अधिक बच्चे पैदा करो, परिवार बढ़ाओ ? क्या स्त्रिायां बच्चा पैदा करने की फैक्टरी हैं ?

3:45 pm or January 23, 2015
Shivsena UP

—सुभाष गाताडे—

आज़ाद भारत के कर्णधारों ने भले ही हम दो हमारे दो की सलाह दी हो, मगर 21 वीं सदी की दूसरी दहाई में इसे लेकर नयी रार मचती दिख रही है। इनमें सबसे ताज़ातरीन नाम नवगठित आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्राी चंद्राबाबू नायडू का जुड़ा है, जिन्होंने अपने प्रदेश के विकास के लिए युवा जोड़ों को अधिक सन्तान पैदा करने की सलाह दी है।

बहरहाल इस बहस का फोकस बहुसंख्यक समुदाय पर अधिक केन्द्रित है। हिन्दुओं को कितने बच्चे पैदा करने चाहिए इसे लेकर आए दिन नए प्रस्ताव सामने आते दिखते हैं। अगर सांसद साक्षी महाराज ने चार बच्चे पैदा करने की हिमायत की थी, किन्हीं साध्वी प्राची ने पांच बच्चे पैदा करने का आग्रह रखा था तो इलाहाबाद के माघ मेले में बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य श्री वासुदेवानन्द सरस्वती ने 10 बच्चे पैदा करने पर जोर डाला है।

फिलवक्त इस बात की भविष्यवाणी तो नहीं की जा सकती कि यह सिलसिला कहां रूकेगा ? मगर इसे लेकर चन्द बातें जरूर कही जा सकती हैं:

सबसे अहम कि ऐसे प्रस्ताव स्त्रिायों को ‘बच्चा पैदा करने की मशीन’ से इतर कुछ नहीं समझते और समूचे समाज में आए इस बदलाव से बेखबर हैं कि अधिक बच्चों वाले परिवार अब इतिहास बन चुके हैं और आज की तारीख में स्त्राी दफतर, कारोबार सम्भालने से लेकर सत्ता की बागडोर सम्भालने तक आगे पहुंची है और ऐसा कोईभी प्रस्ताव उसे फिर एक बार दोयम दर्जे की स्थिति में पहुंचा देगा।

दूसरे कि ऐसे दावों में कोई मौलिकता नहीं है। अगर हम अपने हालिया अतीत पर निगाह डालें या सौ साल पहले के भारत को देखें तो कइयों की इसी किस्म की ‘चिन्ताओं से’ रूबरू होते हैं। उदाहरण के तौर पर विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल ने दस साल पहले हिन्दुओं को परिवार नियोजन त्यागने की सलाह दी थी ताकि ‘उनकी आबादी कम न हो।’ उनका मानना था कि ‘मुसलमानेां की आबादी इस कदर तेजी से बढ़ रही है कि आनेवाले पचास सालों में वह कुल आबादी का 25-30 फीसदी होगी।’

बहुत कम लोगों को याद होगा कि बीसवीं सदी की शुरूआत में किन्हीं जनाब यू एन मुखर्जी द्वारा लिखित एक किताब आयी थी ‘हिन्दू: ए डाईंग रेस अर्थात एक मरणासन्न कौम’। यह वहीं मुखर्जी थे जिन्होंने बाद में पंजाब हिन्दू महासभा का गठन भी किया। यह किताब इस मामले में क्लासिक कही जा सकती है कि उसने बाद की तमाम किताबों को प्रभावित किया, जिनकी रचना हिन्दू महासभा ने की थी। मोहन राव ‘हिमाल’ पत्रिका के अपने आलेख में बताते हैं कि ‘इस किताब की उन दिनों जबरदस्त मांग रही, जिसे कई बार पुनमुद्रित करना पड़ा, जिसने हिन्दू साम्प्रदायिकता को निर्मित करने में एवं मजबूती देने में अहम भूमिका निभायी। इस किताब का उच्च जाति के हिन्दू सम्प्रदायवादियों पर विशेष प्रभाव था जो मुसलमानों एवं दलितों से उठ रही अलग प्रतिनिधित्व की मांग के बरअक्स एक एकाश्म/मोनोलिथिक हिन्दू समुदाय को गढ़ना चाह रहे थे। मुसलमानों को लेकर अनापशनाप बातों को उछालने से विविध जातियों में बंटे हिन्दूओं को – जिनमें से कइयों के आपस में दुश्मनाना सम्बन्ध थे – एक मंच पर लाना आसान था।’

गौरतलब यह भी है कि जनसंख्या विमर्श का ऐसा रूप अन्य आस्थावानों में भी उजागर होता रहता है। अगर हम यहुदी, ईसाई, इस्लामिक या सिंहला मूलवादी/बुनियादपरस्त जनसंख्या विमर्शों को देखें तो उनमें भी हिन्दुत्व के जनसंख्या विमर्श के तत्व मिल सकते हैं। इस्लामिक बुनियादपरस्त ताकतें भी परिवार नियोजन का विरोध करती हैं, जिनका यह कहना होता है कि मुस्लिम दुनिया को कुन्द करने की यह यहुदियों-ईसाइयों की चाल है। मिस्त्रा का मुस्लिम ब्रदरहुड जैसा संगठन गर्भनिरोधक साधनों तक का विरोध करता है क्योंकि उसका मानना है कि इससे ‘अनियंत्रित स्त्राी यौनिकता’ को बढ़ावा मिलेगा जो इस्लामिक समाज के नैतिक ताने बाने को कमजोर कर देगा।

भारत के सन्दर्भ में बहुसंख्यकों को अधिक बच्चे पैदा करने चाहिए यह सोच एक तरह से इसी बात पर टिकी होती है कि ‘अन्य’ समुदाय यहां छा जाएंगे। ‘अन्यों’ के ‘‘छा’’ जाने को लेकर एक तरह का गढ़ा हुआ डर तीन पहलुओं पर टिका होता है। सबसे पहले, मुसलमानों के बारे में यह आरोप लगाया जाता है कि वे गर्भनिरोधक साधनों का इस्तेमाल न कर अधिक बच्चे पैदा करते जाते हैं ; दूसरे, मुस्लिम युवकों पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह ‘लव जिहाद’ चला कर हिन्दु लड़कियों, महिलाओं को प्यार के जाल में फंसाते हैं और उनका धर्मांतरण करते हैं और तीसरे, सीमा पार के जरिए हो रहे ‘‘जनसंख्यात्मक आक्रमण’’। इस तरह बगल के मुल्क बांगलादेश से यहां पहुंचनेवाला ‘‘गैरकानूनी प्रवासी’’ को ‘‘घुसपैठिया’’ करार दिया जाता है।

यह अलग बात है कि तथ्य इन दावों को खारिज करते हैं:

वर्ष 2001 की जनगणना के वक्त भारत की कुल 1.028 बिलियन आबादी में हिन्दुओं की तादाद 827 मिलियन थी (80.5फीसदी) जबकि मुसलमानों की संख्या 138 मिलियन थी (13.4 फीसदी)..1951 के बाद के जनगणना आंकडे, बताते हैं कि हर दशक में मुसलमानों की तादाद 1 फीसदी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत को मुस्लिम बहुल मुल्क बनने में इस रफ्तार से तीन सौ साल लगेंगे।’’ (आफ फिगर्स एण्ड इंडियन फेसिस्टस, रमण, www.truthdig.com½www

अगर हम 1990 के बाद के दशकों में जनसंख्या में बढ़ोत्तरी दर में आ रही घटोत्तरी को देखें तो यह पाते है कि हिन्दुओं की तुलना में मुसलमानों में यह घटोत्तरी अधिक है। उदाहरण के तौर पर, नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार हिन्दुओं के लिए सकल प्रजनन क्षमता/टोटल फर्टिलिटी रेट 1993-94 से 1988-99 के दरमियान 3.2 से 2.78 तक हुई जबकि मुसलमानों में यह 4.41 से 3.59 तक हुई। अर्थात हिन्दुओं में अगर यह फरक .52 था तो मुसलमानों में यही दर .82 था। अगर हम उच्च किस्म की जीवनशैली जी रहे मुसलमान परिवारों को देखें तो वहां टोटल र्फिटलिटी रेट में प्रतिशत कमी उसी कालखण्ड में हिन्दुओं की तुलना में अधिक थी।

अपने एक आलेख में जनसंख्या विशेषज्ञ मोहन राव (मर्डरस आइडेंटीटीज एण्ड पापुलेशन पेरोनोइया, हिमाल, सितम्बर 2008) इस एकांगी किस्म के नारे का विश्लेषण करते हुए कहते हैं

‘‘अन्य तमाम बातों के अलावा इसके जरिए यही कहा जा रहा है कि सिविल कानून के तहत जबकि हिन्दू एक से अधिक शादी नहीं कर सकते हैं जबकि मुस्लिम चार शादी कर सकते हैं। यह इस बात को उजागर नहीं करता कि आंकडे यही बताते हैं कि गैरकानूनी दो शादियां या कई शादियों का प्रचलन मुसलमानों की तुलना में हिन्दुओं में ज्यादा है। उदाहरण के तौर पर, उपलब्ध आंकडों के मुताबिक जिसे बहुपत्नीक शादी कहा जा सकता है उसका प्रतिशत हिन्दुओं में 5.8 है जबकि मुसलमानों में 5.73 है।..इसमें इस बात की भी अनदेखी की जाती है कि हिन्दुओं की तरह मुसलमान भी मोनोलिथ,समरूप समुदाय नहीं हैं, उनमें भी तरह तरह की विभिन्नताएं हैं। केरल और तमिलनाडु के मुसलमान या यूं कहें कि दक्षिण भारत के मुसलमानों के परिवारों की सदस्य संख्या उत्तर भारत के बिहार एवं उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के हिन्दु परिवारों के सदस्य संख्या की तुलना में कम पायी जाती है। स्पष्ट है कि इसमें धर्म की कोई भूमिका नहीं है।’

सीमित जानकारी एवं अन्तरसामुदायिक अन्तक्र्रिया के कम होते अवसर के चलते जो धारणाएं बनती हैं, उन्हें वास्तविक तथ्यों के जरिए प्रश्नांकित किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर ऐसे लोग जो समुदाय विशेष की अधिक प्रजनन क्षमता की बात करते हैं उन्हें मुस्लिम बहुसंख्यक मुल्कों से जुड़े कुछ तथ्य बताए जा सकते हैं:

इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली के एक आलेख में जनाब आर बी भगत ने लिखा था (फेक्ट एण्ड फिक्शन आन हिन्दुत्व क्लेम्स, सितम्बर 25, 2004)

‘ लोकप्रिय स्तर पर लोगों के लिए इस हकीकत पर गौर करना या उसे जज्ब़ करना मुश्किल जान पड़ता है जब उन्हें बताया जाता है कि बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी वाले इंडोनेशिया की प्रजननक्षमता (कुल प्रजनन क्षमता दर 2.6) की दर बहुसंख्यक हिन्दू आबादी वाले भारत की तुलना में (कुल प्रजनन क्षमता दर 3.2) कम है। दरअसल इंडोनेशिया में प्रजनन क्षमता में कमी को परिवार नियोजन पर कारगर अमल, जो मुल्क की स्वास्थ्यसेवाओं के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हैं, से जोड़ा जा सकता है। हाल के समयों में बांगलादेश में भी परिवार नियोजन के बढ़ते स्तर ने वहां की प्रजनन क्षमता को में काफी तेजी से कमी दिखाई दी।’’

प्रश्न उठना लाजिमी है कि जनसंख्या को लेकर मचायी गयी इस भ्रांति का क्या आधार है। यह बात आसानी से समझने लायक है। वह ‘हम’ और ‘वे’ की लामबन्दी का राजनीतिक मकसद हल करती है। भविष्य के बारे में डर और चिन्ता गढ़ कर, बहुसंख्यकवादी जनसंख्या विमर्श और एक घातक चीज को अंजाम देता है। वह नैतिक तौर पर आक्रामक नीतियों के प्रति लोगों के एक हिस्से की सहमति हासिल करता है।

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