निरक्षर अब पंचायत के दरवाजों से बाहर

3:32 pm or January 2, 2015
निरक्षर अब पंचायत के दरवाजों से बाहर

–सुभाष गाताडे–

क्या किसी खेल के शुरू होने के पहले – जबकि सहभागी थमी सांसों से सीटी का इन्तजार कर रहे हों – उसके नियमों को रातोंरात बदलने की इजाजत दी जा सकती है ? अगर हम उपरोक्त खेल में सभी की समान सहभागिता सुनिश्चित करना चाहते हों, तो निश्चितही नहीं। विडम्बना यही है कि इस सीधीसी बात को सियासतदां अक्सर समझ नहीं पाते हैं या शायद समझना नहीं चाहते हैं।

सूबा राजस्थान, जहां अब पंचायत चुनावों का ऐलान होने को है, ख़बर आयी है कि अगर आप साक्षर नहीं है तो किसी भी स्तर पर चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। / देखें, इंडियन एक्स्प्रेस, 23 दिसम्बर 2014/ अगर आप गांव में सरपंच का चुनाव लड़ना चाहते हैं तो आप को कमसे कम आठवीं कक्षा तक पास होना चाहिए, अनुसूचित तबकों के लिए पांचवी कक्षा पास की सीमा निर्धारित की गयी है तो जिला परिषद एवं पंचायत समिति के चुनावों के लिए शैक्षिक योग्यता कमसे कम दसवीं पास होना है। पिछले दिनों राजस्थान सरकार ने इसे लेकर एक अध्यादेश जारी किया, जिसने राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 को रातोंरात बदल दिया है।

सरकार का तर्क यही है कि पंचायतों में लाखों रूपए का फंड आता है और अक्सर उसमें गबन की शिकायत आती है। ऐसे मामलों में तहकीकात करने पर चुने हुए प्रतिनिधि यही तर्क देते हैं कि चूंकि वह शिक्षित नहीं है, और इसीलिए किस कागज़ पर उनसे अंगूठा लगवाया गया इस बात को पहचान नहीं सके। उपरी तौर पर भले ही यह बात सुनने में अच्छी लगे, मगर इस प्रस्ताव में दो जबरदस्त दिक्कतें हैं।

एक अब राजस्थान सूबा देश का एकमात्रा सूबा हो गया है जहां अगर आप विधायक या सांसद का चुनाव लड़ना चाहते हों और निश्चित ही हजारों लाखों पंचायतों ही नहीं देश की बेहतरी के निकायों को सुशोभित करने का इरादा रखते हों तो आप के लिए किसी भी किस्म की शैक्षिक योग्यता की अनिवार्यता नहीं है। कहने का तात्पर्य अगर आप दस्तखत न कर पाते हों और महज अंगुठा लगा कर ही काम चलाते हों तो आप राजस्थान सेें विधानसभा सदस्य बन सकते हैं, यहां तक कि राजस्थान के किसी भी इलाके से चुने जाकर देश की संसद में विराजमान हो सकते हैं, मगर अपने गांव की पंचायत में आप प्रतिनिधि के तौर पर नहीं पहुंच सकते हैं।

दूसरे, यह प्रस्ताव इस हक़ीकत की अनदेखी करता है कि आज़ादी के बाद साक्षरता के मामलों में हुई तमाम तरक्की के बावजूद आज भी भारत में निरक्षरता का प्रमाण ज्यादा है, यहां तक कि निरक्षरों के मामलों में भारत अव्वल नम्बर पर है। और यह अनुपात अधिकाधिक बढ़ता जाता है, अगर आप किन्हीं वंचित उत्पीडि़त तबकों से ताल्लुक रखते हों। कहने का तात्पर्य इस नए कानून की सबसे अधिक मार अनुसूचित जातियों-जनजातियों- महिलाओं एवं अल्पसंख्यक तबकों पर दिखाई देगी। साक्षरता के मामले में भारत में जो जेण्डर विभाजन है, वह भी रेखांकित करनेलायक है। 2011 के जनगणना आंकड़ों के मुताबिक प्रभावी साक्षरता दर – सात साल और उससे बड़े – पुरूषों के लिए 82 फीसदी है तो महिलाओं के लिए 65 फीसदी है। अगर हम राजस्थान को देखें तो यही आंकड़ा पुरूषों के लिए 76.16 फीसदी और महिलाओं के लिए 45.8 फीसदी दिखता है, आदिवासी बहुल इलाकांे में तो यह दर 25.22 फीसदी तक पहुंचती है।

साक्षरता एक तरह से सामाजिक-आर्थिक प्रगति का परिचायक होता है और इसमें कोई दोराय नहीं कि आजादी के बाद इसमें जबरदस्त सुधार हुआ है, मगर आज भी हमारा मुल्क मानवीय विकास सूचकांकों के मामले में – जिनमें साक्षरता एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है – तीसरी दुनिया के देशों में नीचली कतारों में है। पड़ोसी बांगलादेश या ग्रहयुद्ध से निकला श्रीलंका तक भारत से इस मामले में आगे दिखता है। अनुमान यही है कि इसी रफतार से चलें तो सार्वभौमिक साक्षरता हासिल करने के लिए 2060 पहुंच सकता है, यह अलग बात है कि नवउदारवादी आर्थिक सुधारों के नाम पर सार्वजनिक कल्याण खर्चों में जो धडल्ले से कटौती की जा रही है, उसके चलते आलम यह है कि साक्षरता विकास दर घट रही है। 2001-2011 में नज़र आयी 9.2 फीसदी बढ़ोत्तरी उसके पहले के दशकों से कम बतायी जाती है।

उदाहरण के तौर पर देखें तो अभी चन्द माह ही बीते हैं जब राजस्थान सरकार ने स्कूली शिक्षा को ‘आर्थिक तौर पर व्यावहारिक एवं दीर्घकालीन’ बनाने के नाम पर पूरे राज्य में स्कूलों के आपसी संलयन के प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसके चलते 17 हजार से अधिक सरकारी स्कूल बन्द हुए हैं और दस लाख छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो चला है। पंचायत चुनावों में लड़ने की पात्राता को जिस तरह चुनावों के ऐन पहले अध्यादेश द्वारा घोषित किया गया, वही सिलसिला यहां पर भी दोहराया गया था। स्कूली सत्रा के मध्य में अर्थात अगस्त माह में ही वहां की सरकार ने यह ऐलान कर उत्पीडि़त एवं अल्पसंख्यक तबकों के लाखों छात्रों को मंझधार में छोड़ दिया। सरकार के इस तुघलकी फैसले के बाद पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज – जो मानवाधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध संगठन है – उसने पांच जिलों के 102 स्कूलों का सर्वेक्षण कर पाया था कि इन स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चों में से दस फीसदी बच्चों ने – इस संलयन/मर्जर के बाद – स्कूल जाना छोड़ दिया था, वजह दलित बहुल बस्तियों में चलनेवाले स्कूलों को वर्चस्वशाली जातियों के इलाकों में मिला दिया गया था, या लड़कियों के लिए घर से अधिक दूर जाना सम्भव नहीं था।

जाहिर है कि एक तरफ जहां कई राज्यों ने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के पचास फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की है, वहीं अब साक्षरता की योग्यता तय करके उसने आबादी के विशाल हिस्से – जिनका बहुलांश निश्चित ही वंचित उत्पीडि़त तबकों से आता है – के लिए उन्हीं दरवाजों को बन्द करने पर कानून की मुहर लगायी है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि समूचे दक्षिण एशिया में सत्ता के विकेन्द्रीकरण के अभूतपूर्व प्रयोग के तौर पर पंचायती राज के प्रयोग को नवाज़ा जाता रहा है। इस अदभुत प्रयोग ने अपने बीस साल पूरे किए हैं। उसकी समीक्षा में आम तौर पर एक तरफ जहां इसके अन्तर्गत विभिन्न स्तरों पर चुन कर जानेवाले 25 लाख से अधिक प्रतिनिधियों की चर्चा होती है, वहीं यह बात अभी भी उपेक्षित रहती आयी है कि जाति, जेण्डर, सम्प्रदाय और वर्गीय आधारों पर बंटे हमारे समाज की बनावट की आन्तरिक विसंगतियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता दिखता है। इस बात पर भी तमाम अध्ययन हो चुके हैं कि किस तरह वंचित, उत्पीडि़त तबकों से आनेवाले सदस्यों को कितने स्तर पर दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं, विषमतामूलक समाज में ऐसे लोगों को अपने कार्यनिष्पादन में किस किस्म की बाधा दौड़ का सामना करना पड़ता है।

और अब साक्षरता का पैमाना तय करके इस बाधा दौड़ को और मुश्किल बना दिया गया है।

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर अमत्र्य सेन ने कुछ समय पहले सामाजिक न्याय के विचार को किस तरह देखा जाना चाहिए इस पर रौशनी डाली थी। उन्होंने न्याय की प्रणाली केन्द्रित अवधारणा (arrangement focussed view of justice) और कार्यान्वयन केन्द्रित समझदारी (realisation focused understanding of justice)  के बीच फरक करने की बात कही थी। इस प्रक्रिया पर निगाह डालते हुए जहां न्याय को चन्द सांगठनिक प्रणालियां – कुछ संस्थाएं, कुछ नियमन, कुछ आचारसम्बन्धी नियम – जिनकी सक्रिय उपस्थिति यह दर्शाती है कि न्याय को अंजाम दिया जा रहा है, उन्होंने कहा कि यहां सवाल यह पूछे जाने का है कि क्या न्याय का तकाज़ा महज इसी बात तक सीमित है कि संस्थाएं और नियम दोनों सही हों ?

अन्त में, यह समझना जरूरी है कि मौजूदा राजनीतिक निज़ाम में सूबा राजस्थान कई मायनों में ‘पायोनियर’ अर्थात अगुआ समझा जा रहा है। उदाहरण के लिए यहीं पर श्रम कानूनों में बदलाव के फैसले राज्य सरकार ने लिए और वही सिलसिला केन्द्र में शुरू हुआ। तो क्या यह माना जाना चाहिए कि पंचायती राज कानून में राजस्थान में लाए गए बदलाव एक तरह से देश के अन्य मुल्कों में आजमाने की तैयारी चल रही है ?

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