भाजपा के सरकार में रहने के कश्मीरियों के लिए निहितार्थ

4:32 pm or January 10, 2015
Excelsior Rakesh

भाजपा के सरकार में रहने के कश्मीरियों के लिए निहितार्थ

राम पुनियानी–

जम्मू-कश्मीर में हाल (दिसंबर 2014) में हुए विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी को स्पष्ट जनादेश प्राप्त नहीं हुआ है। जहां पीडीपी अकेली सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, वहीं भाजपा, मतों का खासा हिस्सा प्राप्त कर, दूसरे स्थान पर रही। यह दिलचस्प है कि भाजपा को अधिकांश सीटें और मत, राज्य के हिंदू-बहुल जम्मू क्षेत्र से प्राप्त हुए। दोनों अन्य पार्टियां-नेशनल कान्फ्रेन्स व कांग्रेस-दुविधा में हैं। वे यह तय नहीं कर पा रही हैं कि वे सरकार बनाने के लिए किसे समर्थन दें।

भाजपा, संघ परिवार की सदस्य है और संघ परिवार का अंतिम लक्ष्य हिंदू राष्ट्र की स्थापना है। मोदी सरकार के पिछले छः महीनों के कार्यकाल में यह और साफ हो गया है कि हिंदू राष्ट्र की स्थापना के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए भाजपा और उसके साथी संगठन किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। इन दिनों वे समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने में जोरशोर से जुटे हुए हैं। भारतीय संविधान के मूल्यों के खिलाफ वक्तव्यों (गीता को राष्ट्रीय पुस्तक बनाया जाये, जो राम के पुत्र नहीं हैं वे हरामजादे हैं, गोडसे राष्ट्रवादी था), आक्रामक घरवापसी अभियान, ‘पीके‘ फिल्म का इस आधार पर विरोध कि वह लव जिहाद को प्रोत्साहन देती है आदि से यह स्पष्ट है कि भाजपा का पितृसंगठन आरएसएस, हिंदू राष्ट्र के निर्माण के प्रति प्रतिबद्ध है और भारतीय संविधान के मूल्य व धार्मिक अल्पसंख्यक, उसके निशाने पर हैं। इस पृष्ठभूमि में यह आंकलन आवश्यक हो गया है कि यदि भाजपा कश्मीर की सरकार का हिस्सा बनती है तो उसके कश्मीर व कश्मीरियों के लिए क्या निहितार्थ होंगे?

इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि हम कश्मीर के उथलपुथल भरे इतिहास पर एक नजर डालें। विभाजन के समय कश्मीर के महाराजा ने यह निर्णय लिया कि वे स्वतंत्र रहेंगे और पंडित प्रेमनाथ डोगरा जैसे ‘प्रजा परिषद‘ (भारतीय जनसंघ का पूर्ववर्ती संगठन) नेताओं ने कश्मीर के भारत में विलय का इस आधार पर विरोध किया कि चूंकि कश्मीर के शासक एक हिंदू (राजा हरिसिंह) हैं इसलिए उसे धर्मनिरपेक्ष भारत का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। कश्मीर पर पाकिस्तानी कबायलियों ने हमला कर दिया और भारतीय सेना के हस्तक्षेप के बाद कश्मीर के राजा ने भारत के साथ एक संधि पर हस्ताक्षर किए और भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 अस्तित्व में आया।

अनुच्छेद 370 के अंतर्गत, कश्मीर को एक विशेष दर्जा दिया गया और रक्षा, संचार, मुद्रा व विदेशी मामलों को छोड़कर, अन्य सभी मसलों में उसे पूर्ण स्वायत्तता दी गई। आरएसएस, कश्मीर को स्वायत्तता दिये जाने का विरोधी था। हिंदू महासभा के एक नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भारत और कश्मीर के बीच हस्ताक्षरित संधि का विरोध किया और यह मांग की कि कश्मीर का भारत में तुरंत पूर्ण विलय किया जाना चाहिए। उसी दौरान, भारत ने सांप्रदायिकता का घिनौना चेहरा देखा जब आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक और हिंदू महासभा के सक्रिय कार्यकर्ता नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी। इस बीच आरएसएस व हिंदू महासभा, अनुच्छेद 370 के विरूद्ध आक्रामक अभियान चलाते रहे। इस सब से कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला विचलित हो गए और उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कहना शुरू कर दिया कि कश्मीर ने भारत का हिस्सा बनकर शायद गलती की है। इस निर्णय का आधार, भारत का धर्मनिरपेक्ष चरित्र था और महात्मा गांधी की हत्या व आरएसएस के आक्रामक अभियान से अब्दुल्ला को ऐसा लगने लगा कि भारत में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का क्षरण हो रहा है। उन्होंने जब यह बात बार-बार कही तो उन्हें राष्ट्रद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। इससे कश्मीरियों के मन में भारत के प्रति अलगाव का भाव उभरा। आरएसएस अपना अभियान चलाता रहा और उसके दबाव के कारण, शनैः शनैः, कश्मीर की स्वायत्ता को कमजोर किया जाने लगा। इसका एक उदाहरण था कश्मीर के प्रधानमंत्री पद को मुख्यमंत्री व सदर-ए-रियासत को राज्यपाल का नाम दिया जाना।

कश्मीरियों में बढ़ते अलगाव की भावना का पाकिस्तान ने पूरा लाभ उठाया और अमरीका की सहायता से क्षेत्र में उग्रवाद को बढ़ावा व समर्थन देना शुरू कर दिया। सन् 1980 के दशक में, अल्कायदा के लड़ाकों ने कश्मीर में घुसपैठ कर ली और इसके साथ ही वहां के उग्रवाद ने सांप्रदायिक मोड़ ले लिया। मकबूल भट्ट को फांसी दिये जाने से हालात और खराब हो गये। कश्मीरी पंडित स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे और राज्य के हिंदुत्ववादी राज्यपाल जगमोहन की प्रेरणा व प्रोत्साहन से वे बड़ी संख्या में घाटी छोड़कर जाने लगे। इस मुद्दे का आरएसएस ने जमकर इस्तेमाल किया और इसे सांप्रदायिक रंग दे दिया। सच यह है कि कश्मीरियत वेदांत, बौद्ध धर्म और सूफी इस्लाम की मिलीजुली संस्कृति है। शेख अब्दुल्ला ने राज्य में व्यापक भू-सुधार किये थे और वे कश्मीर के समाज को प्रजातांत्रिक बनाने के प्रति प्रतिबद्ध थे।

लंबे समय तक चले उग्रवाद और भारतीय सेना की घाटी में उपस्थिति ने कश्मीरियों के घावों को और गहरा किया है। एक समय था जब आरएसएस यह मांग करता था कि जम्मू को एक अलग राज्य बना दिया जाए, लद्दाख को केन्द्रशासित प्रदेश घोषित कर दिया जाए और घाटी में से एक हिस्से को अलग कर उसे केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा देकर कश्मीरी पंडितों के लिए आरक्षित कर दिया जाए। ये बातें भाजपा भी कहती आई है लेकिन केवल तभी तक जब वह सत्ता में नहीं थी। परंतु इस तरह की मांग, पार्टी की साम्प्रदायिक विचारधारा की पोल खोलती है। इस चुनाव में भी भाजपा ने हिन्दू जम्मू विरूद्ध मुस्लिम घाटी का नारा देकर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण किया और उसके जरिए चुनाव में लाभ प्राप्त किया। यह साफ है कि भाजपा को चुनाव में सफलता, समाज को विभाजित कर मिली है। अमरनाथ यात्रा के मुद्दे का इस्तेमाल भी कश्मीरी समाज को ध्रुवीकृत करने के लिए किया गया। अपनी अवसरवादिता का बेहतरीन नमूना पेश करते हुए मोदी एण्ड कंपनी ने चुनाव प्रचार के दौरान अनुच्छेद 370 के बारे में गोलमोल बातें कहीं। जबकि इस मामले में उनका रूख स्पष्ट है।

कश्मीर में भाजपा को जनसमर्थन हासिल होना कश्मीरियत के लिए एक बड़ा झटका है। इससे अनुच्छेद 370 को रद्द करने के आक्रामक अभियान और हिन्दू राष्ट्र के एजेन्डे को गति मिलेगी। जिन भी अन्य राज्यों में भाजपा ने अन्य दलों के साथ मिलकर सरकारें बनाई हैं वहां का अनुभव यह रहा है कि पार्टी शुरू में तो एक सांझा कार्यक्रम के आधार पर सरकार बना लेती है परंतु बाद में धीरे-धीरे अपने सहयोगियों को कमजोर करती जाती है और अंततः सत्ता पर पूरा कब्जा कर लेती है। कश्मीर को आज जरूरत एक प्रतिनिधि सरकार की है जो संवैधानिक प्रावधानों का सम्मान करे और हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दे-एक ऐसी सरकार की, जो कश्मीर के इतिहास की बेशकीमती विरासत, कश्मीरियत, को जिन्दा रखे।

कश्मीर आज एक दोराहे पर खड़ा है। उग्रवादियों की हरकतों और सेना की ज्यादतियों के चलते घाटी के लोगों ने बहुत कुछ सहा है। अगर भाजपा कश्मीर में सत्ता में आती है तो राज्य में हालात और बिगड़ेंगे। राज्य की अगली सरकार को कश्मीरी पंडितों और कश्मीर के युवाओं की समस्याओं पर ध्यान देना होगा। उसे विकास का ऐसा मॉडल तैयार करना होगा जिससे युवाओं को रोजगार मिले, पंडितों की शिकायतें दूर हों, राज्य में शांति रहे और पर्यटक व वापस आएं। राज्य में साम्प्रदायिकता के बढ़ते ज्वार को नियंत्रित करना अति आवश्यक है। यदि राज्य में विभिन्न समुदायों में एकता और सद्भाव रहेगा तो अलगाववाद व उग्रवाद अपने आप समाप्त हो जाएंगे। इसके लिए यह जरूरी होगा कि नई सरकार समावेशी राजनीति करे न कि विघटनकारी और विभाजनकारी एजेन्डे को इस धरती के स्वर्ग पर लादे।

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