गरीब विद्यार्थियों के खिलाफ मोदी सरकार

4:48 pm or February 12, 2015
Education Loan

—अरविन्द जयतिलक—

अगर केंद्र की मोदी सरकार पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार द्वारा पेशेवर  शिक्षा पर दी जा रही ब्याज सब्सिडी को आधा करने की दिषा में आगे बढ़ रही है तो यह एक तरह से शैक्षिक ऋण की बदौलत उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे विद्यार्थियों के हितों पर भारी कुठाराघात है। सरकार का यह तर्क पर्याप्त नहीं कि जितना बजट ब्याज सब्सिडी के लिए दिया गया था उससे ज्यादा के दावे सरकार के पास आ गए। बता दें कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने शैक्षिक ऋण पर ब्याज सब्सिडी को आधा करने का प्रस्ताव वित्त मंत्रालय को भेजा है। गौरतलब है कि 2009 में मनमोहन सरकार ने पेषेवर शिक्षा के लिए ब्याज सब्सिडी योजना षुरु की थी। मौजूदा समय में तकरीबन 25 लाख विद्यार्थी इस योजना का लाभ उठा रहे हैं। बता दें कि 2014-15 के अंतरिम बजट में वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने 31 मार्च 2009 से पहले लिए गए और 31 दिसंबर 2013 तक बकाया शैक्षिक ऋणों को ब्याज सब्सिडी के दायरे में लाने की सकारात्मक पहल की थी। तब तत्कालीन वित्तमंत्री ने बैंकों को ताकीद भी किया था कि शिक्षा ऋण हर विद्यार्थी का अधिकार है और वे पर्याप्त कारण के बिना उनके आवेदन को खारिज न करें। उन्होंने यह भी ऐलान किया था कि पात्र विद्यार्थियों को ऋण देने से मना करने वाले बैंक अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। माना गया कि यूपीए सरकार की शिक्षा ऋण नीति का क्रांतिकारी प्रभाव अगले 10 साल बाद देखने को मिलेगा। लेकिन अगर मोदी सरकार मानव संसाधन मंत्रालय के प्रस्ताव को स्वीकारती है तो निष्चय ही शिक्षा ऋण के प्रति छात्रों की बेरुखी बढे़गी और उच्च शिक्षा में नामांकन दर घटेगा। यह तथ्य है कि धनाभाव के कारण आज लाखों विद्यार्थी उच्च एवं तकनीकी शिक्षा से वंचित हैं। सत्ता में आने के बाद मनमोहन सरकार ने यह प्रयत्न किया कि धनाभाव के कारण कोई भी विद्यार्थी शिक्षा से वंचित न रहे। इसके लिए उसने कम ब्याज दर पर बैंकों से शिक्षा ऋण उपलब्ध कराने का प्रयास किया। लेकिन दुर्भाग्य है कि केंद्र की मौजूदा सरकार इसके विपरित दिषा में आगे बढ़ रही है। जबकि यह तथ्य है कि अनगिनत कारणों की वजह से पहले से ही विद्यार्थियों में शिक्षा ऋण की मांग घट रही है। आज की तारीख में 0.9 फीसदी विद्यार्थी ही उच्च शिक्षा ऋण की मांग कर रहे हैं। यह बेहद निराषाजनक और चिंतनीय पहलू है। इससे उच्च शैक्षणिक विकास की रफ्तार धीमी होगी। आज जरुरत उन कारणों को तलाषने और जानने की है जिसकी वजह से पात्र विद्यार्थियों को शिक्षा ऋण उपलब्ध नहीं हो रहा है और उनकी दिलचस्पी घट रही है। हो सकता है इसके बहुतेरे कारण हों। लेकिन इसके लिए सर्वाधिक रुप से सरकार की नीतियां और बैंकों की कार्यप्रणाली जिम्मेदार है। यह किसी से छिपा नहीं है कि बैंकों की शिक्षा ऋण आवंटन को लेकर घोर उदासीनता, धीमी कार्यप्रणाली, भ्रष्टाचार और अधिकारियों व कर्मचारियों का निष्ठुर व्यवहार इसमें मुख्य बाधा है। इसके अलावा बैंकों की जटिल ऋण प्रक्रिया और ढेरों कागजी कार्यवाही भी शिक्षा ऋण के आकर्शण को कम कर रहा है। शिक्षा ऋण देने के एवज में बैंकों की गारंटी धन की मांग भी विद्यार्थियों को हतोत्साहित कर रहा है। आर्थिक रुप से कमजोर विद्यार्थी गारंटी धन जमा करने में असमर्थ हैं। इसका नतीजा यह है कि वे शिक्षा ऋण से वंचित हो अपने लक्ष्य से पिछड़ जा रहे हैं। गांवों और पिछड़े क्षेत्रों में सरकार की इस महत्वपूर्ण शिक्षा ऋण योजना के प्रचार-प्रसार का अभाव और बैंकों की अनुपलब्धता भी जरुरतमंद विद्यार्थियों को शिक्षा ऋण की राह में रुकावट डाल रहा है। आज देष के 5 लाख से अधिक गांव बैकिंग सुविधा से वंचित हैं। देष में तकरीबन 95000 बैंकों की ही शाखाएं हैं जो ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। गांव के विद्यार्थी शिक्षा ऋण की उपलब्धता की जानकारी होते हुए भी उसका लाभ नहीं उठा पाते हैं। नतीजतन उन्हें उच्च शिक्षा में नामांकन के लिए ग्रामीण महाजनों और सूदखोरों से ऊंचे ब्याज दर पर ऋण लेना पड़ता है। जितना ऋण नहीं लेते उससे कहीं ज्यादा उन्हें ब्याज चुकाना पड़ता है। जिन विद्यार्थियों को शिक्षा ऋण हासिल नहीं हो पाता है वे शिक्षा छोड़ अन्य कामधंधों में लग जाते हैं। शिक्षा ऋण की अनुपलब्धता और जागरुकता की कमी का ही नतीजा है कि आज भारत में उच्च शिक्षा का नामांकन दर महज 12.4 फीसदी है। जबकि दुनिया के विकसित देषों में उच्च शिक्षा का नामांकन दर 40 फीसदी के आसपास है। आज दुनिया के विकसित देषों में प्रति 10 लाख में 4500 छात्र शोध कार्य में संलग्न हैं। स्कैंडिनेवियाई देषों में तो यह संख्या 6700 तक है। जबकि भारत में यह संख्या महज 156 है। स्वाभाविक है कि जब उच्च शिक्षा में नामांकन नहीं होगा तो शोध कार्य के लिए विद्यार्थी कहां से मिलेंगे। पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार ने गरीब छात्रों को बैंकों से सालाना 4 फीसदी की निम्न ब्याज दर पर शिक्षा ऋण सुलभ कराया। सरकार के इस कदम की सराहना हुई। मनमोहन सरकार ने नीति बनायी कि उन्हीं छात्रों को 4 फीसदी ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाएगा जिनके माता-पिता की औसत आय 4.50 लाख रुपये से कम होगी। बाकी छात्रों को 7 फीसदी ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराने की बात कही गयी। लेकिन मनमोहन सरकार की सक्रियता के बावजूद भी बैंकों द्वारा शिक्षा ऋण के रुप में सिर्फ 58 हजार करोड़ रुपए ही वितरित किया गया जो लक्ष्य से काफी कम रहा। मनमोहन सरकार ने यह प्रयास किया कि शिक्षा ऋण को 2017 तक बढ़ाकर 1,22,883 करोड़ और 2020 तक 1,66,541 करोड़ कर दिया जाय। लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि मोदी सरकार इस लक्ष्य को साध पाएगी। यह समझना होगा कि जब तक बैंकों द्वारा ऋण प्रदान करने की प्रक्रिया का सरलीकरण नहीं होगा तब तक सार्थक परिणाम नहीं आएंगे। मोदी सरकार को चाहिए कि मनमोहन सरकार की शिक्षा ऋण नीति को जारी रखे और उसे उदार बनाने के लिए ब्याज दर को न्यूनतम स्तर पर लाए। गरीब विद्यार्थियों को विषेश रुप से छूट दे। साथ ही उनके लिए बैंकों में जरुरी गारंटी धन रखने की बाध्यता को खत्म करे। शिक्षा के उपरांत रोजगार प्राप्ति तक विद्यार्थियों को ऋण भुगतान के लिए परेषान भी नहीं किया जाना चाहिए। कोशिष यह होनी चाहिए की गांव स्तर पर न सही लेकिन तहसील स्तर पर बैंक शिविर लगाकर जरुरतमंद विद्यार्थियों को ऋण उपलब्ध कराएं। सरकारी ऋण को लेकर लोगों के मन में व्याप्त नकारात्मक भाव को भी दूर करने की जरुरत है। बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों का आचरण-व्यवहार भी प्रभावकारी होना चाहिए। उन्हें विद्यार्थियों एवं उनके अभिभावकों का विष्वास जीतना चाहिए। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि कम से कम कागजी कार्यवाही हो। यह भी सुनने को मिलता है कि शिक्षा ऋण देने के एवज में बैंक अधिकारी और कर्मचारी सुविधा षुल्क की मांग करते हैं। इस प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए। लेकिन यह तभी संभव है जब मोदी सरकार मनमोहन सरकार की हितकारी शिक्षा ऋण नीति को आगे बढ़ाएगी।

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