बीजेपी की अंग्रेज नीति

2:50 am or September 8, 2014
Adityanath

विवेकानंद

स्वाधीनता संग्राम में जब भारतवासियों ने जाति-पाति और धर्म संप्रदाय के भेद भुलाकर एक साथ अंग्रेजों से लोहा लिया तो फिरंगियों ने सबसे पहले उनकी एकता भंग करने के लिए हिंदू-मुस्लिमों में भेद का सहारा लिया। अंग्रेजों का यह फूट का फार्मूला यद्यपि दीर्घकाल तक काम नहीं आया लेकिन भारत पर अपनी सत्ता जमाए रखने के लिए अंग्रेजों का यह हथियार तत्कालीन वक्त में कारगर साबित हुआ। भारतीय आपस में बंट गए जो बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक हुए और अंग्रेजों को भारत से भागने में कामयाब भी हुए। बावजूद इसके वह गांठ बनी रही और अंतत: मोहम्मद अली जिन्ना की जिद के कारण नफरत की बुनियाद पर पाकिस्तान वजूद में आया।

क्या आज का माहौल तब से जुदा है…? मौजूदा परिप्रेक्ष्य के घटनाक्रमों को गहराई से देखें तो कह सकते हैं …नहीं। सत्ता में बने रहने के लिए बीजेपी अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति पर जस का तस अमल कर रही है। और सबसे ताज्जुब करने वाली बात यह है कि इतिहास में पन्नों में अंग्रेजों के गंदे प्रयास को पढ़कर उसे कोसने वाली जनता लगातार उसका शिकार हो रही है। लोकसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने कथित रूप से यह प्लान किया था कि हिंदुओं को एकजुट करो और मुसलमानों को बिखेर दो, इसका लाभ वोटों के रूप में मिलेगा। बीजेपी इसमें सफल रही।  कई बार लोग कहते हैं कि यदि बीजेपी हिंदुओं की बात करती है तो इसमें बुरा क्या है? बेशक इसमें बुरा कुछ नहीं है, लेकिन एक में दूसरे के प्रति भय पैदा करना, अपमानबोध उत्पन्न करना बुरा है। और हर बात पर बोलने वाले नेता जब इन मामलों पर वरिष्ठ नेताओं की चुप्पी साध लेते हैं तो संदेह पुख्ता होने लगता है कि जो हो रहा है वह सुनियोजित है।

वस्तुत: बीजेपी हिंदुओं में भय पैदा कर रही है, अपमानबोध पैदा कर रही है। कभी धर्म के नाम पर कभी परिवार के नाम पर। भय और अपमान लोगों को एकजुट कर देता है। लोकसभा चुनावों में बीजेपी नेताओं के बयानों को देखने से यह स्वमेव सिद्ध हो जाता है कि इस फार्मूले को कैसे आगे बढ़ाया गया और अब एक बार फिर उसी फार्मूले को आगे बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। उत्तरप्रदेश में जो हो रहा है, उसका संदेश पूरे राष्ट्र में न केवल फैल रहा है बल्कि आंशिक रूप से असर भी कर रहा है। हिंदू-मुस्लिम मामलों पर चर्चा के दौरान कितना भी उदारवादी व्यक्ति चाहे वह किसी भी संप्रदाय का हो, बात करते-करते एक बार संप्रदायी जरूर हो जाता है और उसे दूसरे समुदाय से ईष्र्या होने लगती है। कभी धर्म के नाम पर तो कभी परिवार के नाम पर और इसका श्रेय जाता है बीजेपी सरकार बनने के बाद आए भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व उसके आनुषांगिक संगठनों के नेताओं के बयानों को।

हाल ही में उत्तरप्रदेश के गोरखपुर से सांसद योगी आदित्यनाथ ने बयान दिया है कि जहां 10 प्रतिशत से अधिक मुसलमान हैं वहां पर दंगे होते हैं। हालांकि इस संबंध में हुई जांच पड़तालों में कोई भी तथ्य इस तरह का नहीं मिला है, लेकिन योगी का संदेश पूरे राष्ट्र में गया भी और चर्चा का विषय भी बना। आंकड़े भले ही योगी के दावे के खिलाफ हों, लेकिन योगी जो चाहते थे वे उसमें कामयाब रहे। वे शंका का जो बीज बोना चाहते थे उसे उन्होंने बखूबी बो दिया। योगी पांच बार से गोरखपुर से सांसद चुने जा रहे हैं, गोरखपुर में उनकी दबंगई जग जाहिर है। कई मामलों में तो वे गोरखपुर के नेता कम डॉन अधिक प्रतीत होते हैं। चूंकि इस बार यूपी की जिम्मेदारी योगी है, उप चुनाव में सबसे अधिक सीटें उत्तरप्रदेश से हैं इसलिए टारगेट उत्तर प्रदेश ही है। बारीकी से देखें तो उत्तर प्रदेश में वहीं-वहीं सांप्रदायिक तनाव देखने को मिल रहा है जिसके आसपास की सीटों पर उप चुनाव होना है। यूपी में अगले महीने विधानसभा की 11 सीटों और लोकसभा की एक सीट पर उपचुनाव होने वाले हैं। सरकारी आंकड़ों में 15 जून से 15 अगस्त के बीच उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक झड़प और तनाव की 657 घटनाएं हुई हैं। इनमें सबसे ज्यादा मुजफ्फरनगर में 54,  मेरठ में 39,  शामली,  मुरादाबाद और संभल में 32-32 घटनाएं हुई हैं। बुलंदशहर और सहारनपुर में 17-7 घटनाएं हुईं हैं। इन 657 में से 457 घटनाएं उन इलाकों के आसपास हुई हैं जहां विधानसभा उपचुनाव होने हैं। इसलिए यह साफ हो जाता है कि बीजेपी का एजेंडा क्या है और योगी का फार्मूला क्या है?

अब जरा योगी के उस दावे की भी आंकड़ों के आधार पर पड़ताल कर ली जाए जिसमें उन्होंने मुस्लिमों की संख्या को दंगों से जोड़ा है। प्रतापगढ़ में दंगे हुए जहां 14 फीसदी मुसलमान हैं। फैजाबाद और श्रावस्ती में 15-15 फीसदी, बरेली में 20 फीसदी,  आंबेडकरनगर में 21 फीसदी,  मुजफ्फरनगर में 30 फीसदी और मुरादाबाद में 30 फीसदी मुसलमान हैं। योगी ने शायद इसी आधार पर दावा कर दिया कि जहां 10 फीसदी से अधिक मुसलमान हैं वहां दंगे होते हैं। लेकिन यह कोरी कल्पना और क्षेत्र विशेष का माहौल बिगाडऩे का प्रयास है। क्योंकि यदि योगी का दावा सही होता तो इन स्थानों के अलावा और भी क्षेत्र में मुसलमानों की संख्या योगी के योग्य गणित से कहीं अधिक है और वहां दंगों के नामोनिशान नहीं है, क्योंकि वहां पर चुनाव नहीं है।

2011 की जनसंख्या के मुताबिक देश में 13.4 फीसदी मुसलमान हैं। देश में सबसे ज्यादा मुसलमान असम में 30.9 फीसदी हैं, पश्चिम बंगाल में 25.2 फीसदी,  केरल में 24.7 फीसदी और इसके बाद चौथे नंबर पर उत्तर प्रदेश आता है। यूपी में 18.5 फीसदी मुसलमान हैं। पांचवें नंबर पर बिहार है जहां 16.5 फीसदी मुसलमान हैं। पश्चिम बंगाल और बिहार में भी दंगों की घटनाएं सुनने में नहीं आतीं। देश में इस वक्त 13 करोड़ 80 लाख मुसलमान हैं। दरअसल यह बीजेपी का प्रपोगंडा है। शीर्ष नेता हिंदू मुस्लिम एकता और देश में सबके लिए समान अवसर की बात करते रहें और उनकी कोर इकाईयां देश के युवाओं में वैमनस्यता के बीज बोते रहें।

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