कल्पना से बड़ी जीत की सुनामी

6:05 pm or February 10, 2015
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—प्रमोद भार्गव—

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में कल्पना से बड़ी जीत दर्ज कर ली है। इस आश्चर्य जनक जीत को अरविंद केजरीवाल के उत्साही समूह ने संभव बनाया है। साफ है,धन और जज्बे की जब लड़ाई होती है तो जुनून की सुनामी जीतती है। लेकिन ऐसा तब संभव होता है,जब व्यक्ति अपनी गलतियां दोहराने की बजाय,उनसे सबक ले ? अरविंद ने अपनी गलतियों से सबक लेते हुए पार्टी को धरना पार्टी से उभारा। जनता से माफी मांगी और भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई को जारी रखा। नतीजतन आप ने भाजपा का दिल्ली में वही हश्र कर दिया,जो भाजपा ने लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों का किया था। जबकि कांग्रेस और राहुल गांधी ने अपनी हारों से कोई सबक नहीं लिया,नतीजतन वह शुन्य  में तब्दील हो गई। आप की यह बड़ी जीत भारतीय राजनीति में एक ऐसा मोड़ साबित होगी जो राजनीति की नई दिशा और दशा सुनिष्चित करेगी। आप की जीत से वैकल्पिक राजनीति की नई धारा फूट सकती है।

आप की जीत पर अचरज इसलिए है,क्योंकि 49 दिन की यह अल्पजीवी सरकार अपने जज्बे और जुनून के चलते दीर्घजीवी हो गई है। अब पूरे पांच साल दिल्ली पर राज करने का उसे दो तिहाई से भी अधिक बहुमत मिल गया। आप को एक हद तक भाजपा के विरूद्ध खड़ा होने का अवसर खुद नरेंद्र मोदी सहित उन तमाम नेताओं ने दिया,जिन्होंने भाशा की सीमा और षालीनता को लांघा। यहां तक मोदी ने चुनावी सर्वेक्षणों को बाजारू करार तक दे डाला था। जबकि अब जब परिणाम आ गए है,तो आप की जीत सर्वेक्षणों द्वारा निकाले गए अनुमानों से कहीं ज्यादा बड़ी इलेक्ट्रिक वोटिंग मषीनों से निकली है। योगेंद्र यादव द्वारा किए गए आतंरिक सर्वे में आप को 51 से 57 सीटें मिलने की उम्मीद जताई गई थीं,जबकि उसे 65 सीटों पर जीत हासिल हुई है। इस जीत की कल्पना किसी सर्वे और चुनाव विष्लेशक ने नहीं की थी। भाजपा को विपक्ष का नेता बनने लायक भी सीटें नहीं मिल पाई हैं। नेता बनने के लिए सात सीटों की जरूरत थी,जबकि वह महज चार सीटों पर सिमट गई है। मसलन लोकसभा में जो कांगे्रस की हैसियत है,वहीं अब भाजपा की दिल्ली विधानसभा में रहने वाली है।

एक करोड़ 33 लाख मतदाताओं वाली दिल्ली में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है,जहां से आप का उम्मीदवार न जीता हो। जबकि चुनावी सर्वेक्षणों में ये अनुमान लगाए गए थे कि दिल्ली का मतदाता आर्थिक आधार पर विभाजित है। लिहाजा कुलीन वर्ग भाजपा के साथ है। लेकिन परिणामों ने इस धारणा को बदला है। आप उन सीटों पर भी जीती है,जहां आभिजात्य बस्तियां हैं। मजे की बात यह भी है कि पूंजीवाद के पोशक वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जहां जहां प्रचार किया वहां-वहां भाजपा हारी है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि भाजपा आधुनिकता और औद्योगीकरण के बहाने उन्हीं नीतियों को अमल में लाने लग गई,जो नीतियां कांग्रेस की हार की प्रमुख वजहें बनी थीं। पूर्वी और बाहरी दिल्ली वह इलाका है,जहां खेती,किसानी और पषु पालन से जुड़ा बड़ा तबका रहता है और इन्हीं पारंपरिक पेषों से अपनी आजीविका के लिए धन जुटाता है। भाजपा की तिकड़ी मोदी,अमित षाह और अरुण जेटली ने अध्यादेष के जरिए भूमि अधिग्रहण कानून बदलकर मतदाता को यह साफ संदेष दे दिया था कि वह ग्रामीण भारत को उजाड़कर आधुनिक षहरी भारत की बुनियाद कांगे्रस से भी कहीं ज्यादा कठोर निरकुंष्ता के साथ रखने वाली है। विकास की इस इकतराफा हठधर्मिता से लड़ने की कुब्बत कांग्रेस में तो रह ही नहीं गई है,समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से भी मतदाता को कोई उम्मीद नहीं रह गई थी। गोया उसके पास आप को समर्थन करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। अब मोदी का दिल्ली को स्मार्ट बना देने का सपना तो चकनाचूर हो ही गया है,अन्य स्मार्ट सिटी बना देने पर भी भाजपा को पूनर्विचार करना होगा। अन्यथा लखटकिया कोट की चमक मफलर मैन के आगे हर जगह फीकी पड़ती जाएगी।

यह सही है कि इन नतीजों से केंद्र सरकार प्रभावित होने वाली नहीं है,लेकिन इनका असर देषव्यापी होगा। हालांकि दिल्ली ऐसा महानगर है,जिसमें समूचा देष समाया हुआ है। दिल्ली देष का सबसे धनी राज्य है,बावजूद यहां 58 फीसदी गरीब आबादी रहती है,जो देष की पारंपरिक राजनीति की वाहक है,न कि मोदी के जल,जंगल और जमीन उजाड़कर वजूद में लाए जाने वाले आधुनिक माॅडल की ? इस चुनाव में भाजपा को एक तो किरण बेदी को बतौर मुख्यमंत्री चुनाव में उतरना मंहगा पड़ा,दूसरे मोदी द्वारा लगाया कांग्रेस मुक्त भारत का नारा मंहगा पड़ा। बेदी के आने से दिल्ली भाजपा के नेता और कार्यकर्ता दोनों नाराज हुए। इस नाराजी को किरण के नौकरषाह होने के दंभ ने भी उकसाने का काम किया। नतीजतन पार्टी में अंदरूनी स्तर पर हताषा का वातावरण बना,जिसने भाजपा को चार सीटों पर समेट दिया। अब विधानसभा में वह विपक्षी की आधिकारिक भूमिका भी नहीं निभा पाएंगी।

कांगे्रस दिल्ली में एक भी सीट नहीं जीत पाई। नतीजतन एक राज्य पूरी तरह कांग्रेस मुक्त हो गया। लेकिन मतदाता द्वारा कांग्रेस को इस तरह से नकारना भाजपा को भी नुकसानदेह रहा। दरअसल कांग्रेस का जो प्रतिबद्व वोट था,वो आप के पक्ष में चला गया,जो आप की जीत के लिए सुनामी साबित हुआ। लेकिन यह सुनामी अनयास नहीं आई,इसके लिए आप ने बाकायदा राणनीति बनाई। और दिल्ली की सत्ता छोड़ने के बाद भी गली-मोहल्लों में अपनी मौजदूगी कायम रखी। आप से जुड़े युवाओं और स्वंयसेवाकों ने तर्जुबेकारों सी खिलंदड़ी दिखाते हुए आप की कमजोरियों को ऊर्जा दी और भाजपा के दिग्गज रणनीतिकारों को चुनावी दंगल में चारों खाने चित्त कर दिया। कांग्रेसी धुरंधरों की तो ऐसी दुर्गती हुई है कि वे मुंह दिखाने लायक भी नहीं रह गए हैं।

आप की जीत से वैकल्पिक राजनीति के पैरोकारों को भी ताकत मिलेगी। क्योंकि अब नरेंद्र मोदी के व्यक्तिव के विराट का जो छद्म रचा गया था,उसे अरविंद की यथार्थ-जीविता ने भेदकर छलनी कर दिया है। उनके अपराजेय बने रहने का मिथक टूट गया है। गोया,इसी साल बिहार और फिर पष्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेष में होने वाले चुनाव में तीसरा मोर्चा नया आकार ले सकता है। इसके षिल्पकार अरविंद,ममता बनर्जी और नीतिष कुमार हो सकते हैं। क्योंकि ये तीनों उसी राजनीति और कार्य-संस्कृति के पक्षधर हैं,जो हाषिए पर पड़े समाज की परवाह करती है। वैकिल्पक राजनीति का यही रास्ता भारतीय संसदीय ढांचे के भीतर लोकतंत्र को मजबूत करेगा और इसी मजबूती से समजतामूलक समाज रचने की कामना की जा सकेगी।

इन परिणामों ने मीडिया की सााख बचाने का भी काम किया है। क्योंकि जब जनमत सर्वेक्षण भाजपा को हरा रहे थे,तब नरेंद्र मोदी ने इन्हें बाजारु मीडिया का सर्वेक्षण कहा था। अब ओपीनियन और एग्जिट पोल के अनुमान न केवल परिणाम के रूप में खरे उतरे हैं,बल्कि उम्मीद से भी कहीं बहुत आगे बढ़ गए है। इन नतीजों ने यह भी तय कर दिया है कि मीडिया में जागरूकता का स्तर भांपने और बदलाव की आकांक्षा टटोलने का माद्दा है। बहरहाल आप और अरविंद केजरीवाल ने जो इतिहास रचा है, उसने एक तो भाजपा के दंभ को तोड़ दिया है,दूसरे कांगेस के पतन की इबारत भी लिख दी है।

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