द्वितीय विश्व युद्ध के खिलाफ थे लोहिया

2:49 pm or March 23, 2015
Dr. Lohia

—जय शंकर पाण्डेय—

डाॅ. राम मनोहर लोहिया ने अपने विचारों और सतत संघर्ष से भारतीय जनमानस एवं देद्वितीय के युवा मन पर अमिट छाप छोड़ी थी। वे महात्मा गाॅधी के बाद पहले भारतीय नेता थे जिन्होंने दुनिया में कहीं भी होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलन्द की थी। उनकी सोच का केन्द्र बिन्दु दुनिया का आम आदमी था। भारतीय सन्दर्भ में वे देश की आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक हालात तथा षिक्षा व इतिहास को रख कर सोचते थे और उसका सबसे बड़ा कारण था कि उन्होंने अपनी शिक्षा  के दौरान गुलामी को बहुत नजदीक से देखा था कि किस तरह से शासक वर्ग पूरी दुनिया में साम्राज्यवादी ताकतों के बल पर लूट का वर्चस्व बना कर शोषण कर रहा था।

डाॅ0लोहिया ने अंग्रेजो द्वारा भारत पर थोपे जा रहे द्वितीय विष्वयुद्ध के विरोध में जनआन्दोलन खड़ा करने के लिए गाॅधी जी से निवेदन किया और अग्राह किया कि सही वक्त आ गया है जब आप देश की जनता को अंग्रेज सरकार के खिलाफ खड़ा करके आजादी प्राप्त कर सकते हैं। डाॅ साहब ने पूरी दुनिया के गुलाम देशों को आजाद कराने तथा प्रत्येक देश को व्यस्क मताधिकार के आधार पर चुनी हुई सरकार बनाने , देश मे समानता के आधार पर लोकतां़ि़त्रक अधिकार दिये जाने, दुनिया के हर देश मे बिना पासपोर्ट के आने जाने की अनुमति तथा कोई देश अन्य देश मे पूॅजी लगाता है और पूॅजी से लाभ कमा कर लाभ को उस देश मे न लगाकर विदेश भेजता है तो ऐसी पूॅजी को जब्त करने का सुझाव दिया। उन्हांेने पूरी दुनिया को निःषस्त्रीकरण किये जाने का सुझाव भी गाॅधी जी को दिया। गाॅधी जी लोहिया जी के विचारों से प्रभावित तो हुए। पूरे देश मे डाॅ लोहिया ने घूम-घूम कर अंग्रेजों को युद्ध मंे सहायता न करने और साम्राज्यशाही को समाप्त करने का वातावरण बनाना शुरू किया। डाॅ लोहिया का मानना था कि जनता मे युद्ध विरोधी भावना पहले से ही है तथा देश और समाज राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत है और अंग्रेजो द्वारा थोपे जा रहे युद्ध मे जो खर्च होगा उसकी पाई-पाई देश की गरीब जनता से वसूल की जायेगी। डाॅ लोहिया के देश व्यापी दौरे से अंग्रेजी सरकार चैकन्नी हो गयी। डाॅ लाहिया की कलकत्ता विष्वविद्यालय मे विद्यार्थियों के बीच मे दिये गये सरकार विरोधी भाषण के अपराध में गिरफ्तार कर लिया गया और कलकत्ता के चीफ प्रेसीडेन्सी मजिस्टेªट के सामने पेश किया गया। इस मुकदमे मंे डाॅ लोहिया ने अपनी पैरवी खुद की और डाॅ लोहिया के तर्को को सुनने के बाद प्रेसीडेन्सी मजिस्ट्रेट ने उन्हे निर्दोष घोषित किया और टिप्पणी की कि अगर डाॅ लोहिया वकील होते तो बहुत ही सफल  होते। डाॅ लोहिया की भावना के विपरीत कांग्रेस के सभापति डाॅ राजेन्द्र प्रसाद और जवाहर लाल नेहरू जी इस मत के थे कि अगर हमंे फाॅसिज्म के विरोध मे लोकतन्त्र का समर्थन करना है तो हमंे होने वाले सम्भावित युद्ध मे अंग्रेजो का साथ देना होगा। कांग्रेस के सभापति डाॅ राजेन्द्र प्रसाद ने इस सन्दर्भ मे विष्व शान्ति परषिद को तार दिया और आग्रह किया कि यदि भारत युद्ध मे अंग्रेजो का साथ देता है तो अंग्रेज हमें उसके बदले मे स्वाधीनता दंे। इस युद्ध के प्रकरण पर डाॅ लोहिया का दृष्टिकोण कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से अलग था। उनका कहना था कि इंग्लैड और फ्रांस जैसे लोकतन्त्रवादी देषों को चाहिये कि वह साम्राज्यवाद के दायरे से अलग होकर अपने आधीन गुलाम देषों को तत्काल स्वतंन्त्र कर दे तभी देश इस युद्ध में अंग्रेजांे का साथ देने के मामले पर भारत विचार करेगा। अंग्रेज वाईस राय लगातार कांग्रेस पार्टी के नेताओं को आश्वासन देते रहे लेकिन जब युद्ध समाप्त हुआ तो ब्रिटिश सरकार ने स्वाधीनता देने से मना कर दिया। इससे कांग्रेस पार्टी हतप्रभ रह गयी। सन् 1937 में कराये गये चुनाव से सात राज्यों मे कांग्रेस मंत्रिमण्डल का गठन हुआ और उधर ब्रिटिश सरकार युद्ध में खर्च हुये पैसों को वसूलने के लिए प्रान्तीय सरकारों पर दबाव बना रही थी इसलिये कांग्रेस पार्टी ने सातों राज्यों से त्यागपत्र दे दिया। गवर्नर शासन लागू होते ही जनता से निर्ममता पूर्वक टैक्स वसूली और शोषण शुरू कर दिया गया। डाॅ लोहिया के उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद में राजनैतिक सम्मेलन मे दिये गये भाषण के आधार पर भारत संरक्षण कानून के तहत इलाहाबाद कांग्रेस कमेटी के कार्यालय से सात जून 1940 को गिरफ्तार किया गया और हथकड़ी डालकर हिरासत मे रखा गया। डाॅ लोहिया ने सुल्तानपुर में मजिस्ट्रेट के सामने कहा-“ मै पुराने जमाने की लाठी का विरोधी था और आज भी बमबारी करने वाली जहाजों का विरोध करता हूॅ। हमारा हर आचरण अहिंसा का पालन करने वाला होना चाहिए। अहिंसा व्यावहारिक आवष्यकता मात्र नहीं है बल्कि एक नैतिक निष्ठा है। मेरे मन मे किसी राष्ट्र के प्रति कटुता नहीं हैैै। जर्मनी मंे रह चुका हूॅ तथा सर्वव्यापकता को लगातार तलाश करने की प्रवृत्ति व वैज्ञानिक दृष्टि और कार्यक्षमता जैसे उनके गुणों का कायल हॅू। उनके ये गुण मुझे बहुत पसन्द हैं। ब्रिटिषों के साथ मेरा अधिक परिचय नहीं है। इनमें भी कुछ गुण विषेश हांेगे। मैं यह कदापि नहीं चाहता कि ब्रिटेन का नाश हो, यद्यिप अंग्रेजों ने हम भारतीयों के साथ निम्न स्तरीय व्यवहार किया है फिर भी मंै नही चाहता कि उनका बुरा हो”। इस बयान को सुनने के बाद न्यायमूर्ति ने डाॅ लोहिया को दो साल की कठोर सजा देते हुये लिखा- “ मुजरिम न केवल उच्चषिक्षा प्राप्त विद्धान है बल्कि उतना ही सुसंस्कृत सज्जन भी है। इनके व्यक्तित्व मे उदात्त सिद्धान्तों और नैतिक चरित्र का अनोखा समन्वय भी है। इनके उदात्त उद्देष्यांे पर शंका करने की किसी को हिम्मत नही होगी। अपने उद्देष्यांे की पूर्ति के खातिर किसी भी संकट की समना करने की शक्ति आप में है। उन्हंे इस बात की जरा भी चिंता नही है कि उन्हंे कितनी लम्बी सजा भुगतनी पडेगी”। डाॅ लोहिया द्वारा दिये गये बयान के महत्त्वपूर्ण अंषों को महात्मा गाॅधी ने अपने समाचार पत्र हरिजन में छापा और टिप्पणी लिखी कि लोहिया और अन्य कांग्रेसजनों को सुनाई जाने वाली सजा भारत को गुलामी में जकड़ने वाली जन्जीर पर हथौड़ेे का प्रहार है। डाॅ लोहिया की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस वा समाजवादी पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता पण्डित जवाहरलाल नेहरू, जय प्रकाश नारायण, अच्च्युत पटवर्धन, आचार्य नरेन्द्रदेव सहित सैकडों लोगांे को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। सितम्बर 1940 मे गाॅधी जी ने कहा जब तक डाॅ लोहिया और जयप्रकाश नारायण जेल मंे हैं, तब तक मुझे चैन नहीं है। गाॅधी जी पर साम्राज्य विरोधी युद्ध के खिलाफ जनआन्दोलन चलाने के लिये दबाव बढता जा रहा था। जयप्रकाश नारायण जेल से जनआंदोलन चलाने का आह्वान कर रहे थे। सुभाश चन्द्र बोस अंग्रेजी राज्य को हटाने के लिये संघर्ष कर रहे थे। गाॅधी जी पूरे देश मे प्रतीकात्मक तौर पर युद्ध के विरोध मंे व्यक्तिगत सत्याग्रह का आह्वान किया और नारा दिया – “ना एक पाई, ना एक भाई”। ब्रिटिषों को युद्ध के लिये एक पैसा देना और सहयोग के लिये भाई देना अनुचित है। हम हर स्तर पर युद्ध का विरोध करते हैं। डाॅ लोहिया ने युद्ध के खिलाफ जो आह्वान किया था, पूरे देश ने उसका प्रतिपादन किया, यहाॅं तक कि गाॅधी और नेहरू ने डाॅ लोहिया की पीठ थपथाई और उनके विचारों  की सराहना की। ऐसा था डा. लोहिया का युद्ध विरोधी विचार और दर्षन।

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