मोदी सरकार की विफल चीन नीति

3:25 pm or March 9, 2015
Indo-China

—अरविंद जयतिलक—

अपनी विदेश नीति पर आत्ममुग्ध मोदी सरकार को चीन नीति पर बार-बार मुंह की खानी पड़ रही है। एक ओर मोदी सरकार चीन से रिश्ते सुधरने की राग अलाप रही है वहीं चीनी सेना आए दिन भारतीय सीमा को अतिक्रमित कर भारत की प्रभुसत्ता को ललकार रही है। गत सप्ताह पहले भारतीय प्रधानमंत्री की अरुणाचल प्रदेश की यात्रा को लेकर चीन ने जिस तरह अपनी बौखलाहट दिखायी है वह न सिर्फ उसकी खतरनाक मंषा को रेखांकित करता है बल्कि भारत की कुटनीतिक विफलता को भी उजागर करता है। यह समझना कठिन है कि भारतीय प्रधानमंत्री के अरुणाचल प्रदेश के दौरे से किस तरह चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता, अधिकार एवं हितों की अनदेखी हुई जैसा कि उसके उप-विदेश मंत्री ने बीजिंग में भारतीय राजदूत को तलबकर अपना आक्रोश जाहिर किया। उससे भी बड़ा आष्चर्य यह कि भारत सरकार इस मसले पर षुतुर्गमुर्गी रवैया अपनाती देखी गयी। बता दें कि चीनी उप-विदेशमंत्री ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि ‘भारतीय पक्ष की ऐसी हरकतों से सीमा मुद्दे पर दोनों देषों के बीच मतभेद और बढ़े हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय पक्ष द्वारा एकतरफा तरीके से बना दिए गए तथाकथित अरुणाचल प्रदेश को कभी मान्यता नहीं दी।’ चीनी उप-विदेशमंत्री के इस दलील से साफ है कि चीन अभी भी अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न अंग नहीं मानता। आष्चर्य की चीन द्वारा इस तरह का प्रपंच तब सामने आया है जब अभी पिछले महीने ही भारतीय विदेशमंत्री सुशमा स्वराज चीन के दौरे पर गयी और चीनी राश्ट्रपति ने भारत से बेहतर संबंधों की दुहाई दी। गौर करें तो यह पहली बार नहीं है जब चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश को लेकर कुटिल इरादे जाहिर किए गए हों। पहले भी चीन इस तरह की ढि़ठाई दिखा चुका है। गत वर्श पहले उसने अपनी नई ई-पासपोर्ट व्यवस्था में अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन के कुछ हिस्सों को दर्षाया था। भारत ने इसका कड़ा विरोध किया था। कुल मिलाकर यही प्रतीत होता है कि चीन सीमा विवादों को सुलझाने को लेकर गंभीर नहीं है बल्कि उसकी आड़ में भारत को घेरने की कोषिश करता है। या यों कहें कि मोदी सरकार चीन से निपटने में पूरी तरह विफल है तो गलत नहीं है। बहरहाल चीन को समझना होगा कि दोनों देषों के बीच रिश्ते तभी सुधरेंगे जब सीमा विवादों को सकारात्मक हल निकलेगा। इसके लिए चीन को अपनी साम्राज्यवादी मानसिकता की खोल से बाहर निकलना होगा। चीन चाहे जो भी दलील दे पर सच यही है कि उसकी उदासीनता की वजह से ही दोनों देषों के बीच सीमा विवाद ज्यों का त्यों बना हुआ है। उसके असंवेदनषील रुख के कारण ही 1976 से चल रही बातचीत तार्किक नतीजे पर नहीं पहुंची। वार्ता के दौरान वह कभी भी दस्तावेजों के आदान-प्रदान में अपने दावे के नक्षे नहीं देता है। भारत के जिन क्षेत्रों पर उसका एक इंच भी दावा है उससे हटने का आज तक संकेत नहीं दिया। विडंबना यह है कि मैकमोहन रेखा को भी वह स्वीकारने को तैयार नहीं है। वह उसे अवैध बताता रहा है। गौरतलब है कि ब्रिटिश भारत और तिब्बत ने 1913 में षिमला समझौते के तहत अंतर्राश्ट्रीय सीमा के रुप में मैकमोहन रेखा का निर्धारण किया था। इस सीमा रेखा का निर्धारण हिमालय के सर्वोच्च षिखर तक है। समझना जरुरी है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलसी की वास्तविक स्थिति भी कमोवेश यही है। इस क्षेत्र में हिमालय प्राकृतिक सीमा का निर्धारण नहीं करता क्योंकि यहां से अनेक नदियां निकलती और सीमाओं को काटती हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि दोनों देश एलसी पर निगरानी कर रहे हैं। ऐतिहासिक संदर्भों में जाए तो तिब्बत, भारत और बर्मा की सीमाओं का ठीक से रेखांकन नहीं होने से अक्टुबर, 1913 में षिमला में अंग्रेजी सरकार की देखरेख में चारो देषों के अधिकारियों की बैठक हुई। इस बैठक में तिब्बती प्रतिनिधि ने स्वतंत्र देश के रुप में प्रतिनिधित्व किया और भारत की अंग्रेजी सरकार ने उसे उसी रुप में मान्यता दिया। आधुनिक देश के रुप में भारत के पूर्वोत्तर हिस्से की सीमाएं रेखांकित न होने के कारण दिसंबर 1913 में दूसरी बैठक षिमला में हुई और अंग्रेज प्रतिनिधि जनरल मैक मोहन ने तिब्बत, भारत और बर्मा की सीमा को रेखांकित किया। समझना जरुरी है कि आज के अरुणाचल का तवांग क्षेत्र मैकमोहन द्वारा खींची गयी रेखा के दक्षिण में होता था। इसलिए तिब्बती सरकार बार-बार उसपर अपना दावा करती रही। तिब्बत का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकारने से उत्तर से पूर्वोत्तर तक कहीं भी भारत और चीन की सीमा नहीं मिलती थी। इस तरह उत्तरी-पूर्वी सीमा को एक प्राकृतिक सुरक्षा मिली हुई थी। पीकिंग पर साम्यवादियों का कब्जा होने के उपरांत 23 मई, 1951 को तिब्बत के दलाई लामा सरकार के प्रतिनिधियों और चीनी सरकार के अधिकारियों के बीच 17 सूत्रीय कार्यक्रम पर समझौता हुआ। इस समझौते को दलाई लामा तिब्बत के स्वतंत्र अस्तित्व की समाप्ति के रुप में देखते हुए भारत से रक्षा की गुहार लगायी। नेहरु सरकार ने दलाई लामा को शरण देकर मानवतावादी कदम उठाया। नतीजा माओ के रेडगार्डों ने तिब्बत पर चढ़ाई कर एक वर्श के अंदर पूरे तिब्बत पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। आज की तारीख में सिक्किम-तिब्बत सीमा को छोड़कर लगभग पूरी भारत-चीन सीमा विवादित है। भारत और चीन के बीच विवाद की वजह अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश की संप्रभुता भी है। पष्चिमी सेक्टर में अक्साई चिन का लगभग 3800 वर्ग किमी भू-भाग चीन के कब्जे में है। अक्साई चिन जम्मू-कश्मीर के उत्तर-पूर्व में विषाल निर्जन इलाका है। इस क्षेत्र पर भारत का अपना दावा है। लेकिन नियंत्रण चीन का है। दूसरी ओर पूर्वी सेक्टर में चीन अरुणाचल प्रदेश के 90 हजार वर्ग किमी पर अपना दावा कर उसे अपना मानता है। अरुणाचल प्रदेश से चुने गए किसी भारतीय सांसद को वीजा नहीं देता है। भारत की मनाही के बावजूद भी वह कश्मीर के लोगों को स्टेपल वीजा जारी कर रहा है। गुलाम कश्मीर में सामरिक रुप से महत्वपूर्ण गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र पर वह अपना वर्चस्व बढ़ा रहा है। वह इन क्षेत्रों में निर्बाध रुप से हाईस्पीड सड़कें और रेल संपर्कों का जाल बिछा रहा है। दरअसल उसकी मंषा अरबों रुपये खर्च करके कराकोरम पहाड़ को दो फाड़ करते हुए गवादर के बंदरगाह तक अपनी रेल पहुंच बनानी है ताकि युद्धकाल में जरुरत पड़ने पर वह अपने सैनिकों तक आसानी से रसद पहुंचा सके। भारत की सहृदयता का लाभ उठाकर वह नेपाल, बंगलादेश और म्यांमार में अपना दखल बढ़ा रहा है। इसी तरह वह अफगानिस्तान में भी अरबों डालर का निवेश कर तांबे की खदानें चला रहा है। चीन म्यांमार की गैस संसाधनों पर कब्जा करने में भी जुटा है। खबर तो यहां तक आ रही है कि वह कोको द्वीप में नौ सैनिक बंदरगाह बना रहा है। अब भारत को चीन पर दबाव बनाने के लिए तिब्बत के मसले पर अपना रुख कड़ा करना होगा। तिब्बत का स्वतंत्र अस्तित्व ही भारत की सीमाओं की रक्षा की सबसे बड़ी गारंटी है। लेकिन दुर्भाग्य है कि भारत की अब तक की सभी सरकारें तिब्बत का खुलकर पक्ष लेने से कतराती रही हैं। जबकि चीन भारतीय प्रतिनिधियों से वार्ता से पहले हर बार कुबूलवाने में सफल रहा है कि तिब्बत चीन का हिस्सा है। उसके विपरित भारतीय हुक्मरान कभी भी चीन से यह कुबूलवाने में सफल नहीं हुए कि कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। फिलहाल चीन भारत के साथ सीमा विवाद सुलझाने की बात तो कर रहा है लेकिन उसके मन में क्या चल रहा है यह समझना ज्यादा जरुरी है। बहरहाल अभी तक मोदी सरकार चीन से रिश्ते सुधारने में पूरी नाकाम ही रही है।

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