जयंती नटराजन के पीछे कौन?

3:01 pm or February 4, 2015
jayanti natrajan

—राजेन्द्र चतुर्वेदी—

पूर्व केंद्रीय मंत्री जयंती नटराजन को अचानक ख्याल आ गया है कि करीब एक वर्ष पहले तो उनके साथ बहुत गलत हुआ था, तो यह महज संयोग नहीं है। यह भी संयोग नहीं है कि उनके द्वारा पांच नवंबर-2014 को सोनिया गांधी को लिखे गये पत्र ने भी लीक होने में करीब तीन महीने लग गये हैं। यह पत्र तो बहुत पहले लीक हो सकता था। होने को तो यह भी हो सकता था कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर उन्होंने जो आरोप अब लगाये हैं, वे करीब साल भर पहले लगाये जा सकते थे। मगर, जब जयंती अब बोली हैं, तो इसे उनकी अवसरवाद की राजनीति का ही एक उदाहरण माना जाना चाहिए।

दरअसल, जयंती नटराजन यह समझ रही हैं कि कांग्रेस तो अब गयी। उनकी यह समझ गलत है। आजाद भारत में ऐसे अनेक मौके आये, जब मान लिया गया कि कांग्रेस खत्म हो चुकी है, लेकिन हर बार यह पार्टी फिर उठ खड़ी हुई, चाहे बात 1970 के दशक की हो, जब देश में गैर-कांग्रेसवाद की सिद्धांतहीन राजनीति होने लगी थी और चाहे तब की, जब देश में मंडल-कमंडल की राजनीति अपने चरम पर थी। तब की तरह एक बार फिर कांग्रेस उठ खड़ी होगी। लेकिन जयंती नटराजन जैसे अवसरवादी और सत्ताप्रेमी लोगों का कांग्रेस छोडऩे के लिए इतना ही पर्याप्त है कि पार्टी 2014 का लोकसभा चुनाव हार गयी। इसके बाद हुये राज्य विधानसभाओं के कुछ चुनावों में भी उसका प्रदर्शन ठीक नहीं रहा।

वैसे तो मूल्यों सिद्धांतों की राजनीति हमारे देश में दुर्लभ होती चली जा रही है। राजनीतिक दलों का एकमात्र मकसद सत्ता हासिल करना है और जो सत्ता में होते हैं, वे उसमें बने रहने के लिए ही तमाम धतकरम करते रहते हैं। ठीक इसी तरह सत्ताप्रेमी नेता भी दिन-रात एक अदद कुर्सी पाने की कवायद में लगे रहते हैं। इसके लिए वे तरह-तरह की तिकड़में करते हैं, लेकिन जयंती नटराजन तो इसके लिये भी जानी जाती हैं कि जब कांग्रेस कमजोर होती है, वे उसे छोड़ देती हैं। 1990 के दशक में भी जब कांग्रेस कमजोर थी, तो वे उसे छोड़ गई थीं। बाद में जब पार्टी मजबूत हुई, तो वे उसमें फिर आ गयीं।

यह सही है कि उन्होंने भाजपा में जाने से इंकार किया है। चूंकि जिस तमिलनाडु से वे आती हैं, वहां भाजपा का न तो जनाधार है और न आगे हो सकता है। क्योंकि यह पार्टी हिंदूवाद की राजनीति करती है, कभी डंके की चोट पर तो कभी बहुत महीन तरीके से। हम जानते ही हैं कि समाज के मजहबी आधार पर ध्रुवीकरण की कोशिश लोकसभा चुनाव से बहुत पहले प्रारंभ हो गयी थी, जो इस समय भी चल ही रही है।
साधु-साध्वियों के नाना प्रकार के बयान, हिंदू कितने बच्चे पैदा करें, कितने न करें जैसी लफ्फाजियां और इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी समाज के ध्रुवीकरण का प्रयास ही माना जाना चाहिए।

गणतंत्र दिवस को जारी हुये केंद्र सरकार के विज्ञापन से संविधान की प्रस्तावना के दो शब्द, समाजवाद और पंथनिरपेक्षता गायब थे। यह भी ध्रुवीकरण का ही प्रयास माना जाना चाहिए। भाजपा का प्रयास यह होता है कि ऐसे गैर जरूरी मुद्दों पर कम से कम बहस तो शुरू हो, जिन्हें संघ के रणनीतिकार समाज में कांग्रेस के हिंदू विरोधी कार्यों की तरह प्रस्तुत करते रहे हैं।

दरअसल, संविधान की प्रस्तावना में यह दो शब्द 1976 में जोड़े गए थे, 42 वें संविधान संशोधन के जरिये। इसके आधार पर संघ के रणनीतिकार समाज में यह भ्रम फैलाते रहे हैं कि भारत तो 1947 में हिंदू राष्ट्र बन गया था, वह तो इंदिरा गांधी थीं, जिन्होंने 42 वें संविधान संशोधन के जरिये उसे पंथनिरपेक्ष राज्य बना दिया था। भाजपा का जन्म इस और इस जैसे अन्य देश को कमजोर करने वाले विचारों पर राजनीति करने के लिए ही हुआ है। वजह यही है कि जब शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत ने संविधान की प्रस्तावना से इन दोनों शब्दों को निकाल फेंकने की मांग की, तो सूचना और प्रसारण मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी उनसे सांकेतिक सहमति जता दी। यह तथ्य भी संघ के विचारकों ने दोहराया कि यह दोनों शब्द आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में जुड़वाये गए थे। यह सवाल भी पूछ ही लिया जाता है कि भारत को यदि समाजवादी और पंथनिरपेक्ष देश बनाया जाना था, तो संविधान के निर्माताओं ने यह दोनों शब्द उसकी प्रस्तावना में क्यों नहीं लिखे? क्या संविधान के निर्माता सांप्रदायिक थे?

भाजपा जानती है कि उसकी सरकार इन दोनों ही शब्दों को संविधान की प्रस्तावना से नहीं हटा पाएगी और यदि कोशिश करेगी, तो खुद सत्ता से हट जाएगी, क्योंकि देश अपने तानेबाने से छेड़छाड़ की कोशिश बर्दाश्त नहीं करेगा। फिर भी वे यह मसले इसलिए उठाते हैं, ताकि समाज का धु्रवीकरण हो, जिसका उन्हें राजनीतिक फायदा मिले। इसके अलावा उन्हें और क्या चाहिए।

मजे की बात यह है कि वे यह तथ्य याद नहीं करना चाहते कि बाद में इंदिरा गांधी ने स्वयं 42 वें संविधान संशोधन का कारण बताया था और वे सही भी थीं। उन्होंने कहा था कि संविधान निर्माताओं ने उसकी प्रस्तावना में यह दोनों शब्द इसलिए नहीं शामिल किए थे कि हमारा पूरी ही संविधान समाजवाद और पंथनिरपेक्षता की भावना से भरा हुआ है, लेकिन अब इन शब्दों का उल्लेख बेहद जरूरी हो गया था। इसलिए कि प्रतिक्रियावादी ताकतें बहुत शक्तिशाली हो गई हैं। आपातकाल विरोधी आंदोलन में धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने उन्हें अपने साथ खड़ा कर लिया था, जिससे उनकी ताकत और बढ़ेगी। कभी ये ताकतें सत्ता में भी आ सकती हैं और तब इनका सबसे पहला प्रहार देश की पंथनिरपेक्षता पर ही होगा। देश को उस संभावित प्रहार से बचाने के लिए संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद और पंथनिरपेक्षता शब्द का उल्लेख जरूरी था।
विज्ञापन विवाद के आलोक में हम देख सकते हैं कि इंदिरा गांधी कितनी दूरदर्शी थीं। गणतंत्र दिवस के विज्ञापन से उन्हीं लोगों की सरकार ने इन शब्दों को बाहर किया, जिनकी ओर इंदिरा गांधी ने इशारा किया था। यह बात फिर दोहराने लायक है कि यह विज्ञापन विवाद इन लोगों ने धु्रवीकरण की मंशा से ही खड़ा किया है। इसी मकसद से ये लोग आगे और भी विवाद खड़ करेंगे। इनका हिंदूवाद किसी से छिपा नहीं।
मगर, यह राजनीति तमिलनाडु में मुफीद नहीं है। वहां की जनता इसे स्वीकार नहीं करती। कहने को तो द्रविड़ भी हिंदू ही हैं, लेकिन उनकी बहुत सी मान्यताएं आर्य मूल के हिंदुओं की मान्यताओं से मेल नहीं खातीं, जबकि संघ और उसकी राजनीतिक जमात भाजपा का हिंदुत्व आर्य मान्यताओं को ही तवज्जो देता है।

लिहाजा, संभव है कि जयंती नटराजन भाजपा में न जाएं, मगर प्रधानमंत्री के प्रति उनके मन में श्रद्धा तो देखी गयी है। उन्होंने कहा ही है कि स्नूपगेट कांड को लेकर उन्होंने नरेंद्र मोदी पर जो हमला बोला था, वह कांग्रेस के कहने पर बोला था। वरना, वे तो इस कांड को मोदी का व्यक्तिगत मामला मानकर चलती थीं। यह तथ्य इशारा करता है कि कांग्रेस पर हमला करने का निर्देश उन्हें शायद कहीं और से मिला है। ऐसा न भी हुआ हो, तो भी देश उनसे पूछेगा ही कि वे करीब एक वर्ष बाद क्यों बोलीं?

किस नेता को कौन सी पार्टी छोडऩी है और किसमें शामिल होना है या नहीं होना है, यह उसका निजी मामला होने के बावजूद मूल्यों और सिद्धांतों की राजनीति यह बिलकुल नहीं है कि आपका मुंह हमेशा ही सत्ता की तरफ घूमा रहे। कल्पना करें, यदि 2014 के चुनाव में कांग्रेस फिर सत्ता में आ जाती, तो भी क्या जयंती यही भाषा बोलतीं, जो अब बोल रही हैं? क्या तब भी वे कांग्रेस छोड़तीं? कतई नहीं। इसीलिए वे अवसरवाद की राजनीति का बढिय़ा उदाहरण बन गई हैं।

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