशल मीडिया पर एक धर्म के जो लोग किसी घटना पर इकतरफा पक्ष लेने लगते थे वे हतप्रभ थे और पूरी घटना को मानवीय दृष्टि से देखने लगे थे। यही हाल कुछ दिनों पहले आसाराम बापू समेत दूसरे कई धर्म गुरुओं के अवैधानिक काम सामने आने के बाद भी हुआ था। पिछले दिनों बाबा रामपाल द्वारा आर्यसमाज के प्रवर्तकों के खिलाफ उसी तेवर से कोई पुस्तक लिखी गयी थी जिस तेवर के साथ आर्य समाज की सत्यार्थ प्रकाश में दूसरी मान्यताओं के विरोध में लिखा गया है। इससे नाराज होकर कट्टर आर्यसमाजियों ने रामपाल के करोंथ स्थित आश्रम को घेर लिया था और उस आश्रम से भी वैसे ही कट्टरपंथियों ने उसी तेवर में हिंसा से जबाब भी दिया था, जिससे कुछ लोगों की मौत भी हो गयी थी। हाल ही में बरवाला में घटित घटनाक्रम उसी का विस्तार था, जिसमें देश के करोड़ों रुपये बर्बाद हो गये। हमारे आसपास भी नितप्रति ऐसी घटनाएं घट रही हैं जो अन्धश्रद्धा के प्रति चौंका रही हैं। ऐसा लगता है कि दुनिया धार्मिक विश्वासों की ओट में अपना काला धन्धा चलाने वालों से सतर्क होने लगी है। हाल ही में सुप्रसिद्ध लेखक गीतकार गुलजार ने पेशावर की घटना से मर्माहत होकर धर्म के नाम पर पल रहे आतंकवाद के बारे में कहा था कि धर्म अब एक्सपायरी डेट की दवा हो चुका है और उसे बदलने की जरूरत है। चर्चित गीतकार नीरज ने तो वर्षॉं पहले आवाहन किया था- अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाये, जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाये।

कुछ दिनों पहले इसी अन्ध आस्था के खिलाफ दबे स्वर में कुछ कहने वाली फिल्म ‘ओह माई गाड’ आयी थी। उस फिल्म की व्यावसायिक सफलता और समालोचकों द्वारा की गयी प्रशंसा से आभास मिलता था कि देश की जनता धर्मों के पाखंडों से पीड़ित होकर किस दिशा में सोच रही है। इसी विचार का विस्तार लेकर राजकपूर की परम्परा के सुप्रसिद्ध फिल्म निर्माता व अभिनेता आमिरखान की नई फिल्म ‘पीके’ आयी है जो अधिक मुखरता के साथ धर्म के नाम पर व्यवसाय करने वाले व मन्दिर बनवाने के नाम पर धन जोड़ने वाले बाबाओं की चालाकियों को सामने लाती है। उल्लेखनीय है कि ‘ओह माई गाड’ फिल्म का विरोध बिना सोचे समझे लोकसभा में भाजपा की तत्कालीन नेता सुषमा स्वराज ने किया था पर वे उस फिल्म को प्रतिबन्धित कराने या समाज में बड़ा प्रतिरोध खड़ा करने में सफल नहीं हुयी थीं। सुषमा जी भाजपा के एक पक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद की प्रबल दावेदार रही हैं किंतु उन्हें सफलता हाथ नहीं लगी। हमारे आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भले ही गुजरात की सड़कों पर कुकरमुत्तों की तरह उग आये सैकड़ों धर्मस्थलों को तुड़वा दिया हो, और आसाराम बापू को भाजपा के एक वर्ग का समर्थन मिलने से रोक दिया हो, किंतु वे भी गुजरात में दीना नाथ बतरा की अवैज्ञानिक सोच की किताबें बयालीस हजार स्कूलों में पढवाये जाने के दोषी हैं। उनके ही मंत्रिमण्डल के मंत्री वैंक्य्या नायडू सदन में दीननाथ बतरा को विद्वान व्यक्ति बताते हुए उनकी पक्षधरता करते नजर आते हैं। श्री मोदी ने मुकेश अम्बानी के एक अस्पताल के उद्घाटन के समय पुराण कथाओं से प्रसंग उठाकर जो बतरानुमा बातें कहीं उससे वह पूरी युवा पीढी हतप्रभ रह गयी थी जिसने उनके आधुनिक विकास की बातों पर देश और विदेश में उनका समर्थन किया था। स्मरणीय है कि कभी गणेश की मूर्तियों को दूध पिलाने वाले तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पोखरण के परमाणु विस्फोट के अवसर पर लाल बहादुर शास्त्री के नारे जय जवान- जय किसान को विस्तार देते हुए, जय जवान – जय किसान – जय विज्ञान का नारा दिया था। बाद में उनके कार्यकाल में वे विज्ञान के लिए कुछ नहीं कर पाये थे उल्टे विश्व विद्यालयों में ज्योतिष की पढाई होने लगी थी व अस्पतालों में मंत्र चिकित्सा विभाग स्थापित करने की बात होने लगी थी।

आज भले ही अन्ध आस्था विरोधी समाज संगठित न होने के कारण धर्मों के साधन सम्पन्न संगठित गिरोहों और उनके सत्ता के साथ अपवित्र गठबन्धन से मुकाबला न कर पा रहा हो किंतु पुणे में गत वर्ष अन्ध आस्था विरोधी डा. नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या से संकेत तो मिलते हैं कि अन्धविश्वासों का व्यवसाय करने वाले लोग कितने भयभीत हैं। पहले ही हज़ यात्रा के लिए अनुदान देने वाले धर्म निरपेक्ष देश में भाजपा शासित राज्य सरकारी खर्च पर तीर्थ यात्राएं कराने लगे हैं। रोचक यह है कि इन यात्राओं में शासक दल के कार्यकर्ता पर्यटन वाली मनोवृत्ति से इस सरकारी खैरात का लाभ उठा रहे हैं। रूढिवादी समाज के मुखियाओं द्वारा घृणित निर्मम हत्याओं की लम्बी श्रंखला से फैले आतंक के बाद भी युवाओं में अंतर्धार्मिक और अंतर्जातीय विवाह बढ रहे हैं। आज बहुत सारे धार्मिक संस्थान भंडारा या लंगर चला रहे हैं और प्रतिदिन लाखों लोगों को मुफ्त खाना खिला कर अपनी भीड़ बनाये हुए हैं। इन संस्थानों के आय के साधन गुप्त हैं या अवैध कमाई वालों से वित्तपोषित हैं, पर धार्मिक अस्थाओं से राजनीतिक हित साधने वाली सरकारें उन पर हाथ नहीं डालती हैं। अगर कभी कोई सरकार काले धन को बाहर निकालने के दबाव में आयी जिसकी सम्भावनाएं बढती जा रही हैं, तो इस काले धन के सूत्र पाखण्डियों के आश्रमों तक भी पहुँचेंगे और इनका साम्राज्य ढह जायेगा। नशे और हथियारों के अवैध कारोबार से कई आश्रम सीधे जुड़े हो सकते हैं। इन आश्रमों में अत्यधिक गोपनीयता और अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था सन्देह को जन्म देती है। जरूरत इस बात की है कि सभी धार्मिक संस्थाएं पारदर्शी हों और औद्योगिक घरानों की तरह उनकी आय व्यय का पूरा वार्षिक लेखा जोखा समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जाना अनिवार्य बनाया जाये। जब तक कोई विधिवत किसी धर्म समाज की सदस्यता न ले तब तक उस समाज के किसी नेता को उसका प्रतिनिधित्व करने या किसी भी तरह का प्रतिबन्ध लगाने का अधिकार न हो। बदलती परिस्थितियों में उम्मीद की जानी चाहिए कि धर्ममुक्त लोगों का एक ऐसा समाज अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा कर कथित धर्मिक नेताओं को सन्देश देकर कहेगा कि हमें माफ करो और अपना अलग रास्ता देखो। आज धार्मिक कही जाने वाली संस्थाएं और उनका नेतृत्व किसी न किसी सन्दर्भ से चर्चा में है और उस चर्चा से उनके प्रति जुगुप्सा ही जग रही है। वैज्ञानिक उपलब्धियों पर अधिक से अधिक निर्भर होती जाने वाली युवा पीढी जल्दी ही इन संस्थाओं को अलविदा कहने वाली है।

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