बेदाग नहीं हैं तीनों नोबल विजेता

4:11 pm or March 11, 2015
Kailash

—डॉ. महेश परिमल—

कुछ ही समय पहले भारत में जिन्हें नोबल पुरस्कार मिला है, उनके दिन अच्छे नहीं चल रहे हैं। तीनों पर किसी न किसी तरह के आरोप हैं। एक तरफ बचपन बचाओ आंदोलन चलाने वाले कैलास सत्यार्थी को पिछले वर्ष शांति का नोबल पुरस्कार मिला है। इन पर ऐसे आरोप लगाए गए हैं कि भारत में बाल मजदूरों का उद्धार करने के बहाने उन्होंने विदेशों से करोड़ों का धन प्राप्त किया है। इस धन का उपयोग उन्होंने अपने निजी कार्यों में किया है। राजेंद्र पचौरी को सन् 2007 में यूनो की इंटरनेशनल पेनल फॉर क्लाइमेट चेंज पर काम करने के एवज में नोबल पुरस्कार मिला था। वे उत्तराखंड में ‘टेरी’ नाम की एक एनजीओ चलाते हैं। संस्था की एक महिला कर्मचारी ने उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। उधर कोलकाता के अमर्त्य सेन को 1998 में अर्थशास्त्र का नोबल पुरस्कार मिला था। तब तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने उन्हें नालंदा विश्वविद्यालय का चांसलर बनाया गया था। केंद्र में जब एनडीए की सरकार आई, उसके बाद अमर्त्य सेन का कार्यकाल बढ़ाने के लिए इंकार कर दिया है। इससे स्पष्ट है कि जब किसी को नोबल पुरस्कार मिले, तो यह नहीं सोचना चाहिए कि वह व्यक्ति अपने चारित्र्य से अतिशुद्ध होगा। नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले महानुभाव धन, सेक्स और राजनीति के चक्कर में फँस गए हैं।

पहले चर्चा करते हैं कैलास सत्यार्थी की। इन्हें पिछले वर्ष ही शांति का नोबल पुरस्कार साझे में मिला है। जैसे ही उन्हें नोबल पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई, वैसे ही मीडिया पर यह संदेश फैल गया कि वे कार्पेट बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंट हैं। बाल मजदूरों को मुक्त करने के नाम पर वे भारत में हाथ से बनाए जाने वाले कार्पेट उद्योग को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं। एक बार फोर्ब्स मैगजिन की पूर्व रिपोर्टर मेघा बहरी भारत में बाल मजदूरी पर एक आलेख लिखना चाहती थी। इसके लिए वे कैलास सत्यार्थी से मिलकर कार्पेट उद्योग में लगे बाल मजदूरों की हालत दिखाने की अपील की। सत्यार्थी ने अपने एक साथी को मेघा के साथ उत्तर प्रदेश के एक गांव में भेजा। वहां जाकर मेघा ने देखा कि कार्पेट उद्योग में एक भी बाल मजदूर नहीं है। सभी बड़े लोग इस काम में लगे हुए हैं। मेघा के मुताबिक-हम लोग उन गांवों में गए, लेकिन हमने सिर्फ बड़े लोगों को ही कॉर्पेट बनाते हुए देखा। मेघा कहती हैं कि इसे देखने के बाद मेरे मन में कई सवाल उठने लगे। मैंने उनसे कुछ सवाल किए, तो वे मुझे एक घर में ले गए। उन्होंने बाहर मुझे कार में रुकने के लिए कहा और खुद अंदर चले गए। लेकिन मैंने उनका पीछा किया। मैंने एक बरामदे में छह साल के दो बच्चों को करघे के पास बैठा देखा। वे स्कूल ड्रेस में थे। मैंने जब दोनों से उनकी बुनाई कौशल के बारे में पूछा, तो उनके पास इसका कोई जवाब नहीं था। बात साफ है कि आप जितने ज्यादा बच्चों को बचाते हुए दिखाते हैं, विदेशों से एनजीओ की मदद के लिए उतना ही ज्यादा फंड आता है। ज्यादा फंड उगाहने के चक्कर में एनजीओ झूठे आंकड़े पेश करते हैं। हालांकि, इसमें कोई शक नहीं है कि भारत में बाल मजदूरी काफी है। ये बड़े पैमाने पर फल-फूल रही है। मेघा ने लिखा कि ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ ने भी इस पर काम किए होंगे, अच्छे काम किए होंगे, लेकिन उसे जिस तरह से हीरो बनाया जा रहा है, वैसा नहीं है।

कैलास सत्यार्थी मुक्ति प्रतिष्ठान ट्रस्ट नाम की संस्था चलाते हैं। संस्था ने विदेश से करीब 10 करोड़ रुपए की सहायता राशि प्राप्त की है। संस्था के ट्रस्टियों द्वारा दिल्ली के हाईकोर्ट में शिकायत की कि कैलास सत्यार्थी एवं उनकी पत्नी सुमेघा ने ट्रस्ट की राशि का इस्तेमाल बाल मजदूरों के कल्याण में लगाने के बजाए अपनी मौज-मस्ती में किया है। जब दिल्ली हाईकोर्ट ने कैलास सत्यार्थी को अपने बचाव में हिसाब-किताब के दस्तावेज दिखाने को कहा, तब पता चला कि संस्था के दस्तावेज गुम हो गए हैं। जिस तरह से गुजरात में तिस्ता सेतलवाड़ बदनाम हुई हैं, ठीक उसी तरह मध्यप्रदेश में कैलास सत्यार्थी भी बदनाम हो गए हैं।

पर्यावरण की रक्षा के लिए नोबल पुरस्कार से नवाजे गए राजेंद्र पचौरी की कहानी इससे अलग नहीं है। वे उत्तराखंड में एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (टेरी) एनजीओ चलाते हैं। संस्था के दिल्ली स्थित कार्यालय में नौकरी करती एक महिला कर्मचारी ने पुलिस में शिकायत लिखवाई है कि पचौरी काम के समय उससे बार-बार शारीरिक छेड़छाड़ करते हैं और यौन उत्पीड़न करते हैं। 75 वर्षीय पचौरी इस समय (टेरी)’ में डीजी हैं। अभी उन्हें हाईकोर्ट से जमानत मिली हुई है।

नरेंद्र मोदी को भाजपा ने जब प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया गया, तब अमर्त्य सेन ने एक टीवी चैनल का दिए गए साक्षात्कार में कहा था कि मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं है। इसका कारण यही है कि उन्हें अल्पसंख्यकों का विश्वास हासिल नहीं है। यूपीए सरकार ने उन्हें बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय का चांसलर बना दिया। उनका कार्यकाल जुलाई महीने में पूरा हो रहा है। उनका कार्यकाल बढ़ाने के प्रस्ताव पर भाजपा सरकार ने मौन साध लिया है। इससे अमर्त्य सेन ने यह मान लिया है कि उनका कार्यकाल बढ़ने वाला नहीं है। इसके पहले कांग्रेस-वामदलों ने मोदी सरकार पर यह आरोप लगाया था कि सरकार अमर्त्य सेन की कद्र नहीं कर रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने भी कुछ ऐसा ही राग अलापा था। लेकिन उसी नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाने वाले पूर्व राष्ट्रपति एपीज अब्दुल कलाम को लोग भूल गए। आज इस विश्वविद्यालय की जो ख्याति है, वह डॉ. कलाम की ही देन है। डॉ. कलाम ने अमर्त्य सेन के व्यवहार से तंग आकर अपना इस्तीफा दे दिया था। अमर्त्य सेन ने गोपा सबरवाल से संबंध के चलते सारे नियम-कायदे को ताक पर रखकर उसे वाइस चासंलर भी बना दिया था। जबकि गोपा किसी भी स्थिति में इस पद के लायक नहीं थी। इसके अलावा उन्होंने इस्तीफे की धमकी देकर यह भी मनवा लिया था कि किसी भी स्थिति में ‘कैग’ विश्वविद्यालय के दस्तावेज का ऑडिट न कर पाए। बतौर चांसलर अमर्त्य सेन का वेतन 80 हजार डॉलर सालाना है, वह भी कर मुक्त। गोपा का वेतन 5 लाख रुपए मासिक है। आश्चर्य की बात यह है कि विश्वविद्यालय बिहार के राजगीर जिले में है, पर वाइस चांसलर और अन्य अधिकारी दिल्ली स्थित कार्यालय में बैठते हैं। यह विश्वविद्यालय विदेश मंत्रालय द्वारा संचालित है। अमर्त्य सेन ने कई गड़बड़ियां की हैं, इस पर भी वे यह अपेक्षा रख रहे हैं कि उनका कार्यकाल बढ़ाया जाए। सरकार ने जब इसे अनदेखा किया, तो वे राग-आलोचना में उतर आए हैं।

इसलिए यह कहना मुश्किल है कि जिसे नोबल पुरस्कार मिलता है, आवश्यक नहीं कि वह सर्वगुण सम्पन्न हो। वह बेदाग हो। उपरोक्त तीन उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि मामला कितना गंभीर है। इससे नोबल पुरस्कार पर ऊंगली नहीं उठाई जा सकती। संभव है उसके चयनकर्ताओं को ही इसकी जानकारी न हो। उनके द्वारा जुटाई गई जानकारी में इस आशय की जानकारी दी ही न गई हो। कुछ आरोप तो पुरस्कार मिलने के बाद सामने आए हैं, इससे यह नहीं कहा जा सकता कि चयनकर्ताओं की राय गलत हो। फिर भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि कई बार धन और उसकी लालसा व्यक्ति को दिग्भ्रमित कर देती है। यह शायद उसकी का परिणाम है।

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