भूमि अधिग्रहण विधेयक की चुनौतियां?

5:08 pm or March 11, 2015
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—प्रमोद भार्गव—

विपक्ष,संघ,अन्ना आंदोलन,स्वेदेशी जागरण मंच और किसान संगठनों के दबाव में आकर केंद्र सरकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर संषोधन के लिए झुकने को रजामंद है। जाहिर है,आंदोलन की राजनीति अपना रंग दिखा रही है। यदि सरकार किसान हितैशी संगठनों की बात पहले ही मान लेती तो उसे संसद से सड़क तक विरोध का सामना करना नहीं पड़ता। लौट के बुद्धु घर को आए कहावत चरितार्थ करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह भी कहना नहीं पड़ता कि विधेयक के संषोधित मसौदे में किसान विरोधी कोई प्रावधान हैं तो उन्हें हटा लिया जाएगा। गोया,विधेयक के मूल प्रारूप में बदलाव किए बिना सरकार नौ संषोधन लेकर आई और ‘उचित मुआवजा भूमि अधिग्रहण पारदर्षिता,पुनर्वास और पुनसर््थापन के अधिकार संषोधन अधिनियम 2013‘ लोकसभा में ध्वनिमत से पारित हो गया। लेकिन राज्यसभा में अभी भी विधेयक को पारित कराना राजग सरकार की बड़ी जटिल चुनौती है,जिसे पार पाना आसान नहीं है।

गुलाम भारत में सन् 1894 में ब्रिटिश हुकूमत ने भूमि अधिग्रहण कानून सामंतों और किसानों की भूमि हड़पने की दृश्टि से लागू किया था। इसे अमल में लाने का एकमात्र मकसद ब्रिटिश कंपनियों को लाभ पहुंचाना था। इस कानून पर बबाल तब भी मचा था,लेकिन अंग्रेजी सरकार ने इस विरोध को बलपूर्वक दबा दिया था। ब्रितानी सत्ता के इस कानून को एक मर्तबा उस कालखंड में इसलिए  जायज ठहराया जा सकता था,क्योंकि फिरंगियों का आत्मीय वास्ता भारतीय किसानों से नहीं था। फिरंगी देशवासियों के रक्त-संबंधी भी नहीं थे। लिहाजा विदेशी सरकार की भलाई,किसानों के हित साधने से कहीं ज्यादा ब्रिटिश कंपनियों के हित साधने में थी। वह इसलिए भी,क्योंकि भारत से की गई लूट ग्रेट ब्रिटेन का खजाना भर रही थी।

बावजूद यह दुर्भाग्य रहा कि आजादी के बाद भी जनता द्वारा चुनी हुई देशी सरकारें भी अंग्रेजों की तर्ज पर प्रजा पर अब तक राज करती चली आ रही हैं। जबकि स्वतंत्रता के तात्काल बाद किसानों को इस इकतरफा व बेरहम कानून से छुटकारा मिल जाना चाहिए था। जबकि पिछले 67-68 सालों में कांग्रेस के अलावा भाजपा और तीसरे-चैथे मोर्चों की गठबंधन सरकारें भी दिल्ली की सत्ता पर काबिज रही हैं। लेकिन सबने किसानों को छलने और ठगने का काम ही किया है। हालांकि संप्रग सरकार ने 2013 में इस कानून में आमूलचूल बदलाव लाकर किसानों और किसानी से जुड़े मजदूरों को राहत पहुंचाने का ऐतिहासिक एवं सहासिक काम किया था,किंतु 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद मोदी सरकार ने एक अध्यादेश के मार्फत इस विधेयक को ऐसा पलीता लगाया कि फिर से 1894 की स्थिति बहाल हो गई।

2014 में राजग सरकार के मंत्रीमंडल द्वारा पारित भूमि अधिग्रहण विधेयक अध्यादेश के जरिए किसान और भूमि के हितों से जुड़े ज्यादातर प्रावधानों को हटा दिया गया था। नतीजतन भूमि के जबरन अधिग्रहण का 1894 वाला कानून लागू हो गया था। 2013 के कानून में प्रावधान था कि सरकारी और गैर सरकारी उपयोग के लिए भूमि का अधिग्रहण किया जाता है तो उसे पंचायत या क्षेत्र के 70 से 80 फीसदी किसानों से सहमति लेना जरूरी है। सहमति बनाने का अधिकार ग्रामसभा के पास रखा गया था। जबकि अध्यादेश में इस प्रावधान को विलोपित कर दिया गया और अधिग्रहण का अधिकार ग्रामसभा से छीनकर जिला कलेक्टर को दे दिए गए। यहीं नहीं अध्यादेश में राश्ट्रीय सुरक्षा,ग्रामीण आधारित सरंचना,आवासीय परियोजना,सामाजिक आधार सरंचना और औद्योगिक प्रतिश्ठानों को बहुफसलीय भूमि का अधिग्रहण करने की छूट भी दे दी गई। जबकि 2013 के कानून में इन परियोजनाओं के लिए किसी भी हालत में बहुफसलीय भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता था।

2013 के विधेयक में किसी भी भूमि के अधिग्रहण से पहले उस क्षेत्र के समाज और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का विष्लेशण व नुकसान का आकलन करना भी जरूरी था। ग्रामीण किसान को बाजार मूल्य का चार गुणा और शहरी किसान को दो गुणा मुआवजा देने का प्रावधान था। साथ ही यदि भूमि अधिग्रहण के बाद तय उद्देष्य के लिए भूमि उपयोग में नहीं लाई जाती है तो उसे मूल भूमिस्वामी को लौटाने का प्रावधान भी था। इसके अलावा भूमि मालिक के परिवार के किसी एक सदस्य को निजी उद्योग हो अथवा सरकारी प्रतिश्ठान नौकरी में लेना जरूरी था। किंतु इन सभी लोक हितैशी उपायों को मोदी सरकार ने अध्यादेश के जरिए में समाप्त कर दिया था। जाहिर है,अध्यादेश में किसानों व किसानी से आजीविका जुटाने वाली देश की 70 फीसदी आबादी के हितों की पूरी तरह अनदेखी कर दी गई थी। यह अध्यादेश भूमि गंवाने वाले लोगों के हितों पर कुठाराघात कर रहा था,लिहाजा इसका बदला जाना आवष्यक हो गया था।

देशव्यापी विरोध के बाद राजग सरकार सीधी लाइन पर तो आ गई है,लेकिन इस दौरान यह मुद्दा विपक्षी दलों में इतनी कड़वाहट भर चुका है कि उनका सरलता से रुख बदलने वाला नहीं है। लिहाजा सरकार ने जिन प्रावधानों में 9 प्रकार के बदलावों की पेशकाश की है,उन्हें राज्यसभा में सामान्य विधायी प्रक्रिया के तहत पारित कराना कठिन है। क्योंकि राज्यसभा में एक तो राजग के पास कुल जमा 45 सांसद हैं,दूसरे विपक्ष ने 52 संषोधन पेश किए थे,जिनमें से सरकार महज नौ पर चर्चा के लिए तैयार हुई है। इन नौ संषोधनों में एक तो सरकार ने किसानों की 70 फीसदी सहमति और किसान परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का प्रावधान मान लिया है। साथ ही बहुफसलीय खेती की जमीन नहीं ली जाएगी और किसान को अधिग्रहण के विरूद्ध न्यायालय में जाने का अधिकार भी मिलेगा। उघोगों के लिए सीमित जमीन का अधिग्रहण होगा और परियोजना के समाज व पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन भी बहाल होगा।

बावजूद इस संषोधित विधेयक को राज्यसभा से पारित कराना इसलिए भी मुष्किल है,क्योंकि यह विधेयक पिछले सत्र में ही राज्यसभा में पेश किया जा चुका है। लोकसभा से पास विधेयक को राज्यसभा में लाने के लिए पहले पुराने विधेयक को वापस लेना जरूरी है,जो विपक्ष सभवतः आसानी से करने नहीं देगा ? मत विभाजन की नौबत आई तो सरकार औंधे मुंह गिरेगी। यहीं नहीं राज्यसभा में जो विधेयक मौजूद है,यदि सरकार उसे वापिस नहीं ले पाती है तो वह छह माह के भीतर खुद-व-खुद निश्क्रिय हो जाएगा। इसके प्रभावषून्य होने के बाद ही सरकार विधायी प्रक्रिया के तहत लोकसभा और राज्यसभा का साझा सत्र बुलाने का अधिकार हासिल कर पाएगी। यानी संषोधित विधेयक को पारित कराने में सरकार के समक्ष चुनौतियां ही चुनौतियां हैं। इस पेश आई चुनौति से नरेंद्र मोदी सरकार को यह सबक लेने की जरूत है कि लोकतंत्र में हाषिए पर खड़े आम आदमी की चिंता उद्योगपतियों से कहीं ज्यादा करने की जरूरत है।

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