देश के संघीय ढांचे पर लटकती तलवार!

5:36 pm or February 5, 2015
Delhi Elections

—ओ.पी. शर्मा—

एक प्रतिष्ठित न्यूज चेनल पर दिल्ली में चुनाव पूर्व कराये गए ओपिनियन पोल के नतीजे दिखाए जाने के बाद अब दिल्ली चुनाव की तस्वीर साफ़ दिखाई देने लगी है। इण्डिया टुडे ग्रुप और सिसेरो के फाइनल ओपिनियन पोल के मुताबिक दिल्ली की 70 सीटों में से आम आदमी पार्टी को 38 से 46 सीटें मिल रही है वहीँ दूसरी ओर प्रधानमंत्री और उनके समूचे मंत्रिमंडल सहित भाजपा के दिग्गज नेताओं द्वारा अपनी पूरी ताकत लगा देने के बावजूद भाजपा महज 19 से 25 सीटों तक सिमट रही है। कांग्रेस को मात्र 3 से 7 सीटें मिल रही है और वह सत्ता की दौड़ से अनिवार्य रूप से बाहर है। यद्यपि यह सेम्पल सर्वे मात्र 3972 लोगों पर किया गया जो दिल्ली के सभी मतदाताओं का ओपिनियन नहीं है किन्तु यदि 5 प्रतिशत मार्जिन एरर को छोड़  भी दिया जाये तो भी दिल्ली  में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आम आदमी पार्टी उभर रही है।

केजरीवाल द्वारा विगत वर्ष मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दिए जाने के बाद से वे जानते थे कि जनता उनकी इस गलती से नाराज है।  अपना खोया हुआ आधार पाने के लिए वे स्वयं, उनकी पार्टी के पदाधिकारी और कार्यकर्ता काफी सक्रिय  रहे और जनता से उन्होंने सतत संपर्क बनाये रखा। फिर भी वे लोगों की नाराजी पूरी तरह दूर नहीं कर पाये थे किन्तु जैसे ही भाजपा ने पूर्व आई.पी.एस. अफसर किरण बेदी का नाम मुख्यमंत्री के तौर पर सामने रखा, केजरीवाल के लिए यह अनुकूल हो गया। दिल्ली के अनेक वरिष्ठ नेता जो बरसों से पार्टी का झंडा उठाये खड़े थे, उन्हें 10 दिन पूर्व भाजपा में आई किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में स्वीकार करना आसान नहीं था। पार्टी की आंतरिक बगावत और स्वयं की उपेक्षा से जहाँ एक और दिल्ली के वरिष्ठ भाजपा नेता स्वयं को अपमानित और ठगे हुए महसूस कर रहे है वहीं अचानक किरण बेदी के भाजपा में लाए जाने से जनता में यह सन्देश भी गया है कि भाजपा के पास केजरीवाल की टक्कर का स्वयं का कोई नेता नहीं है और उन्होंने इसीलिए केजरीवाल को टक्कर देने के लिए ऐसे व्यक्ति का चुनाव किया है जो केजरीवाल की तरह ही अन्ना आंदोलन से निकली है। इससे जनता के समक्ष भाजपा अवसरवादी दिखने लगी है। यदि 10 फरवरी को नतीजे इसी सर्वे के अनुरूप आये तो यह न केवल दिल्ली में भाजपा की पराजय होगी बल्कि इससे मोदी की भगवा पताका का रंग भी अवश्य फीका पड़ जायेगा।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में कहा गया है भारत अर्थात इंडिया राज्यों का संघ होगा। संविधान की सातवीं अनुसूची (अनुच्छेद 246 ) में केंद्र और राज्य की शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है। भारतीय संविधान में उल्लेखित “केंद्र सूची” और अपवाद स्वरूप “समवर्ती सूची” के कुछ  विषयों को छोड़कर शेष विषयों पर कार्य करने की समस्त शक्तियां राज्य के पास है। जो भूमिका केंद्र में प्रधानमंत्री की है कमोबेश वही भूमिका राज्य में मुख्यमंत्री की होती है। यह भारत के लिए गर्व की बात है और यही हमारी बहुरंगी संस्कृति और  विविधता में एकता का कारण  है।

यदि भारत संघीय गणराज्य न होकर एकात्मक शासन प्रणाली को अपनाकर पूरे देश की सत्ता का केन्द्रीयकरण करता तो आज ऐसा भारत न होता जो हम देख पा रहे है, बल्कि यहाँ 15 से 20 स्वतंत्र देश होते जहाँ तमिलनाडु से जम्मू कश्मीर और गोवा से अहमदाबाद जाने के लिए हमें  15 से 20 देशों के वीज़ा लेने होते। यह तो हमारा सौभाग्य है कि हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, तत्कालीन नेताओं और संविधान निर्माताओं ने अपनी दूरदृष्टि से इसी भाषाई, धार्मिक, सांस्कृतिक और जातीय विविधता को बरकरार रहने दिया ताकि बड़े संघर्ष से  एक एक सूत्र में पिरोया गया देश फिर से टूट न पाये और राष्ट्र रुपी इस गुलदस्ते से  सभी प्रकार के पुष्पों की सुगंध बिखरती रहे।

यह निर्विवाद सत्य है कि देश की 35  प्रतिशत जनता ने एकसाथ आकर नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा के पक्ष में वोट किया है और उन्होंने अनेक दलों में विभाजित 65 प्रतिशत वोटों को खोकर भी अपने जादुई  प्रभाव से लगभग तीन दशको से देश में चली आ रही गठबंधन की राजनीति को विराम दिया है। मोदी के सत्ता में आने के बाद जम्मू-कश्मीर, झारखण्ड, महाराष्ट्र, हरियाणा, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में हुए विधानसभा चुनाओं में तथा दिल्ली में हो रहे विधानसभा चुनाव में मोदी एकमात्र चेहरा रहे है। इन राज्यों के चुनाव प्रचार में एक बात सामान्य तौर पर देखी  गयी है कि इन सभी राज्यों में मोदी ने अपने भाषणों में जनता से अपने लिए वोट करने की अपील की है।  उन्होंने साफ़ साफ कहा है कि “आपके राज्य के विकास की जिम्मेदारी अब मुझ पर छोड़ दीजिये।” यह सही है कि प्रधानमंत्री की यह अपील हरियाणा, झारखण्ड  में सफल रही तथा जम्मू-कश्मीर और शेष राज्यों में भी  प्रदर्शन अच्छा रहा, भले ही वह वहां सरकार न बना सकी।

लेकिन संघीय ढांचे वाले एक विशाल राष्ट्र में जहाँ राज्यों की स्वतंत्र सरकार होती है और उन्हें अपने निर्णय स्वयं लेने के संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, क्या वहां के चुनावों में देश के प्रधानमंत्री द्वारा अपने लिए वोट देने की अपील करना भारत के संघीय स्वरुप के लिए खतरनाक नहीं है? प्रधानमंत्री के प्रचार के बाद जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें बनी उनका तो संघीय स्वरुप उसी दिन समाप्त हो गया था जिस दिन वहां की जनता ने अपने राज्य के मुख्यमंत्री के लिए नहीं बल्कि  प्रधानमंत्री के लिए वोट दिया। आज देश के सभी भाजपा शासित राज्य और उनके मुख्यमंत्री नाम मात्र के स्वतंत्र है और उनके अधिकार काफी सीमित प्रतीत होते है। अंतिम निर्णय के लिए भाजपा का प्रत्येक मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से अनुमोदन लेता है चाहे वह औपचारिक ही क्यों न हो।

विधानसभाओं से लेकर नगरीय निकाय तक के चुनाओं और यहाँ तक कि पंचायत के चुनाओं में भी मोदी के नाम और चित्रों का इस्तेमाल करना भाजपा की राष्ट्रिय नीति बन गयी है। अतएव यह न सिर्फ एक चिंतनीय विषय है बल्कि हमारे संविधान की मूल आत्मा के लिए भी एक चुनौती है।

यदि दिल्ली विधानसभा के चुनाओ में भी मोदी की अपील काम करती है और वहां भाजपा की सरकार बन जाती है तो दिल्ली की जनता मुख्यमंत्री से नहीं बल्कि परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री से ही शासित होगी।  किरण बेदी मात्र एक मोहरा ही होगी जिसे जब चाहे और जिधर चाहे, प्रधानमंत्री द्वारा चलाया जायेगा। यह स्थिति देश के संघीय ढांचे पर लटकती हुयी तलवार के समान है।  भारत के संघीय ढांचे के लिए एक गंभीर चुनौती है, जिसपर हमारे संविधानवेत्ताओं, राजनेताओ, राजनीति विज्ञानियों, समाज विज्ञानियों और बुद्धिजीवियों को सोचना चाहिए। हमें इस चुनौती से निपटना ही होगा।

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