नये वामपंथ के रूप में उभरती आप

4:55 pm or February 9, 2015
AAP

—पार्थ उपाध्याय—

दिल्ली के राजनैतिक दंगल में जिस तरह हलचल दिखाई पड़ रही है और आम आदमी का पड़ला भारी होता दिख रहा हैं  उससे राजनीति में कई संकेत उभरते हैं. अगर दिल्ली में केजरीवाल की सरकार बनती हैं तो इसे नये रूप में उभरे वामपंथी विचारों को मिली स्वीकृति के रूप में समझा जा सकता हैं.हालंकि ये राज्य के चुनाव हैं  जहाँ विचारधारा से ज्यादा मुद्दे अधिक महत्त्व रखते हैं और वही सत्ता तक पहुँचता हैं जो मुद्दे पर जन-आकांक्षाओं को भुनाने में सफल रहता हैं. और केजरीवाल इस काम को बेहतरी से कर सके .लेकिन एक बात को समझना होगा कि केजरीवाल ने राजनीति में जिस प्रवृत्ति को जन्म दिया हैं वह  आगे चलकर लोकतंत्र और व्यवस्था दोनों के लिए घातक हो सकती हैं. केजरीवाल ने मुद्दों को समस्याएं बनाया और उन समस्या के नाम पर व्यवस्था पर चोट की तथा लोगो की संवेदनाएं बटोरी. यह ठीक हैं लेकिन हमें ये समझना होगा कि एक लम्बे संघर्ष और बलदानी के बाद हम एक स्वस्थ व्यवस्था विकसित कर पाये हैं, हो सकता हैं कि इसको संचालित करने वालों में कमी हो लेकिन ये व्यवस्था जर्जर नहीं हैं. केजरीवाल का देश के गणतंत्र को बॉयकाट करना और गणतंत्र दिवस पर  स्वयं को अराजक घोषित करना क्या सन्देश देता हैं? यदि इसी तरह की राजनीति देश में पोषित होती रही तो हो सकता हैं कि कल संविधान और न्यायलय को भी खुले आम चुनौती देने वाले लोग उठ खड़े हों. और केजरीवाल की इस तरह की राजनीति को इस आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता हैं कि जनता ने उन्हें जनादेश दे दिया हैं.

हमें आज की राजनीति के आलावा कल की राजनीति का भविष्य भी देखना होगा. केजरीवाल के द्वारा उद्योगपतियों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि जैसे वे देश के षणयंत्रकारी हों और सारी समस्याएं उन्हीं के द्वारा पैदा की गयी हों. हमारे देश के आम जन में उद्द्योग्पतियों का इस तरह चित्रण आखिरकार कितना सही है?  सब जानते हैं कि देश का विकास उद्योग के बिना संभव नहीं है. आज देश में एक्सप्रेस वे से लेकर मेट्रो सब उद्योगपतियों की ही देन है. वैश्वीकरण के इस दौर में हम निजी क्षेत्र के बिना तरक्की के सपने नहीं देख सकते. हमारी सरकारों के पास इतना पैसा और संसाधन नहीं है कि वे अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्रक में अपने दम पर काम कर सकें. हमें उद्योगपतियों के सहारे ही आगे बढ़ना होगा . देश में बिजली ,गैस , ईधन बनाने का काम भी निजी क्षेत्र कर रहे है,इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में उनका खासा योगदान है ,देश की जीडीपी में सेवा क्षेत्र का ६० प्रतिशत का योगदान है जो अधिकतर निजी क्षेत्र दे रहा है .देश की अर्थव्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभाने वाले उद्योगपतियों की देश के आम-जन में उनकी भूमिका को केजरीवाल द्वारा दुष्प्रचारित करना बेहद खतरनाक प्रवृत्ति को जन्म दे रहा है. निराधार आरोप लगाकर निचले वर्ग की संवेदनयों को जीतना आम आदमी पार्टी की फितरत बन गयी है.

वाम पंथियों ने भी ये खूब किया लेकिन जब असली चेहरा सामने आया तो वे इतिहास बनना शुरू हो गए. देश के क्षितिज  पर   आरएसएस और वामपंथ लगभग  एक ही दौर में  शुरू हुए थे और आज दोनों की स्थिति में अंतर को देखा जा सकता है.वाम पंथियों के लम्बे शासन ने बंगाल को क्या दिया ? उनके उद्योग विरोधी नीतियों का ही परिणाम है कि  आज बंगाल उद्योगों से अछूता है और विकास से भी. ये देश की जनता के सामने एक चुनौती है कि वे देश का कैसा भविष्य चाहते हैं? सब कुछ राजनीतिक प्रक्रियायों से ही निर्धारित नहीं होता, देश के प्रबुद्ध जन और दवाब समूह को यह सुनिश्चित करना हैं कि अब राजनीति में अराजकता के माहौल को बढ़ावा देना हैं या भारतीय संवैधानिक उद्देश्यों को. प्रश्न खड़ा होता हैं कि आम आदमी पार्टी ने कभी भी संविधान के उद्देश्यों की बात नहीं की ,उन्होंने कभी भी गांधी और अम्बेडकर के सिद्धांतों की बात नहीं की .वे जब भी बोलते हैं तो ऐसा लगता है कि वे क्रांति की बात करते है. न उन्हें चुनाव आयोग पर भरोसा है न व्यवस्था पर, ऐसा लगता है कि कुछ समस्यायों से नहीं  बल्कि वे  एक अघोषित उद्देश्य के लिए लड़ रहे है जो कि देश के संविधान और व्यवस्था से ऊपर है. कांग्रेस का पतन भी एक नयी चिंता को  जन्म दे रहा है कि यद्यपि कांग्रेस में भ्रष्टाचार और परिवारवाद घर कर गया था लेकिन वो एक विचार धारा पर आधारित पार्टी है जो कि सत्ता के लिए व्यवस्था के मूल पर चोट नहीं करती है. और व्यवस्था के मूल पर चोट या तो नक्सलवादी करते हैं या  विप्लववादी लेकिन राजनितिक दलों को कभी ऐसा करते हुए नहीं देखा गया. यदि ऐसा कहा जाये कि सब भ्रष्ट हैं ,सरकार ,संसद में बैठे सारे लोग ,सभी मीडिया तो इसका क्या अर्थ निकाला जाये ?

आज ऐसी विचार धारा पर विमर्श इस लिए ज़रूरी हो गया है कि ऐसे लोगों को जनादेश मिल रहा है लेकिन ज़रूरी नहीं कि ऐसे दलों के दिल में क्या है वो जनता समझ ही गयी हो .सरकार कोई भी बने लेकिन ऐसी अराजक हरकतों की जनता के बीच में चर्चा होनी चाहिए. संवैधानिक पदों पर बैठने वाले धरने पर नहीं बैठ सकते क्योंकि वे नीति निर्माता हैं और नीतियों को बनाने में व्यवहारिक समस्याएं आती ही हैं. अपनी जिम्मेदारी को दूसरे पर डाल कर कोई भी संवैधानिक व्यक्ति धरना नहीं दे सकता .यदि इन्हे समस्यायों का समाधान निकालना नहीं आता तो उन्हें जिम्मेदारी लेने का कोई अधिकार नहीं.क्या होगा यदि सर्वोच्च न्यायलय का कोई न्याधीश या सेना प्रमुख या चुनाव आयुक्त अपनी समस्यायों को लेकर धरने पर बैठ जाये? ये तो अराजकता हैं और मुख्यमंत्री होते हुए केजरीवाल का धरने पर बैठना बेहद गैर-संवैधानिक काम था . लेकिन केजरीवाल तो अपने फायदे के लिए संविधान को भी चुनौती दे सकते हैं .

अब देखना ये होगा कि भविष्य में राजनेता के रूप में केजरीवाल अपने अराजक रूप को छोड़ते हैं या नहीं. और यदि एक जिम्मेदार नेता और संविधान में विश्वास रखने वाले नेता के रूप में वे अपने को स्थापित करना चाहते हैं तो उन्हें व्यवस्था का सम्मान करना सीखना होगा. उन्हें अपनी अराजक हरकतें छोड़नी होगी और यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो देश के जिम्मेदार वर्ग का ये दायित्व हैं कि वे जनता को ऐसे घातक आचरण के विरुद्ध जागरूक करें.दरसल आम आदमी पार्टी के नेता भी बोलने के मामले में केजरीवाल का ही अनुसरण करते हैं. फिर चाहे वो कुमार विश्वास हों या आशीष खेतान. चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायलय के द्वारा ही अब ये  निर्देश जारी किये जा सकते हैं कि देश का संविधान और व्यवस्था सर्वोपरि हैं. छुद्र राजनीतिक लाभों के लिए देश के गौरव  यानि गणतंत्र दिवस, भारतीय संवैधानिक व्यवस्था और संवैधानिक पद पर प्रश्न चिन्ह नहीं उठाया जाना चाहिए .यदि आम आदमी पार्टी  जैसी राजनीतिक देश में आगे बढ़ी तो ये एक घातक अराजक व्यवस्था को जन्म दे सकती हैं .अब राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर उठकर देश के सभी हिस्सेदारों को ऐसी अराजक प्रवृत्ति को आगे बढ़ने से रोकना होगा . क्योंकि राजनीति ,सरकार और सत्ता से बड़ा हैं हमारा संविधान और हमारी संवैधानिक व्यवस्था जो भी करना होगा वो संवैधानिक उद्देश्यों और मूल्यों से इतर नहीं हो सकता .

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