खतरनाक स्तर पर वायु प्रदूषण

7:15 pm or March 17, 2015
air-pollution

—अरविंद जयतिलक—

यह चिंतित करने वाला है कि भारत दुनिया के उन देशों में शुमार है जहां सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण है और जिसकी वजह से यहां के लोगों को समय से तीन साल पहले ही काल का ग्रास बनना पड़ रहा है। यह   खुलासा यूनिवर्सिटी आॅफ शिकागो, हार्वर्ड और येल के अर्थषास्त्रियों के अध्ययन से हुआ है। अध्ययन में पाया गया है कि भारत की आधी आबादी यानी 66 करोड़ लोग उन क्षेत्रों में रहते हैं जहां सूक्ष्म कण पदार्थ (पार्टिकुलेट मैटर) प्रदूषण भारत के सुरक्षित मानकों से उपर है। अध्ययन में बताया गया है कि यदि भारत अपने वायु मानकों को पूरा करने के लिए इस आंकड़े को उलट देता है तो इससे 66 करोड़ लोगों के जीवन के 3.2 वर्श बढ़ जाएंगे। गौरतलब है कि यह नए आंकड़े विष्व स्वास्थ्य संगठन के उन आंकड़ों के बाद आए हैं जिनमें कहा गया है कि विष्व के सर्वाधिक 20 प्रदुशित षहरों में से 13 भारत में हैं। इनमें दिल्ली को सर्वाधिक प्रदुशित षहर बताया गया है। याद होगा गत वर्श विष्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में भी दुनिया के 91 देशों के 1600 षहरों में दिल्ली को सर्वाधिक प्रदुशित षहर बताया गया। रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ कि विष्व की आधी षहरी आबादी ऐसी प्रदुशित हवा इस्तेमाल करने को मजबूर है, जो सुरक्षित माने जाने वाले मानक के हिसाब से ढ़ाई गुना अधिक है। विष्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो साल 2012 में घर के बाहर वायु प्रदूषण के कारण दुनिया भर में 37 लाख लोगों की मौत हुई। एनवायरमेंटल रिसर्च लेटर्स जर्नल के षोध से भी खुलासा हो चुका है कि दुनिया भर में वायु प्रदूषण से हर वर्श तकरीबन 26 लाख लोगों की मौत हो रही है। यूनिवर्सिटी आॅफ कैरोलीना के विद्वान जैसन वेस्ट के अध्ययन के मुताबिक इनमें से ज्यादतर मौतें दक्षिण और पूर्व एशिया में हुई है। आंकड़ें बताते हैं कि हर साल मानव निर्मित वायु प्रदूषण से 4 लाख 70 हजार और औद्योगिक इकाईयों से उत्पन प्रदूषण से 21 लाख लोग दम तोड़ते हैं। विषेशज्ञों का मानना है कि अगर इससे निपटने की तत्काल वैष्विक रणनीति तैयार नहीं हुई तो विष्व की बड़ी जनसंख्या वायु प्रदूषण की चपेट में होगी। विष्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य जोखिम के बारे में जागरुकता बढ़ाने की अपील की है। लेकिन विडंबना है कि भारत सरकार वायु प्रदूषण के खतरों से बेखबर है और इसे रोकने की ठोस पहल नहीं कर रही है। जबकि तीन साल पहले ‘क्लीन एयर एक्षन प्लान’ के जरिए वायु प्रदूषण से निपटने का संकल्प व्यक्त किया गया था। लेकिन यह योजना फाइलों में कैद है। नतीजा आज भारत के विभिन्न षहर वायु प्रदूषण की चपेट में हैं। उपग्रहों से लिए गए आंकड़ों के आधार पर तैयार रिपोर्ट के मुताबिक विष्व के 189 षहरों में सर्वाधिक प्रदूषण स्तर भारतीय षहरों में पाया गया है। उदाहरण के तौर पर भारत का सिलिकाॅन वैली बंगलुरु विष्व के षहरों में वायु प्रदूषण स्तर में वृद्धि के मामले में अमेरिका के पोर्टलैंड षहर के पष्चात दूसरे स्थान पर है। यहां वर्श 2002-10 के बीच वायु प्रदूषण स्तर में 34 फीसद की वृद्धि दर्ज की गयी है। कुछ ऐसा ही बदतर हालात देष के अन्य बड़े षहरों की भी है। इसके अलावा देष के षहरों के वायुमण्डल में गैसों का अनुपात लगातार बिगड़ता जा रहा है। हाल के वर्शों में वायुमण्डल में आॅक्सीजन की मात्रा घटी है और दूशित गैसों की मात्रा बढ़ी है। कार्बन डाई आॅक्साइड की मात्रा में तकरीबन 25 फीसद की वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण बड़े कल-कारखानें और उद्योगधंधों में कोयले एवं खनिज तेल का उपयोग है। गौरतलब है कि इनके जलने से सल्फर डाई आॅक्साइड निकलती है जो मानव जीवन के लिए बेहद खतरनाक है। षहरों का बढ़ता दायरा, कारखानों से निकलने वाला धुंआ, वाहनों की बढ़ती तादाद एवं मेट्रो का विस्तार तमाम ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से प्रदूषण बढ़ रहा है। वाहनों के धुएं के साथ सीसा, कार्बन मोनोक्साइड तथा नाइट्रोजन आॅक्साइड के कण निकलते हैं। ये दूशित कण मानव षरीर में कई तरह की बीमारियां पैदा करते हैं। मसलन सल्फर डाई आॅक्साइड से फेफड़े के रोग, कैडमियम जैसे घातक पदार्थों से हृदय रोग, और कार्बन मोनोक्साइड से कैंसर और ष्वास संबंधी रोग होते हैं। कारखानें और विद्युत गृह की चिमनियों तथा स्वचालित मोटरगाडि़यों में विभिन्न ईंधनों के पूर्ण और अपूर्ण दहन भी प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं। वायु प्रदूषण से न केवल मानव समाज को बल्कि प्रकृति को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है। प्रदुशित वायुमण्डल से जब भी वर्शा होती है प्रदुशक तत्व वर्शा जल के साथ मिलकर नदियों, तालाबों, जलाषयों और मृदा को प्रदुशित कर देते हैं। अम्लीय वर्शा का जलीय तंत्र समश्टि पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। नार्वे, स्वीडन, कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका की महान झीलें अम्लीय वर्शा से प्रभावित हैं। अम्लीय वर्शा वनों को भी बड़े पैमाने पर नश्ट कर रहा है। यूरोप महाद्वीप में अम्लीय वर्शा के कारण 60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र वन नश्ट हो चुके हैं। ओजोन गैस की परत, जो पृथ्वी के लिए एक रक्षाकवच का कार्य करती है, में वायुमण्डल के दूशित गैसों के कारण उसे काफी नुकसान पहुंचा है। ध्रुवों पर इस परत में एक बड़ा छिद्र हो गया है जिससे सूर्य की खतरनाक पराबैगनीं किरणें भूपृश्ठ पर पहुंचकर ताप में वृद्धि कर रही है। इससे न केवल कैंसर जैसे असाध्य रोगों में वृद्धि हो रही है बल्कि पेड़ों से कार्बनिक यौगिकों के उत्सर्जन में बढ़ोत्तरी हुई है। इससे ओजोन एवं अन्य तत्वों के बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। वायु प्रदूषण का दुश्प्रभाव ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासतों पर भी पड़ रहा है। गत वर्श देष के 39 षहरों की 138 विरासतीय स्मारकों पर वायु प्रदूषण के घातक दुश्प्रभाव का अध्ययन किया गया। पाया गया कि शिमला, हसन, मंगलौर, मैसूर, कोट्टयम और मदुरै जैसे विरासती षहरों में पार्टिकुलेट मैटर पाॅल्यूषन राश्ट्रीय मानक 60 माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर से भी अधिक है। कुछ स्मारकों के निकट तो यह 4 गुना से भी अधिक पाया गया। सर्वाधिक प्रदूषण स्तर दिल्ली के लालकिला के आसपास है। लेकिन दुर्भाग्य कि षहरों के स्मारकों के आसपास रासायनिक और धूल प्रदूषण की जानकारी के बाद भी उसके बचाव पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ताजमहल को छोड़कर देष के अन्य स्मारकों के आसपास यातायात का समुचित प्रबंध नहीं है। ऐसा नहीं है कि वायु प्रदूषण के इन दुश्प्रभावों से निपटने और उस पर रोकथाम के लिए कानून नहीं है। सरकार ने वायु प्रदूषण में कमी लाने के उद्देष्य से 13 बड़े षहरों समेत राश्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में चार पहिया और दो पहिया वाहनों के लिए भारत स्टेज-4 और भारत स्टेज-3 उत्सर्जन नियम 2010 लागू किए। चालू वित्त वर्श के अंत तक और 50 षहरों में यूरो-4 मानक के पेट्रोल व डीजल की आपूर्ति करने पर विचार कर रही है। इसके अलावा वायु प्रदूषण में कमी लाने के लिए परिश्कृत डीजल और गैसोलिन की आपूर्ति भी बढ़ायी गयी है। कमप्रेस्ड नेचुरल गैस यानी सीएनजी का इस्तेमाल पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। लेकिन हालात बिगड़ते ही जा रहे हैं। उचित होगा कि सरकार प्रदूषण की रोकथाम के लिए प्रभावकारी नीति बनाए और उस पर अमल करे।

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